यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
द्वादशकपालोनुमत्यै ऽ अष्टाकपालः.. (६०)
गायत्री छंद अग्नि से संबंधित है. त्रिवृत और रथांतर साम से स्तुत है.
अष्टाकपाल, पंचदेश, बृहत्साम वाली स्तुति व ग्यारह कपालों वाली हवि इंद्र देव
के लिए है. जगती छंद और सत्रह स्तोत्र विश्वों से संबंधित हैं. वैरूप साम वाली
स्तुति, बारह कपालों में सुसंस्कृत कर के रखी हुई हवि, अनुष्टुप् छंद वाली स्तुति
मित्रावरुण व इक्कीस स्तोत्र वाली स्तुति मित्रावरुण के लिए है. वैरूप साम से
मित्रावरुण देव स्तुत है. पंक्तिछंद बृहस्पति देव से संबंधित है. बृहस्पति देव
त्रिणव से स्तुत हैं. बृहस्पति शाक्वर साम से स्तुत है. चरु बृहस्पति देव के लिए
है. उष्णिक् छंद सविता देव से संबंधित है. सविता देव प्रायश्चित्त व रैवत साम
से स्तुत है. बारह कपालों से परिष्कृत हवि सविता देव के लिए रखी है. चरु
प्रजापति से संबंधित है. विष्णु की पत्नी और अदिति देव के लिए यज्ञ से संबंधित
पदार्थ समर्पित है. वैश्वानर देव के लिए बारह कपालों में परिष्कृत हवि है. अग्नि
के लिए बारह कपालों में परिष्कृत और अनुमति देव के लिए आठ कपालों में
परिष्कृत हवि है. (६०)
३५४ - यजुर्वेद