यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
अत्रा ते रूपमुत्तममपश्यं जिगीषमाणमिष ऽ आ पदे गोः.
यदा ते मर्तो अनु भोगमानडादिद् ग्रसिष्ठ ऽ ओषधीर्जीगः.. (१८)
हे हवि रूपी वायु! हम यहां आप के यज्ञ करने की इच्छा वाले उत्तम रूप को
देखते हैं. आप गो मंडल में जाते हैं. जब आप के लिए हवि का भोग लगाया जाता
है तब आप उसे और ओषध रूप हवि को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. (१८)
अनु त्वा रथो अनु मर्यो अर्वन्ननु गावोन्व भगः कनीनाम्.
अनु व्रातासस्तव सख्यमीयुरनु देवा ममिरे वीर्यं ते.. (१९)
हे अर्वन् देव! हमारे रथ आप का अनुकरण करते हैं. हम आप का अनुकरण
करते हैं. हमारी गाएं व हमारी कन्याओं के भाग्य आप का अनुकरण करते हैं. हमारे
व्रत आप का अनुकरण करते हैं. हम ने आप की मित्रता पाई. देवताओं ने आप के
पराक्रम का वर्णन किया है. (१९)
हिरण्यशृङ्गोऽयो अस्य पादा मनोजवा ऽ अवर ऽ इन्द्र ऽ आसीत्.
देवा ऽ इदस्य हविरद्यमायन् यो अर्वन्तं प्रथमो अध्यतिष्ठत्.. (२०)
हे अर्वन्! यह घोड़ा सोने के सींगों वाला है. इस के पैर लोहे के हैं. इस की गति
मन जैसी तीव्र है. देवताओं ने इसे हवि के रूप में ग्रहण किया. इंद्र देव सब से पहले
इस घोड़े पर बैठे हुए. (२०)
ईर्मांन्तासः सिलिकमध्यमासः स ष्ठ् शूरणासो दिव्यासो अत्याः.
ह ष्ठ् सा ऽ इव श्रेणिशो यतन्ते यदाक्षिषुर्दिव्यमज्ममश्वाः.. (२१)
अश्व पतले मध्यभाग (कमर) वाले, बलवान, पुष्ट जांघों व वक्षस्थल वाले
हैं. वे दिव्य और हंसों की तरह एक पांत में चलते हैं. ये घोड़े स्वर्ग में स्वर्गिक आनंद
(दिव्यता) पाते हैं. (२१)
तव शरीरं पतयिष्ण्वर्वन्तव चित्तं वात ऽ इव ध्रजीमान्.
तव शृङ्गाणि विष्ठिता पुरुत्रारण्येषु जर्भुराणा चरन्ति.. (२२)
हे अर्वन्! आप का शरीर ऊपर की ओर जाने वाला है. चित्त वायु जैसा गतिशील
है. आप की पताकाएं जंगलों में दावानल के रूप में विचर रही हैं. (२२)
उप प्रागाच्छसनं वाज्यर्वा देवद्रीचा मनसा दीध्यानः.
अजः पुरो नीयते नाभिरस्यानु पश्चात्कवयो यन्ति रेभाः.. (२३)
हे अर्वन्! हवि गतिशील है. मन की तरह तेजी से ऊपर की ओर जाती है. इस
का धुआं आगे की ओर ले जाया जाता है. नाभि इस का अनुकरण करती है.
पीछेपीछे पाठ करते हुए कविगण चलते हैं. (२३)
यजुर्वेद - ३४७
उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
उप प्रागात्परमं यत्सधस्थमर्वाँ २ अच्छा पितरं मातरं च.
अद्या देवाञ्जुष्टतमो हि गम्या ऽ अथा शास्ते दाशुषे वार्याणि.. ( २४)
हे अर्वन्! आप ऊपर परम स्थान की ओर गमन कीजिए. आप मातापिता से
मिलिए. यजमान देवताओं से जुड़े देवगण हमें अपार वैभव प्रदान करने की कृपा
करें. ( २४ )
समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान् यजसि जातवेदः.
आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः.. ( २५)
हे अग्नि! आप समिधा युक्त और सर्वज्ञ हैं. आप मनुष्यों के यज्ञ में देवताओं
को आमंत्रित करने की कृपा कीजिए. हम आप का आह्वान करते हैं. आप हमारे
मित्र, चेतनासंपन्न, कवि व देवताओं के दूत हैं. ( २५ )
तनूनपात्पथ ऽ ऋतस्य यानान्मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व.
मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन् देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः.. ( २६)
हे अग्नि! आप तन के रक्षक हैं. आप ऋत को अच्छी जिह्वा से सींचते हैं. आप
बुद्धि और मनन से यज्ञ की बढ़ोतरी करते हैं. आप हमारे यज्ञ को देवताओं तक
पहुंचाने की कृपा कीजिए. ( २६ )
नराश ँष सस्य महिमानमेषामुप स्तोषाम यजतस्य यज्ञैः.
ये सुक्रतवः शुचयो धियन्धाः स्वदन्ति देवा ऽ उभयानि हव्या.. ( २७)
हे अग्नि! आप प्रशंसित हैं. हम आप की महिमा गाते हैं. आप श्रेष्ठ
यज्ञ कर्म वाले, पवित्र, बुद्धिमान हैं. हम दोनों हवियों से आप का गुणगान करते
हैं. ( २७ )
आजुह्वान ऽ ईड्यो वन्द्यश्चा याह्यग्ने वसुभिः सजोषाः.
त्वं देवानामसि यह्व होता स एनान्यक्षीषितो यजीयान्.. ( २८)
हे अग्नि! आप देवताओं को बुलाने वाले, प्रार्थनीय, वंदनीय व वसुओं जैसे
स्नेहशील हैं. आप आइए. आप देवताओं के होता हैं. आप देवताओं के लिए यज्ञ
करने की कृपा कीजिए. ( २८ )
प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम्.
व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम्.. ( २९)
ये कुशाएं प्राचीन हैं. पृथिवी की प्रदिशाओं में फैली हुई हैं. अदिति देवता के
विराजमान होने के लिए इन कुशाओं को फैलाया ( बिछाया ) जाता है. कुशाएं
बिछा कर सुख से बैठा जा सकता है. ( २९ )
३४८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
व्यचस्वतीरुर्विया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः.
देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः.. (३०)
जैसे स्त्रियां श्रृंगार कर के पति को थकान रहित करती हैं, वैसे ही दिव्य द्वार
वाली विशाल देवियां देवताओं के लिए सुगमता से प्रयास करने वाली हों. (३०)
आ सुष्वयन्ती यजते उपा के उषासानक्ता सदतां नि योनौ.
दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रिय छँ शुक्रपिशं दधाने.. (३१)
यज्ञ में उषा और रात्रि देवी भलीभांति सुशोभित होने की कृपा करें. दोनों
देवियां दिव्य कार्य करने वाली, विशाल, आभूषणों से युक्त व कपिश रंग की हैं,
वे भलीभांति अधिष्ठित होने की कृपा करें. (३१)
दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै.
प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (३२)
विराट् यज्ञ के दो दिव्य होता हैं. वे श्रेष्ठ वाणी बोलने वाले हैं. वे पूर्व दिशा
से निकलने वाले सूर्य की किरणों से यज्ञ करते हैं. वे मनुष्यों को यज्ञ आदि श्रेष्ठ
कर्म करने की प्रेरणा देते हैं. (३२)
आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विडा मनुष्यदिह चेतयन्ती.
