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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ८ खण्ड १ मन्त्र ५ १८३

अध्याय ८ खण्ड १ मन्त्र ५ १८३
॥ अथ अष्टमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश-
स्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥
तदनन्तर ब्रह्मपुर (शरीर) के अन्तःक्षेत्र में जो कमल पुष्प के आकार का क्षेत्र है, उसके अन्तर्गत जो
अति सूक्ष्माकाश है, उसके अन्तः क्षेत्र में जो तत्त्व विद्यमान है, उसी की खोज करनी चाहिए और उसी
श्रेष्ठतम को जानने की इच्छा करनी चाहिए ॥ १ ॥
तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र
विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥
इसको सुनने के उपरान्त यदि शिष्य उन (आचार्य) से कहे कि इस ब्रह्मपुर में जो कमल के आकार
का गृह है और उसमें जो अन्तराकाश है, उसके अन्दर कौन सी वस्तु है, जिसकी कि जिज्ञासा करनी
चाहिए ? इस प्रकार से वे आचार्य इन सभी पूछने वाले शिष्यों से कहें ॥ २ ॥
यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी
अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति
यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥ ३ ॥
जितना विस्तार इस (भौतिक) आकाश का दृष्टिगोचर होता है, उतना ही हृदय के अन्तः का भी है।
द्युलोक एवं पृथिवी दोनों पूर्ण रूप से इसके अन्दर समाहित हैं। इसी प्रकार अग्नि एवं वायु, सूर्य और
चन्द्रमा, विद्युत् एवं नक्षत्र तथा जो भी कुछ इस लोक में विद्यमान है और जो नहीं है, वह सभी कुछ पूर्ण
रूप से इसमें (आत्मा में) प्रतिष्ठित है ॥ ३ ॥
तं चेद्ब्रूयुरस्मिꣳश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वꣳ समाहितꣳ सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा
यदैतज्जरामाप्नोति प्रध्वꣳसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥
और यदि उस (आचार्य) से शिष्यगण यह प्रश्न करें कि इस ब्रह्मपुर रूपी शरीर में यदि यह सभी कुछ
पूर्णरूपेण विद्यमान है, समस्त प्राणी एवं सभी विषय इसमें ही स्थित हैं, तो जब इस शरीर में वृद्धावस्था का
आगमन होता है अथवा यह विनाश को प्राप्त होता है, तो उस समय फिर क्या शेष रह जाता है ? ॥ ४ ॥
स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्कामाः
समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः
सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति
यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥
तो फिर उस (आचार्य) को कहना चाहिए कि इस (शरीर) की वृद्धावस्था से यह अन्तराकाश
जीर्ण नहीं होता। इसके नष्ट हो जाने से उस (ब्रह्म) का नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है, इसमें
समस्त इच्छाएँ पूर्ण रूप से स्थित हैं। यह ही आत्मा है, धर्म-अधर्म से शून्य तथा जरारहित, मृत्यु
से हीन, शोकरहित, बिना भोजन की इच्छा वाला, पिपासाशून्य, सत्य की कामना से युक्त, सत्य

१८४ छान्दोग्योपनिषदः
संकल्प वाला है। जिस प्रकार से प्रजा इस लोक में राजा की आज्ञानुसार आचरण करती है तथा देश
या प्रदेश की इच्छा करती है, उसी प्रकार से राजा की आज्ञा से जीवन निर्वाह करती है ॥ ५॥
तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य
इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान् कामाँस्तेषाँ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ
य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान् कामाँस्तेषाँ सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥
जिस प्रकार यहाँ कर्म द्वारा अर्जित लोक नष्ट हो जाता है, उसी तरह परलोक में पुण्य से प्राप्त किये
गये लोक भी नष्ट हो जाते हैं। जो लोग इस लोक में आत्मा को तथा इन सभी सत्य कामनाओं को भली-
भाँति जाने बिना ही दूसरे लोक को गमन कर जाते हैं, उनकी सभी लोकों में इच्छानुसार गति नहीं होती।
जो इस लोक में आत्मा को तथा सत्य युक्त कामनाओं को भली-भाँति जानकर दूसरे लोक को गमन करते
हैं, उनकी सभी लोकों में इच्छानुसार गति होती है ॥ ६ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन
संपन्नो महीयते ॥ १ ॥
वह यदि (शरीर के परित्याग करने पर) पितृलोक की कामना वाला होता है, तो उसके द्वारा किये गये
संकल्प से ही पितृगण वहाँ उपस्थित होते हैं। पितृलोक से सम्पन्न होकर वह महिमा का वर्णन करता है ॥ १ ॥
अथ यदि मातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन
संपन्नो महीयते ॥ २ ॥
और यदि वह मातृलोक की इच्छा वाला होता है, तो उसकी दृढ़ इच्छा शक्ति से ही माताएँ उपस्थित
हो जाती हैं। मातृलोकों के सम्बन्ध से ही वह महिमा का अनुभव करता है ॥ २ ॥
अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन
संपन्नो महीयते ॥ ३ ॥
और यदि वह भ्रातृलोक की इच्छा वाला होता है, तो उसकी प्रचण्ड संकल्प शक्ति से ही समस्त भ्रातृ-
समुदाय वहाँ उपस्थित हो जाता है। उस भ्रातृलोक से सम्पन्न होकर वह महान् महिमा को प्राप्त करता है ॥ ३ ॥
अथ यदि स्वसृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन
स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ४ ॥
और यदि वह भगिनी लोक की कामना करने वाला है, तो उसकी दृढ़ इच्छा शक्ति से ही बहिनें वहाँ
आ जाती हैं। उस भगिनी लोक से युक्त होकर वह महान् वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
अथ यदि सखिलोककामो भवति संकल्पादेवास्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन
सखिलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ५ ॥
और यदि वह मित्रों के लोक की कामना करने वाला हो, तो उसके दृढ़ संकल्प बल से ही मित्रगण
वहाँ एकत्रित हो जाते हैं। उन मित्रगणों के लोक से सम्पन्न होकर वह महान् वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन
गन्धमाल्यलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ६ ॥