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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 505 में से

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पृष्ठ 184

१८४ छान्दोग्योपनिषदः
संकल्प वाला है। जिस प्रकार से प्रजा इस लोक में राजा की आज्ञानुसार आचरण करती है तथा देश
या प्रदेश की इच्छा करती है, उसी प्रकार से राजा की आज्ञा से जीवन निर्वाह करती है ॥ ५॥
तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य
इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान् कामाँस्तेषाँ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ
य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान् कामाँस्तेषाँ सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥
जिस प्रकार यहाँ कर्म द्वारा अर्जित लोक नष्ट हो जाता है, उसी तरह परलोक में पुण्य से प्राप्त किये
गये लोक भी नष्ट हो जाते हैं। जो लोग इस लोक में आत्मा को तथा इन सभी सत्य कामनाओं को भली-
भाँति जाने बिना ही दूसरे लोक को गमन कर जाते हैं, उनकी सभी लोकों में इच्छानुसार गति नहीं होती।
जो इस लोक में आत्मा को तथा सत्य युक्त कामनाओं को भली-भाँति जानकर दूसरे लोक को गमन करते
हैं, उनकी सभी लोकों में इच्छानुसार गति होती है ॥ ६ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन
संपन्नो महीयते ॥ १ ॥
वह यदि (शरीर के परित्याग करने पर) पितृलोक की कामना वाला होता है, तो उसके द्वारा किये गये
संकल्प से ही पितृगण वहाँ उपस्थित होते हैं। पितृलोक से सम्पन्न होकर वह महिमा का वर्णन करता है ॥ १ ॥
अथ यदि मातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन
संपन्नो महीयते ॥ २ ॥
और यदि वह मातृलोक की इच्छा वाला होता है, तो उसकी दृढ़ इच्छा शक्ति से ही माताएँ उपस्थित
हो जाती हैं। मातृलोकों के सम्बन्ध से ही वह महिमा का अनुभव करता है ॥ २ ॥
अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन
संपन्नो महीयते ॥ ३ ॥
और यदि वह भ्रातृलोक की इच्छा वाला होता है, तो उसकी प्रचण्ड संकल्प शक्ति से ही समस्त भ्रातृ-
समुदाय वहाँ उपस्थित हो जाता है। उस भ्रातृलोक से सम्पन्न होकर वह महान् महिमा को प्राप्त करता है ॥ ३ ॥
अथ यदि स्वसृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन
स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ४ ॥
और यदि वह भगिनी लोक की कामना करने वाला है, तो उसकी दृढ़ इच्छा शक्ति से ही बहिनें वहाँ
आ जाती हैं। उस भगिनी लोक से युक्त होकर वह महान् वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
अथ यदि सखिलोककामो भवति संकल्पादेवास्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन
सखिलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ५ ॥
और यदि वह मित्रों के लोक की कामना करने वाला हो, तो उसके दृढ़ संकल्प बल से ही मित्रगण
वहाँ एकत्रित हो जाते हैं। उन मित्रगणों के लोक से सम्पन्न होकर वह महान् वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन
गन्धमाल्यलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ६ ॥