तिस्रो देवीर्बर्हिरिद छँ स्योन छँ सरस्वती स्वपसः सदन्तु.. (३३)
हमारे यज्ञ में भारती देवी, इड़ा देवी और सरस्वती देवी पधारने की कृपा
करें. तीनों देवियां मनुष्यों को चेताने और कुश के आसन पर विराजने की कृपा
करें. (३३)
य ऽ इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपि छँ शद्भुवनानि विश्वा.
तमद्य होतरिषितो यजीयान् देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (३४)
हे यज्ञकर्ता विद्वान्! आज आप त्वष्टा देव की पूजा करें, जो स्वर्गलोक,
पृथ्वीलोक आदि सभी लोकों की रचना करते हैं. (३४)
उपावसृज त्मन्या समञ्जन् देवानां पाथ ऽ ऋतुथा हवीछंषि.
वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (३५)
हे यजमानो! आप देवताओं को पाथेय प्रदान कीजिए. आप देवताओं की
आहुतियों को मधुर घी से सींचिए. वनस्पति देव, शमिता देव और अग्नि इन हवियों
को ग्रहण करने की कृपा करें. (३५)
सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानांमभवत् पुरोगाः.
अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहाकृत छँ हविरदन्तु देवाः.. (३६)
यजुर्वेद - ३४९
उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
हे अग्नि! आप उत्पन्न होते ही देवताओं का नेतृत्व करते हैं. आप देवताओं
का आह्वान करते हैं. आप पूर्व दिशा में ज्योति स्वरूप स्थित हैं. देवगण आप के
मुख में स्वाहाकार रूप से समर्पित आहुति ग्रहण करते हैं. ( ३६ )
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या ऽ अपेशसे. समुषद्भिरजायथाः.. (३७)
हे अग्नि! आप अज्ञानी को ज्ञानी बनाते हैं. आप अपरूप को सुंदर रूप प्रदान
करते हैं. आप उषा देवी के साथ उत्पन्न होते हैं. ( ३७ )
जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वर्मी याति समदामुपस्थे.
अनाविद्धया तन्वा जय त्व १७ स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु.. (३८)
युद्ध के लिए जाते हुए कवचधारी बादल की भांति शोभित होते हैं. वीर
घायल हुए बिना जीतें. वह आप की कवच की महिमा आप की रक्षा करने की
कृपा करें. ( ३८ )
धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना तीव्राः समदो जयेम.
धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम.. (३९)
धनुष से हम गायों को जीतें. धनुष से हम सदा युद्ध व मार्ग जीतें. धनुष शत्रु
का बुरा करने वाला हो. धनुष से हम सारी प्रदिशाओं को जीतें. ( ३९ )
वक्ष्यन्तीवेदा गनीगन्ति कर्णं प्रिय १७ सखायं परिषस्वजाना.
योषेव शिङ्क्ते वितताधि धन्वञ्ज्या इय १७ समने पारयन्ती.. (४०)
धनुष की प्रत्यंचा को योद्धा कान तक खींचता है. उस समय ऐसा लगता है,
जैसे योद्धा उस का मित्र है. वह उस के कान में कुछ कहना चाहती है. वह प्रत्यंचा
युद्ध में विजय दिलाने वाली है. वह प्रत्यंचा धनुष पर चढ़ कर अत्यंत आवाज करती
है. बाण उस का मित्र है. वह उस से मिलती है. ( ४० )
ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृतामुपस्थे.
अप शत्रून् विध्यता १७ संविदाने आर्नी इमे विष्फुरन्ती अमित्रान्.. (४१)
जैसे मां बेटे को गोद में लेती है, वैसे ही प्रत्यंचा बाण को धारण करती है. यह
प्रत्यंचा समान मन वाली स्त्री जैसा आचरण करती है. यह डोरी शत्रुओं का संहार करे.
यह डोरी झनझनाती हुई अमित्रों का विनाश करने की कृपा करे. ( ४१ )
बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्य.
इषुधिः सङ्कः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः.. (४२)
यह तरकस बहुतों का पिता है. बहुत से इस के पुत्र हैं. इस के संरक्षण में
रहते हैं. तरकस पीठ पर बंधता है. यह सेना के सभी योद्धाओं पर विजय पाता
है. ( ४२ )
३५० - यजुर्वेद
उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
रथे॑ ति॒ष्ठन् न॑यति वा॒जिनः॑ पु॒रो यत्र॑ यत्र का॒मय॑ते सुषा॒रथिः॑..
अ॒भीशू॑नां महि॒मानं॑ पनायत॒ मनः॑ प॒श्चाद॑नु॒ यच्छ॑न्ति र॒श्मयः॑.. (४३)
रथ पर बैठा हुआ अच्छा सारथी जहांजहां चाहता है, वहांवहां अश्वों को ले
जाता है. लगाम की भी प्रशंसा की जानी चाहिए. वे घोड़ों के मन को अपने नियंत्रण
में रखती हैं, जहां चाहती हैं, वही उन्हें ले कर जाती हैं. (४३)
ती॒व्रान् घोषा॑न् कृण्वते वृषपा॒णयो॑श्वा॒ रथे॑भिः स॒ह वा॒जय॑न्तः..
अव॒क्राम॑न्तः प्रप॒दैरि॒मित्रान्॑ क्षि॒णन्ति॒ शत्रूँ १॒ र॒नप॑व्ययन्तः.. (४४)
घोड़ों की लगाम जिन के हाथ में है, वे लोग तीव्र घोष करते हैं. घोड़े रथ के साथ
जाते हैं. वे अपने पैरों से शत्रुओं को रौंदें. अश्व शत्रुओं का नाश करते हैं. (४४)
र॒थ॒वाह॑न॒ ᳪ॒ ह॒विर॑स्य॒ नाम॒ यत्रा॑यु॒धं निहि॑तमस्य॒ वर्म॑.
तत्रा॒ रथमुप॑ श॒ग्मं ᳪ॒ सदे॑म विश्वा॒हा व॒य ᳪ॒ सु॑मन॒स्यमा॑नाः.. (४५)
रथ वाहन इस का नाम है, जहां आयुध रखे हैं, जहां कवच रखे हैं, अच्छे मन
वाले होते हुए हम सभी इस रथ में बैठें. (४५)
स्वा॒दु॒ष ᳪ॒षदः॑ पि॒तरो॑ वयो॒धाः कृ॑च्छ्रे॒श्रितः॒ शक्ती॑वन्तो गभी॒राः.
चि॒त्रसे॑ना॒ ऽ इषु॑बला॒ ऽ अमृ॑ध्राः स॒तोवी॑रा॒ ऽ उ॒रवो॑ व्रातसा॒हाः.. (४६)
हमारे रथ सदन में रहने वाले, पालक, आयुधारी, संरक्षी, सहनशील, शक्तिमान,
गंभीर, अच्छी सेना से संपन्न व अतीव बलशाली हैं. वे संकल्पशील और शत्रुओं का
मुकाबला करने वाले हैं. (४६)
ब्रा॒ह्म॒णासः॑ पि॒तरः॑ सोम्या॑सः॒ शिवे॑ नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॑ने॒हसा॑.
पू॒षा नः॑ पातु दुरि॒तादृ॑तावृधो॒ रक्षा॒ माकि॑र्नो अ॒घश॑ ᳪ॒ स ई॑शत.. (४७)
ब्राह्मणगण, पितरगण, व सोमरस पीने वाले हमारी रक्षा करें. कल्याणकारी
देव हमारी रक्षा करें. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक हमें पापों से रोकें. पूषा देव हमारी
रक्षा करें, अवरोधों व पापों को हम से दूर करें. कोई पापी हम पर शासन न कर
पाए. (४७)
सु॒प॒र्णं व॑स्ते मृ॒गो अ॑स्या॒ दन्तो॒ गोभिः॒ संन॑द्धा पतति॒ प्रसू॑ता.
