यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
हे अग्नि! आप उत्पन्न होते ही देवताओं का नेतृत्व करते हैं. आप देवताओं
का आह्वान करते हैं. आप पूर्व दिशा में ज्योति स्वरूप स्थित हैं. देवगण आप के
मुख में स्वाहाकार रूप से समर्पित आहुति ग्रहण करते हैं. ( ३६ )
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या ऽ अपेशसे. समुषद्भिरजायथाः.. (३७)
हे अग्नि! आप अज्ञानी को ज्ञानी बनाते हैं. आप अपरूप को सुंदर रूप प्रदान
करते हैं. आप उषा देवी के साथ उत्पन्न होते हैं. ( ३७ )
जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वर्मी याति समदामुपस्थे.
अनाविद्धया तन्वा जय त्व १७ स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु.. (३८)
युद्ध के लिए जाते हुए कवचधारी बादल की भांति शोभित होते हैं. वीर
घायल हुए बिना जीतें. वह आप की कवच की महिमा आप की रक्षा करने की
कृपा करें. ( ३८ )
धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना तीव्राः समदो जयेम.
धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम.. (३९)
धनुष से हम गायों को जीतें. धनुष से हम सदा युद्ध व मार्ग जीतें. धनुष शत्रु
का बुरा करने वाला हो. धनुष से हम सारी प्रदिशाओं को जीतें. ( ३९ )
वक्ष्यन्तीवेदा गनीगन्ति कर्णं प्रिय १७ सखायं परिषस्वजाना.
योषेव शिङ्क्ते वितताधि धन्वञ्ज्या इय १७ समने पारयन्ती.. (४०)
धनुष की प्रत्यंचा को योद्धा कान तक खींचता है. उस समय ऐसा लगता है,
जैसे योद्धा उस का मित्र है. वह उस के कान में कुछ कहना चाहती है. वह प्रत्यंचा
युद्ध में विजय दिलाने वाली है. वह प्रत्यंचा धनुष पर चढ़ कर अत्यंत आवाज करती
है. बाण उस का मित्र है. वह उस से मिलती है. ( ४० )
ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृतामुपस्थे.
अप शत्रून् विध्यता १७ संविदाने आर्नी इमे विष्फुरन्ती अमित्रान्.. (४१)
जैसे मां बेटे को गोद में लेती है, वैसे ही प्रत्यंचा बाण को धारण करती है. यह
प्रत्यंचा समान मन वाली स्त्री जैसा आचरण करती है. यह डोरी शत्रुओं का संहार करे.
यह डोरी झनझनाती हुई अमित्रों का विनाश करने की कृपा करे. ( ४१ )
बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्य.
इषुधिः सङ्कः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः.. (४२)
यह तरकस बहुतों का पिता है. बहुत से इस के पुत्र हैं. इस के संरक्षण में
रहते हैं. तरकस पीठ पर बंधता है. यह सेना के सभी योद्धाओं पर विजय पाता
है. ( ४२ )
३५० - यजुर्वेद