यत्रा॒ नरः॒ सं च॒ वि च॒ द्रव॑न्ति॒ तत्रा॒स्मभ्य॒मिष॑वः॒ शर्म॑ य ᳪ॒ सन्.. (४८)
बाण अच्छा पंख धारता है. इस के दांत शत्रुओं को ढूंढ़ लेते हैं. यह शत्रुओं पर
गिरता है. जहां कहीं शत्रु जाते हैं, वहां यह शत्रुओं पर गिरता है. बाण हमारे लिए
अहानिकर व कल्याणकारी हों. (४८)
ऋजी॑ते॒ परि॑ वृङ्धि नो॒श्मा भ॑वतु नस्त॒नूः.
सोमो॒ अधि॑ ब्रवीतु नोदि॑तिः॒ शर्म॑ यच्छतु.. (४९)
यजुर्वेद - ३५१
उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
हे बाण! आप सरल रहिए. आप हम पर मत गिरिए. हमारे तन पत्थर की तरह
सख्त हो जाएं. सोम देव हमारी ओर बोलें. अदिति देव हमें सुख देने की कृपा
करें. (४९)
आ जङ्घन्ति सान्वेषां जघनाँ २ उप जिघ्नते.
अश्वाजनि प्रचेतसोश्वान्तसमत्सु चोदय.. (५०)
हे अश्व प्रेरक! चाबुक आप घोड़ों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दें. चेते हुए मन
वाले घुड़सवार घोड़ों के उभरे अंग पर चोट करते हैं. उन के पुट्ठों पर चाबुक
चलाते हैं. चाबुक घोड़ों को प्रेरित करने वाले हों. (५०)
अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः.
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमा ँस् सं परि पातु विश्वतः.. (५१)
सांप की तरह बाहु से लिपटता है. प्रत्यंचा के प्रहार को हटाता है. विद्वान्
वीर पुरुष सब की सब ओर से रक्षा करता है. वीर सभी शत्रुओं को मार कर रक्षा
करता है. (५१)
वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया ऽ अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः.
गोभिः सन्नद्धो असि वीडयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि.. (५२)
रथ वनस्पति (लकड़ी) से बना हुआ है. रथ हमारा मित्र हो. सुवीर इस के
द्वारा युद्ध में पार पाए. हम गायों से जुड़े रहें. हम वीरतापूर्वक स्थित रहें. वीर सभी
को जीत सकें. (५२)
दिवः पृथिव्याः पर्योज उद्धृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृत ँस् सहः.
अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्र ँस् हविषा रथं यज.. (५३)
हे पुरोहितो! आप स्वर्ग और पृथ्वी के तेज को सर्वत्र फैलाइए. वनस्पति से उगे
प्राप्त हुए तेज को सर्वत्र फैलाइए. जल के साथ प्राप्त हुए तेज को सर्वत्र फैलाइए.
इंद्र के वज्र की तरह हम रथ को यज्ञीय कार्य में लगाएं. रथ सूर्य की किरणों के
समान चमकता है. (५३)
इन्द्रस्य वज्रो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः.
सेमां नो हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय.. (५४)
हे रथ! आप दिव्य, इंद्र के वज्र जैसे व मरुतों की सैन्यशक्ति की भांति दृढ़ हैं.
आप मित्र देव के गर्भ व वरुण देव की नाभि हैं. रथ में बैठे देवता हमारे द्वारा भेंट
किए गए हवि को ग्रहण कर के तृप्त होने की कृपा करें. (५४)
उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत्.
स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून्.. (५५)
३५२ - यजुर्वेद 632/22
उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
हे दुंदुभि! आप पृथ्वी व स्वर्गलोक को गुंजाइए. आप को पूरा जगत् जान व
मान सके. आप देवों व इंद्र देव से प्रेम रखते हैं. आप शत्रुओं को हम से दूर रखने
की कृपा करें. ( ५५ )
आ क्रन्दय बलमोजो न ऽ आधा निष्ठेनिहि दुरिता बाधमानः.
अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना ऽ इत ऽ इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीडयस्व.. (५६)
हे दुंदुभि! आप की आवाज सुन कर ही शत्रु क्रंदन करने लगे. आप हमें तेजस्वी
बनाइए. आप हमें पापों से दूर कीजिए. आप इंद्र देव की मुट्ठी जैसे मजबूत होइए.
हमारी सेना के पास जो शत्रु आए. आप पूरी तरह उन का नाश कीजिए. ( ५६ )
आमूरज प्रत्यावर्तयेमाः केतुमद्दुन्दुभिर्वावदीति.
समश्वपर्णाश्चरन्ति नो नरोस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु.. (५७)
हे इंद्र देव! हमारे रथों की विजय पताका फहराइए. हम दुंदुभि बजाते हुए लौटें.
हमारे समर्पित योद्धा घोड़े घूमते हैं. हमारे रथी जीतें, हमारे लोग जीतें. ( ५७ )
आग्नेयः कृष्णग्रीवः सारस्वती मेषी बभ्रुः सौम्यः पौष्णः श्यामः शितिपृष्ठो
बार्हस्पत्यः शिल्पो वैश्वदेव ऽ ऐन्द्रोरुणो मारुतः कल्माष ऽ ऐन्द्राग्नः स १४ हितोधोरामः
सावित्रो वारुणः कृष्ण ऽ एकशितिपात्पेत्वः.. (५८)
काली गरदन वाला पशु अग्नि, मेषी सरस्वती देवी, भूरे रंग का पशु सोम से,
श्याम रंग का पूषा देव से संबंधित है. काली पीठ वाला पशु बृहस्पति देव व शिल्प
बहुत से देवों से लाल रंग का पशु इंद्र देव व चितकबरे पशु मरुद् देव, बलवान
पशु इंद्र और अग्नि, नीचे सफेद रंग वाले सूर्य देव व एक पैर सफेद और शेष काले
अंगों वाले वेगशील पशु वरुण देव से संबंधित हैं. ( ५८ )
अग्नयेनीकवते रोहिताञ्जिरनड्वानधोरामौ सावित्रौ पौष्णौ रजतनाभी वैश्वदेवौ पिशङ्गौ
तूपरौ मारुतः कल्माष ऽ आग्नेयः कृष्णोजः सारस्वती मेषी वारुणः पेत्वः.. (५९)
लाल चिह्न वाला वृषभ ज्वाला वाले अग्नि, नीचे स्थान से सफेद रंग वाले दो
पशु सविता देव, चांदी जैसे रंग की नाभि वाले दो पशु पूषा देव, ऊपर पीले रंग के
सींग वाले दो पशु विश्व से व चितकबरा पशु मरुत् देव से संबंधित है. काला अज
अग्नि, मेषी सरस्वती व पतनशील पशु वरुण देव से संबंधित हैं. ( ५९ )
अग्नये गायत्राय त्रिवृते राथन्तरायाष्टकपाल ऽ इन्द्राय त्रैष्टुभाय पञ्चदशाय
बार्हतायैकादशकपालो विश्वेभ्यो देवेभ्यो जागतेभ्यः सप्तदशेभ्यो वैरूपेभ्यो
द्वादशकपालो मित्रावरुणाभ्यामानुष्टुभाभ्यामेकवि १४ शाभ्यां वैराजाभ्यांपयस्या
बृहस्पतये पाङ्क्ताय त्रिणवाय शाक्वराय चरुः सवित्र ऽ औष्णिहाय त्रयस्त्रि १४ शाय
रैवताय द्वादशकपालः प्राजापत्यश्चरुरदित्यै विष्णुपत्न्यै चरुरग्नये वैश्वानराय
यजुर्वेद - ३५३
उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
द्वादशकपालोनुमत्यै ऽ अष्टाकपालः.. (६०)
गायत्री छंद अग्नि से संबंधित है. त्रिवृत और रथांतर साम से स्तुत है.
अष्टाकपाल, पंचदेश, बृहत्साम वाली स्तुति व ग्यारह कपालों वाली हवि इंद्र देव
के लिए है. जगती छंद और सत्रह स्तोत्र विश्वों से संबंधित हैं. वैरूप साम वाली
स्तुति, बारह कपालों में सुसंस्कृत कर के रखी हुई हवि, अनुष्टुप् छंद वाली स्तुति
मित्रावरुण व इक्कीस स्तोत्र वाली स्तुति मित्रावरुण के लिए है. वैरूप साम से
मित्रावरुण देव स्तुत है. पंक्तिछंद बृहस्पति देव से संबंधित है. बृहस्पति देव
त्रिणव से स्तुत हैं. बृहस्पति शाक्वर साम से स्तुत है. चरु बृहस्पति देव के लिए
है. उष्णिक् छंद सविता देव से संबंधित है. सविता देव प्रायश्चित्त व रैवत साम
से स्तुत है. बारह कपालों से परिष्कृत हवि सविता देव के लिए रखी है. चरु
प्रजापति से संबंधित है. विष्णु की पत्नी और अदिति देव के लिए यज्ञ से संबंधित
पदार्थ समर्पित है. वैश्वानर देव के लिए बारह कपालों में परिष्कृत हवि है. अग्नि
के लिए बारह कपालों में परिष्कृत और अनुमति देव के लिए आठ कपालों में
परिष्कृत हवि है. (६०)
३५४ - यजुर्वेद
तीसवां अध्याय
तीसवां अध्याय
देव सवितः प्र सुव यज्ञं प्र सुव यज्ञपतिं भगाय.
दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु.. (१)
हे सविता देव! आप प्रमुख उत्पादक व यज्ञ के जनक हैं. आप यज्ञपति को
भाग्य प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप दिव्य गंधर्व और पवित्र विचारों वाले हैं.
आप हमारी विचार वाणी को भी पवित्र बनाने की कृपा कीजिए. आप वाणी पति
हैं. आप हमें भी मधुर वचन दीजिए. ( १ )
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. (२)
हे सविता देव! आप वरेण्य और देवताओं के लिए सौभाग्य धारते हैं. आप
हमारी बुद्धि को भी प्रेरित करने की कृपा कीजिए. ( २ )
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव. यद्भद्रं तन्न ऽ आ सुव.. (३)
हे सविता देव! आप सब देवों के देव हैं. आप हमारी कमियों को दूर कीजिए.
आप जो भी हमारे लिए भद्र है, उसे लाने की कृपा कीजिए. ( ३ )
विभक्तार थ्४ हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः. सवितारं नृचक्षसम्.. (४)
हे सविता देव! हम आप का आह्वान करते हैं. आप संरक्षक, धनवान, प्रेरक व
सभी को संपत्ति देने वाले हैं. ( ४ )
ब्रह्मणे ब्राह्मणं क्षत्राय राजन्यं मरुद्भ्यो वैश्यं तपसे शूद्रं तमसे तस्करं नारकाय वीरहणं
पाप्मने क्लीब माक्रयाया ऽ अयोगूं कामाय पुँश्चलूमतिक्रुष्टाय मागधम्.. (५)
ब्राह्मण के लिए ब्रह्मज्ञान, क्षत्रिय के लिए रक्षण, वैश्य के लिए पालनपोषण,
शूद्र के लिए सेवा कर्तव्य व उपयुक्त हैं. चोर के लिए अंधकार, नरक के लिए
वीरघातक, नपुंसक के लिए पाप, खरीद के लिए पुरुषार्थी, काम के लिए व्यभिचारी
अच्छी बोलने की शक्ति के लिए प्रमाण देने वाला उपयुक्त होता है. ( ५ )
नृत्ताय सूतं गीताय शैलूषं धर्माय सभाचरं नरिष्ठायै भीमलं नमय रेभ थ्४ हसाय
कारिमानन्दाय स्त्रीषखं प्रमदे कुमारीपुत्रं मेधायै रथकारं धैर्याय तक्षाणम्.. (६)
यजुर्वेद - ३५५
उत्तरार्ध तीसवां अध्याय
उत्तरार्ध तीसवां अध्याय
अंग चालन हेतु सूत, गीत के लिए नट, धर्म के लिए सभासद, नेतृत्व हेतु
क्षमतावान, नरमाई हेतु मधुरभाषी, मनोविनोद हेतु स्वांग करने वाला उपयुक्त रहता
है. आनंद प्राप्ति के लिए स्त्रियों के प्रति सख्य भाव, प्रबल मद ( से उन्मत्त ) के लिए
कुमारी ( वीरांगना ) पुत्र, मेधावी के लिए रथकार और धैर्य के लिए गढ़िया ( गढ़ाई
करने वाला ) उपयुक्त है. ( ६ )
तपसे कौलालं मायायै कर्मार १४ रूपाय मणिकार १४ शुभे वप १४ शरव्याया ऽ इषुकार १४
हेत्यै धनुष्कारं कर्मणे ज्याकारं दिष्टाय रज्जुसर्जं मृत्यवे मृगयु मन्तकाय श्वनिनम्.. ( ७)
तपाने के लिए कुम्हार, माया के लिए कारीगर, रूप के लिए मणिकार, शुभ
कार्य के लिए काटछांट में प्रवीण, लक्ष्यभेदी बाण के लिए इषुकार, आयुध के
लिए धनुष्कार, कर्म के लिए ज्याकार ( डोरी बनाने वाले ), आज्ञा देने हेतु
रज्जुसर्जक ( रस्सी बनाने वाले ), मृत्यु के लिए कसाई, यम के लिए कुत्ते पालक
की नियुक्ति की जानी चाहिए. ( ७ )
नदीभ्यः पौञ्जिष्ठ मृक्षीकाभ्यो नैषादं पुरुषव्याघ्राय दुर्मदं गन्धर्वाप्सरोभ्यो व्रात्यं
प्रयुग्भ्य ऽ उन्मत्त १४ सर्पदेवजनेभ्योप्रतिपदमयेभ्यः कितव मीर्यताया ऽ अकितवं
पिशाचेभ्यो विदलकारीं यातुधानेभ्यः कण्टकीकारीम्.. ( ८)
नदियों के लिए नाविक, रीछ आदि के लिए वनचरों ( निषाद ), शेर की तरह
दुर्दम्य पुरुष के लिए प्रबल प्रतापी को, गंधर्व और अप्सराओं के लिए असंस्कारित,
शोधार्थी हेतु उन्मत्त को, सांप, मनुष्य और देवों के लिए ज्ञानी को, जुए के लिए
जुए में कुशल व्यक्ति को, उन्नति के लिए छलकपट मुक्त को पिशाचों के लिए
हृदय विदीर्ण करने वाले राक्षस जैसे लुटेरों के लिए रास्ते में कांटे ( रोड़े ) अटकाने
वालों को नियुक्त किया जाना चाहिए. ( ८ )
सन्ध्ये जारं गेहायोपपति मार्त्यै परिवित्तं निर्ऋत्यै परिविविदान मराध्या ऽ एदिधिषुः
पतिं निष्कृत्यै पेशस्कारी १४ संज्ञानाय स्मरकारीं प्रकामोद्यायोपसदं वर्णायनुरुधं
बलायोपदाम्.. ( ९)
संधि के लिए मित्र को, घर के लिए उपमुखिया को, गरीबी के लिए धनी को,
आपातकाल में साधन जुटाने में दक्ष को, सिद्धि के लिए हित को सर्वोपरि मानने
वाले, संस्कार हेतु शुद्धिकरण में कुशल को, ज्ञानप्राप्ति हेतु कार्य कुशल को,
अचानक काम आ पड़ने पर पास वाले व्यक्ति को, स्वीकार कराने के लिए आग्रह
में दक्ष को तथा बल हेतु सहारा देने वाले को नियुक्त करना चाहिए. ( ९ )
उत्सादेभ्यः कुब्जं प्रमुदे वामनं द्वाभ्यः स्राम १४ स्वप्नायान्धमधर्माय बधिरं पवित्राय
भिषजं प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्श माशिक्षायै प्रश्निन मुपशिक्षायै ऽ अभिप्रश्निनं मर्यादायै
प्रश्नविवाकम्.. ( १०)
३५६ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध तीसवां अध्याय
शत्रुओं के नाश हेतु तलवार वाले को, मनोरंजन हेतु बौने को, द्वार हेतु मेहनती
को नियुक्त किया जाना चाहिए. सपने के लिए चक्षुहीन का, अधर्म के लिए बहरे
का अनुकरण करना चाहिए. पवित्रता के लिए वैद्य, अच्छे ज्ञान के लिए नक्षत्र
विज्ञानी, अशिक्षा हेतु प्रश्नकर्ता, उपशिक्षा हेतु अभिप्रश्न कर्ता और मर्यादा के लिए
प्रश्न कर्त्ता को नियुक्त करना चाहिए. (१०)
अर्मेभ्यो हस्तिपं जयायाश्वपं पुष्ट्यै गोपालं वीर्यायाविपालं तेजसेजपालमिरायै कीनाशं
कीलालाय सुराकारं भद्राय गृहप ᳪ श्रेयसे वित्तधमाध्यक्षायानुक्षत्तारम्.. (११)
भारी वाहन हेतु हाथी पालक को, तेज गति हेतु अश्व पालक को, पुष्टि हेतु
ग्वाले को, वीर्य हेतु भेड़ पालक को, तेज हेतु बकरी पालक को, अन्नवृद्धि हेतु
किसान को, अमृत जैसे पेय हेतु अमृत विशेषज्ञ को, सुख कल्याण हेतु गृहपति, श्रेय
हेतु धनवान को, अध्यक्षता हेतु निरीक्षक को नियुक्त किया जाना चाहिए. (११)
भायै दार्व्वाहारे प्रभाया ऽ अग्न्येधं ब्रध्नस्य विष्टपायाभिषेक्तारं वर्षिष्ठाय नाकाय परिवेष्टारं
देवलोकाय पेशितारं मनुष्यलोकाय प्रकरितार ᳪ सर्वेभ्यो लोकेभ्य ऽ उपसेक्तारमव ऋत्यै
वधायोपमन्थितारं मेधाय वास: पल्पूलीं प्रकामाय रजयित्रीम्.. (१२)
अग्नि हेतु लकड़हारे, प्रकाश हेतु अग्नि जलाने वाले, गरमी के लिए जल
बरसाने वाले को, स्वर्ग जैसे सुख हेतु चारों ओर से घेरने वाले को, देवलोक हेतु
सुंदर आकार बनाने वाले को, मनुष्यलोक हेतु प्रसार करने वाले को, सभी लोकों
के लिए संतोष देने वाले को, वध के लिए हल्ला मचाने वाले को नियुक्त किया
जाना चाहिए. बुद्धि पाने के लिए वस्त्र क्षालन, शोभा हेतु चित्रकारी के ज्ञाता का
अनुकरण करना चाहिए. (१२)
ऋतये स्तेनहृदयं वैरहत्याय पिशुनं विविक्तयै क्षत्तार मौपद्रष्ट्र्यायानुक्षत्तारं बलायानुचरं
भूम्ने परिष्कन्दं प्रियाय प्रियवादिन मरिष्ट्या ऽ अश्वसाद ᳪ स्वर्गाय लोकाय भागदुघं
वर्षिष्ठाय नाकाय परिवेष्टारम्.. (१३)
शत्रु के लिए गुप्त हृदय वाला, वैरी की हत्या हेतु चुगलखोर, भेद के लिए भेद
करने वाले को, निरीक्षण के लिए निरीक्षक को, बल हेतु आज्ञा पालक को, क्षेत्र
विशेष हेतु भ्रमणशील को, प्रिय के लिए प्रिय बोलने वाले को, अरिष्ट निवारण
हेतु घुड़सवार को, स्वर्ग के लिए भाग्यदोहक को अच्छे सुख के लिए सब ओर से
वेष्टित (घेरने) वाले को नियुक्त करना चाहिए. (१३)
मन्यवेयस्तापं क्रोधाय निसरं योगाय योक्तार ᳪ शोकायाभिसर्त्तारं क्षेमाय विमोक्तार
मुत्कूलनिकूलेभ्यस्त्रिष्ठिनं वपुषे मानस्कृत ᳪ शीलायाञ्जनीकारीं निर्ऋत्यै कोशकारीं
यमायासूम्.. (१४)
क्रोध लोहे को भी ताप देने वाला होता है. क्रोध की शांति हेतु जग को निस्सार
यजुर्वेद - ३५७
उत्तरार्ध तीसवां अध्याय
समझने वाले की नियुक्ति करनी चाहिए. योग के लिए योगी को नियुक्त करना
चाहिए. शोक के लिए सांत्वना देने वाले को नियुक्त करना चाहिए. संरक्षण के लिए
मुक्ति दाता को नियुक्त करना चाहिए. उतारचढ़ाव हेतु ऊंचनीच में दक्ष को, शरीर हेतु
मनोनुकूल आचरण करने वाले को, शालीनता हेतु आंख शुद्ध करने वाले को,
नियुक्त किया जाना चाहिए. विपत्ति हेतु संचय नीति को यमनियम आदि हेतु असूया
(ईर्ष्या रहित) को नियुक्त किया जाना चाहिए. (१४)
यमाय यमसू॒मथ॑र्वभ्योवतो॒का थ्४ सं॑वत्स॒राय॑ पर्या॒यिणीं॑
प॒रि॒व॒त्स॒राया॑विजा॒तामि॒दाव॑त्सरायातीत्वरीमिद्वत्स॒राया॑तिष्क॒द्वरीं॑ वत्स॒राय विज॑र्जरा थ्४
सं॑वत्स॒राय॑ पलिक्री॒मृभुभ्यो॑जिनस॒न्ध थ्४ सा॒ध्येभ्य॑श्चर्म॒म्नम्.. (१५)
हे परमात्मा! यम के लिए नियम में समर्थ स्त्री को नियुक्त करना चाहिए.
अहिंसकों के लिए अवतोका नामक स्त्री को नियुक्त करना चाहिए. संवत्सर हेतु
समय की व्यवस्था जानने वाली की नियुक्ति की जानी चाहिए. परिवत्सर के लिए
कुंआरी को, इदावत्सर हेतु गतिशील को, अनुवत्सर हेतु ज्ञानवती को, वत्सर या
अनुवत्सर हेतु वृद्धा को, संवत्सर हेतु श्वेत बालों वाली वृद्धा को नियुक्त करना
चाहिए. ऋभु हेतु पराजित न होने वाले से मित्रता की जानी चाहिए. साध्य हेतु विशेष
धर्म ज्ञानी की नियुक्ति की जानी चाहिए. (१५)
स॒रोभ्यो॑ धैव॒रमुप॑स्थावरा॒भ्यो दाशं॑ वैशन्ता॒भ्यो वैन्दं॑ नड्वला॒भ्यः शौष्कलं॑ पारा॒य
मा॒र्गा॒रम॑वारा॒य कैव॒र्तं तीर्थेᳪभ्य ऽ आ॒न्दं वि॑षमे॒भ्यो मैनाल॑ थ्४ स्व॒नेभ्यः॑ पर्ण॒कं गुहा॑भ्यः
किरा॒तं थ्४ सानु॑भ्यो जम्भ॒कं पर्व॑तेभ्यः किम्पू॒रुषम्.. (१६)
तालाब हेतु मछुआरों को, उपवन हेतु सेवकों को, छोटे तालाब हेतु निषादों
को, नडवल हेतु मछली से जीविका निर्वाहक को नियुक्त किया जाना चाहिए. पार
जाने के लिए रास्ता जानने वाले को, उस पार से इस पार आने वाले के लिए केवट
को, तीर्थ के लिए बाड़ बांधने वाले को, असमान स्थान के लिए किनारा लगाने
वाले को नियुक्त करना चाहिए. मधुर ध्वनि के लिए तुरही वादक की, गुफाओं के
लिए भीलकिरात की, शिखर के लिए प्रचंड व्यक्ति की और पर्वत के लिए छोटे
पुरुषों की नियुक्ति की जानी चाहिए. (१६)
बी॒भ॒त्सायै॑ पौल्क॒सं वर्णा॑य हिरण्यका॒रं तु॒लायै॑ वाणि॒जं प॒श्चाद्दो॒षाय॑ ग्ला॒विनं॑ विश्वे॑भ्यो
भू॒तेभ्यः॑ सि॒ध्मलं॑ भू॒त्यै जा॒गर॑णमभू॒त्यै स्वप॑नमार्त्यै जनवा॒दिनं॑ व्यृद्ध्या ऽ अपग॒ल्भं थ्४
स थ्४ श॒राय॑ प्रच्छि॒दम्.. (१७)
बीभत्स (भयंकर/घृणित) कामों के लिए अनगढ़ (निर्दय) लोगों की
नियुक्ति की जानी चाहिए. अच्छे वर्ण के लिए सुनार, तौलने के लिए बनिए की
नियुक्ति करनी चाहिए. बाद में दोष देने के लिए नाराज व्यक्ति को, सभी प्राणियों
के लिए सिद्धिदायक व्यक्ति को नियुक्त करना चाहिए. समृद्धि हेतु जागरणशील
३५८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध तीसवां अध्याय
को, असमृद्धि हेतु स्वप्नजीवी को, पीड़ा से मुक्ति के लिए सावधान करने वाले
को, उन्नति ( बढ़ोतरी ) हेतु अभिमान रहित को, बाण निशाने पर साधने के लिए
लक्ष्य साधक को नियुक्त करना चाहिए. ( १७ )
अक्षराजाय कितवं कृतायादिनवदर्शं त्रेतायै कल्पिनं द्वापरायाधिकल्पिन मास्कन्दाय
सभास्थाणुं मृत्यवे गोव्यच्छमन्तकाय गोघातं क्षुधे यो गां विकृन्तन्तं भिक्षमाण ऽ
उपतिष्ठति दुष्कृताय चरकाचार्यं पाप्मने सैलग्म्.. (१८)
जुआ खेलने के लिए द्यूतकार, क्रियाशील हेतु समीक्षा करने वाले, त्रेता के
लिए कल्पनाकार, द्वापर हेतु अकल्पनाकार की नियुक्ति की जानी चाहिए.
आक्रमण जैसी स्थिति में स्थिर मति वाला ठीक रहता है. मृत्यु की स्थिति में इंद्रियों
का अनुकरण कर्ता ठीक रहता है. यमराज हेतु गौ घाती, भूख हेतु भीख मांगने
वाले, पाप के निवारण के लिए चरकाचार्य और दुष्टों के लिए कठोर दंड दे सकने
वाले की नियुक्ति की जानी चाहिए. ( १८ )
प्रतिश्रुत्काया ऽ अर्तनं घोषाय भषमन्ताय बहुवादिनमनन्ताय मूक १७
शब्दायाडम्बराघातं महसे वीणावादं क्रोशाय तूणवध्म मवरस्पराय शङ्खध्मं वनाय
वनपमन्यतोरण्याय दावपम्.. (१९)
प्रतिज्ञा के लिए उस को निबाह सकने वाले की नियुक्ति की जानी चाहिए.
योजना के लिए उद्घोषक को, विवाद निर्णय हेतु चुप रहने वालों को, बहुवादी
हेतु आडंबर का आघात करने वाले को, महिमा हेतु वीणावादक को, भीषण
स्वर के लिए ढोल बजाने वाले को, ठीकठीक आवाज हेतु शंख वादक को, वन
रक्षार्थ वन रक्षक को, अन्य वनों की रक्षा के लिए दावानल रक्षक को नियुक्त
करना चाहिए. ( १९ )
नर्माय पुँश्चलू १७ हसाय कारिं यादसे शाबल्यां ग्रामण्यं गणकमभिक्रोशकं तान्महसे
वीणावादं पाणिघ्नं तूणवध्मं तान्नृत्तायानन्दाय तलवम्.. (२०)
मनोरंजन हेतु पुरुषों के पीछे चलने वाली, हंसाने में नक्काल, जल जंतुओं को
मारने में नीच जाति वालों की नियुक्ति की जानी चाहिए. स्वागतसत्कार के लिए
ग्रामीण ज्योतिषी और व्यवहार कुशल व्यक्ति की नियुक्ति की जानी चाहिए. नृत्य
हेतु वीणावादक, तालवादक और स्वरवादक की नियुक्ति की जानी चाहिए. आनंद
हेतु तालीवादक की नियुक्ति की जानी चाहिए. ( २० )
अग्नये पीवानं पृथिव्यै पीठसर्पिणं वायवे चाण्डालमन्तरिक्षाय व १७ शनर्तिनं दिवे
खलति १७ सूर्याय हर्यक्षं नक्षत्रेभ्यः किर्मिरं चन्द्रमसे किलासमह्रे शुक्लं पिङ्गाक्ष १७
रात्र्यै कृष्णं पिङ्गाक्षम्.. (२१)
आग से जुड़े कार्य हेतु पुष्ट को, पृथ्वी के लिए आसन पर बैठने वाले को,
यजुर्वेद - ३५१
उत्तरार्ध तीसवां अध्याय
वायु को सहने के लिए चांडाल को, अधर में लटकने जैसे काम के लिए बांस पर
नृत्य करने वाले को नियुक्त करना चाहिए. स्वर्गलोक हेतु खगोल विज्ञानी को, सूर्य
हेतु हरे रंग वाले को, नक्षत्रों के लिए नारंगी रंग जानने वाले को, चंद्रमा हेतु किलास
( चर्म रोग विशेष ) वाले को, सफेद रंग हेतु पीली आंख वाले को, रात्रि के लिए
कालीपीली आंखों वालों को नियुक्त किया जाना चाहिए. ( २१ )
अथैतानष्टौ विरूपान लभतेतिदीर्घ चातिह्रस्वं चातिस्थूलं चातिकृशं चातिशुक्लं
चातिकृष्णं चातिकुल्वं चातिलोमशं च.
अशूद्रा ऽ अब्राह्मणास्ते प्राजापत्याः मागधः पुँश्चली कितवः क्लीबोशूद्रा ऽ
अब्राह्मणास्ते प्राजापत्याः.. (२२)
इस प्रकार इन आठों अति दीर्घ, अतिह्रस्व, अतिस्थूल, अतिकृश, अतिशुक्ल,
अतिकृष्ण, रोम रहित व रोम सहित को तथा इन चार प्रकार के चाटुकार,
चरित्रहीन, जुआरी, नपुंसक ऐसे ब्राह्मणत्वहीन अशूद्र प्रजापालक को सौंप देना
चाहिए. ( २२ )
३६० – यजुर्वेद
इकतीसवां अध्याय
इकतीसवां अध्याय
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्.
स भूमि १४ सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्.. ( १ )
परम पुरुष हजारों सिर वाला, हजारों नेत्रों वाला व हजारों पैर वाला है. वह
परम पुरुष सारे ब्रह्मांड को घेर कर भी दस अंगुली ऊपर अधिष्ठित है. ( १ )
पुरुष ऽ एवेद १४ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्.
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति.. ( २ )
जो हो चुका है और जो होने वाला है वह परम पुरुष ही है. वह अमरता का
स्वामी है. जो अन्न से बढ़ोतरी पाते हैं, उन के भी वही स्वामी हैं. ( २ )
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः.
पादोस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. ( ३ )
परम पुरुष अत्यंत महिमावान है. इस के चरणों में सभी प्राणी हैं. इस का
एक भाग पृथ्वी पर है, जिस में सब प्राणी हैं और तीन भाग स्वर्गलोक में स्थित
हैं. ( ३ )
त्रिपादूर्ध्व ऽ उदौत्पुरुषः पादोस्येहाभवत् पुनः.
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि.. ( ४ )
परम पुरुष के तीन पैर ऊर्ध्वलोक में समाए हुए हैं. एक भाग में इहलोक
समाहित है. जड़, चेतन सभी इस के इस पैर में समाहित हैं. ( ४ )
ततो विराजडजायत विराजो अधि पूरुषः.
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः.. ( ५ )
उस परम पुरुष से विराट् उपजा. विराट् से सृष्टि उपजी. उस से भूमि पैदा हुई
फिर जीव पैदा हुए. ( ५ )
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्.
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये.. ( ६ )
यजुर्वेद - ३६१
उत्तरार्ध इकतीसवां अध्याय
उस विराट् के यज्ञ से घी प्राप्त हुआ, जिस से सब को आहुति दी जाती है. उसी
विराट् से पक्षी, पशु, गांव के जीव, जानवर उपजे. ( ६ )
तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऽ ऋचः सामानि जज्ञिरे.
छन्दा १५ं सि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत.. (७)
उस विराट् यज्ञ रूपी पुरुष से ऋग्वेद प्रकटा. उसी से सामवेद प्रकटा. उसी से
यजुर्वेद प्रकट हुआ. उसी से अथर्ववेद का प्रादुर्भाव हुआ. ( ७ )
तस्मादश्वा ऽ अजायन्त ये के चोभयादतः.
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता ऽ अजावयः... (८)
उसी विराट् यज्ञ रूपी पुरुष से दोनों ओर दांतों वाले जीव उपजे. उसी से घोड़े
उपजे. उसी से बकरियां उपजीं. उसी से भेड़ आदि उपजे. ( ८ )
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः.
तेन देवा ऽ अयजन्त साध्या ऽ ऋषयश्च ये.. (९)
सब से पहले यज्ञ से बाहर आए उस पुरुष को पूजा. उसी से देवताओं, ऋषियों
और साधकों ने यज्ञ को उपजाया. ( ९ )
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्.
मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा ऽ उच्येते.. (१०)
संकल्प से प्रकटे विराट् पुरुष का ज्ञानीजन भांतिभांति से वर्णन करते हैं. उस
का मुख क्या है ? बाहु क्या है ? जांघ कौन सी है ? पांव क्या कहे जाते हैं. ( १० )
ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः.
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्या १५ं शूद्रो अजायत.. (११)
ब्राह्मण विराट् पुरुष का मुंह हुए. क्षत्रिय उस की भुजाएं हुए. वैश्य उस की
जंघाएं हुईं. शूद्र उस के पैर हुए. ( ११ )
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायतः.
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत.. (१२)
विराट् पुरुष के मन से चंद्रमा, आंखों से सूर्य, कान से वायु और मुख से अग्नि
उत्पन्न हुई. ( १२ )
नाभ्या ऽ आसीदन्तरिक्ष १५ं शीर्ष्णो द्यौः समवर्त्तत.
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ २ अकल्पयन्.. (१३)
परम पुरुष की नाभि से अंतरिक्ष प्रकट हुआ. परम पुरुष के सिर से स्वर्गलोक
३६२ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध इकतीसवां अध्याय
उत्तरार्ध इकतीसवां अध्याय
प्रकट हुआ. परम पुरुष के पैर से भूमि प्रकट हुई. परम पुरुष के कानों से दिशाएं
प्रकट हुईं. परम पुरुष ने अनेक लोक रचे हैं. ( १३ )
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत.
वसन्तोस्यासीदाज्यं ग्रीष्म ऽ इध्मः शरद्धविः.. ( १४)
देवताओं ने परम पुरुष को हवि माना. परम पुरुष को हवि मान कर यज्ञ की
शुरुआत की. उस यज्ञ में घी वसंत ऋतु, ईंधन ग्रीष्म ऋतु एवं हवि शरद ऋतु हो
गई. ( १४ )
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः.
देवा यद्यज्ञं तन्वाना ऽ अबध्नन् पुरुषं पशुम्.. ( १५)
देवताओं ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उस यज्ञ में परम पुरुष को ही हवि के
पशु के रूप में बांधा. उस यज्ञ में सात परिधियां और इक्कीस समिधाएं हुईं. ( १५ )
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्.
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः.. (१६)
देवताओं ने यज्ञ से यज्ञ किया. उस में धर्म को प्रथम आसन प्राप्त हुआ. जो
लोग यज्ञ आदि विधिविधान से जीवन जीते हैं, ऐसे जीवन साधक महिमाशाली होते
हैं. ऐसे व्यक्ति स्वर्ग प्राप्त करते हैं. ( १६ )
अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च विश्वकर्मणः समवर्त्तताग्रे.
तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे.. ( १७)
परम पुरुष ने सब से पहले जल का निर्माण किया. तत्पश्चात पृथ्वी का निर्माण
किया. इस पृथ्वी का निर्माण जल के रस से हुआ. त्वष्टा देव संसार को रूप धारण
कराते हैं. त्वष्टा देव मनुष्यों को देवत्व और अमरता प्रदान करते हैं. ( १७ )
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्.
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेयनाय.. (१८)
परम पुरुष को जानने से परम तत्त्व की प्राप्ति होती है. वह अंधकार से परे है.
वह आदित्य जैसे वर्ण ( रंग ) का है. उस को जान कर जो मृत्यु के पथ पर जाते हैं,
उन्हें उस पथ से मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस के अलावा मोक्ष का कोई और मार्ग
नहीं है. ( १८ )
प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा वि जायते.
तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा.. (१९)
प्रजापति गर्भ में संचरण करते हैं. वे अजन्मा हैं. फिर भी बहुत रूपों में प्रकट
यजुर्वेद - ३६३
उत्तरार्ध इकतीसवां अध्याय
होते हैं. उन्हीं में सारे लोक स्थित हैं. धीर पुरुष उस के कारण चारों ओर देखते
हैं. ( १९)
यो देवेभ्य ऽ आतपति यो देवानां पुरोहितः.
पूर्वो यो देवेभ्यो जातो नमो रुचाय ब्राह्मये.. (२०)
जो सभी देवताओं में सब से पहले प्रकटे, जो तेज संपन्न हैं, उन ब्रह्म को
नमस्कार है. आप देवताओं के पुरोहित हैं. आप देवताओं को प्रकाशित करने
वाले हैं. ( २० )
रुचं ब्राह्मं जनयन्तो देवा ऽ अग्रे तदब्रुवन्.
यस्त्वैवं ब्राह्मणो विद्यात्तस्य देवा ऽ असन् वशे.. (२१)
जो देवताओं में अग्रणी हैं, जिन के बारे में यह कहा गया है कि वे प्रकाशमय
ब्रह्म को प्रकटातें हैं, उस परम पुरुष को ब्रह्मज्ञानी जानते हैं. उस परम पुरुष के वश
में सारे देवता रहते हैं. ( २१ )
श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्.
इष्णन्निषाणामुं म ऽ इषाण सर्वलोकं म ऽ इषाण.. (२२)
हे परम पुरुष! श्री और लक्ष्मी आप की पत्नी हैं. दोनों भुजाएं दिन और रात हैं.
नक्षत्र आप के रूप हैं. आप सब की इच्छा पूर्ति की सामर्थ्य रखते हैं. आप सभी
लोकों की इच्छा पूर्ति करने की कृपा कीजिए. ( २२ )
३६४ - यजुर्वेद
बत्तीसवां अध्याय
बत्तीसवां अध्याय
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः.
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः.. (१)
परम पुरुष ही अग्नि है. वही आदित्य है. वही वायु है. वही चंद्रमा, प्रकाशमान
व ब्रह्मज्ञानी है. वही जल और वही प्रजापति है. ( १ )
सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि. नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परि जग्रभत्.. (२)
सारे काल उस परम पुरुष से ही यज्ञ में उत्पन्न हुए. उस से ऊपर कोई नहीं
है. उस को ऊपर, बीच आदि से कोई भी पार नहीं पा सकते. ( २ )
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः.
हिरण्यगर्भ ऽ इत्येष मा मा हि ४ँ सीदित्येषा यस्मान्न जात ऽ इत्येषः.. (३)
उस परम पुरुष की कोई प्रतिमा ( सानी ) नहीं है. आप का यश महान है. आप
का नाम अत्यंत महान् है. ‘हिरण्यगर्भ’, ‘मा हिंसीत्’, ‘यस्मान् जात’ इत्यादि मंत्रों में
उस परम पुरुष की प्रशंसा और नाम का बारंबार वर्णन किया गया है. ( ३ )
एषो ह देवः प्रदिशोनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः.
स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः.. (४)
वह परम पुरुष सभी प्रदेशों में व्याप्त है. वह पूर्व और अंत में भी व्याप्त है. वही
उत्पन्न हुओं में विद्यमान है. वही उत्पन्न हो रहे प्राणियों में भी विद्यमान है. वही जन्म
लेने वालों में भी व्याप्त होगा. वह सभी में सर्वविधि व्याप्त है. ( ४ )
यस्माज्जातं न पुरा किं चनैव य ऽ आबभूव भुवनानि विश्वा.
प्रजापतिः प्रजया स ४ँ रराणस्त्रीणि ज्योती ४ँ षि सचते स षोडशी.. (५)
जिस से पहले कोई उत्पन्न नहीं हुआ, उस परमात्मा से सभी लोक उत्पन्न हुए
हैं. वह परम पुरुष प्रजा के साथ रहते हैं. वह परम पुरुष तीन ज्योतियों को धारते हैं.
प्रजा के साथ रहने वाले प्रजापति सोलह कलाओं वाले हैं. ( ५ )
येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः.
यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (६)
यजुर्वेद - ३६५
उत्तरार्ध बत्तीसवां अध्याय
उत्तरार्ध बत्तीसवां अध्याय
उस परम पुरुष ने स्वर्ग को उग्र बनाया. उस ने पृथ्वी को दृढ़ बनाया. उस ने स्वर्ग
को स्थिर बनाया. उस ने अंतरिक्ष में शोभा रची. हम ( उन के अलावा ) अब किस देव
के लिए हवि का विधान करें ? ( ६ )
यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने.
यत्राधि सूर ऽ उदितो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम.
आपो ह यद्बृहतीर्यश्चिदापः... (७)
जिस को परम पुरुष की शक्ति से ज्ञानी जन मन के द्वारा सब ओर देखते हैं,
जहां प्रकाशवान सूर्य उदय हो कर चमकता है, ( अब हम उन के अलावा ) किस
देव के लिए हवि का विधान करें. 'आपो ह यद् बृहतीः' और 'यश्चिदापः' में उसी
परम शक्ति का गुणगान किया गया है. ( ७ )
वेनस्तत्पश्यन्निहितं गुहा सद्यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्.
तस्मिन्निद ६० सं च वि चैति सर्व ६० स ओतः प्रोतश्च विभूः प्रजासु.. (८)
वह परम पुरुष सभी में गुप्त रूप से मौजूद है, जो सब का आश्रयदाता है,
जो सब पर दृष्टि रखता है. सभी प्राणी प्रलय में उस में लीन हो जाते हैं. सभी
में वही ओतप्रोत है. प्रजाओं में वही प्रकाशवान है. ( ८ )
प्र तद्वोचेदमृतं नु विद्वान् गन्धर्वो धाम विभृतं गुहा सत्.
त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुः पितासत्.. (९)
परम पुरुष अमर है. विद्वान् पुरुष उस के बारे में कुछ कह सकते हैं. उस का
धाम दिव्य है जो गुप्त रूप से सब में विद्यमान है, जिस में तीन पद गुप्त रूप से
निहित हैं, जो ज्ञाता और जो पिता का भी पिता है. ( ९ )
स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा.
यत्र देवा ऽ अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त.. (१०)
वह परम पुरुष सब का बंधु है. वह सब को उपजाने वाला, विधाता, आश्रय
दाता और सारे लोकों और लोगों का ज्ञाता है. उस के वहां तीसरे धाम में अमर देवता
आनंदपूर्वक विचरण करते हैं. ( १० )
परीत्य भूतानि परीत्य लोकान् परीत्य सर्वाः प्रदिशो दिशश्च.
उपस्थाय प्रथमजामृतस्यात्मनात्मानमभि सं विवेश.. (११)
वह परम पुरुष सभी प्राणियों व समस्त लोकों को घेरे हुए है. वह सभी दिशाओं
में व्याप्त है. वह सभी उपदिशाओं को घेरे हुए है. वह अजन्मा व अमर है. सभी ज्ञानी
आत्मरूप को जान कर अपने आत्मरूप का इस में समावेश कर देते हैं. ( ११ )
३६६ - यजुर्वेद