यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध बीसवां अध्याय
हमारा सिर, मुख, केश व मूंछें शोभायुक्त हों. हमारे प्राण राजा,अमृत व सम्राट्
हों. हमारे नेत्र सब कुछ देखने वाले हों. हमारे कान विराट् हों. ( ५ )
जिह्वा मे भद्रं वाङ्महो मनो मन्युः स्वराज् भामः.
मोदाः प्रमोदा ऽ अङ्गुलीरङ्गानि मित्रं मे सहः.. ( ६ )
हमारी जीभ कल्याणकारी वचन बोले. वाणी महिमा युक्त हो. मन अन्याय पर
क्रोध करे. हमारी अंगुलियां आमोदप्रमोद दें. हमारे मित्र हमारे साथ रहें. ( ६ )
बाहू मे बलमिन्द्रिय ᳵ हस्तौ मे कर्म वीर्यम्. आत्मा क्षत्रमुरो मम.. (७)
हमारे बाहु और इंद्रियां बल युक्त हों. हमारे दोनों हाथ पुरुषार्थी हों. हमारी
आत्मा और हृदय क्षत्रिय धर्म के अनुकूल हों. ( ७ )
पृष्ठीर्मे राष्ट्रमुदरम ᳵ सौ ग्रीवाश्च श्रोणी.
ऊरू अरत्नी जानुनी विशो मेऽङ्गानि सर्वतः.. ( ८)
हमारी पीठ राष्ट्र जैसी हो. पेट, दोनों कंधे, गरदन, दोनों कूल्हे, दोनों जंघाएं,
कमर, घुटने आदि हमारे अंग सब ओर से प्रजा का पोषण करें. ( ८ )
नाभिर्मे चित्तं विज्ञानं पायुर्मेपचितिर्भसत्.
आनन्दनन्दावाण्डौ मे भगः सौभाग्यं पसः.
जङ्घाभ्यां पद्भ्यां धर्मोस्मि विशि राजा प्रतिष्ठितः.. ( ९)
हमारी नाभि और चित्त विशिष्ट ज्ञान युक्त हों. हमारी गुदा संतुलित हो. हमारे
वृषण आनंद युक्त हों. हमारी स्त्रियों के अंग सौभाग्यशाली हों. जांघों, पैरों से हम
धर्माचरण करें. हम समाज में राजा की भांति प्रतिष्ठित हों. ( ९ )
प्रति क्षत्रे प्रति तिष्ठामि राष्ट्रे प्रत्यश्वेषु प्रति तिष्ठामि गोषु.
प्रत्यङ्गेषु प्रति तिष्ठाम्यात्मन् प्रति प्राणेषु प्रति तिष्ठामि पुष्टे प्रति द्यावापृथिव्योः प्रति
तिष्ठामि यज्ञे.. (१०)
हम क्षत्रियों में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम राष्ट्र में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम घोड़ों में प्रतिष्ठा
पाते हैं. हम गायों में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम प्रत्यंगों में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम आत्मा में
प्रतिष्ठा पाते हैं. हम प्राणों में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम पुष्टि में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम
स्वर्गलोक में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम पृथ्वी में प्रतिष्ठा पाते हैं. हम यज्ञ में प्रतिष्ठा पाते
हैं. ( १० )
त्रया देवा ऽ एकादश त्रयस्त्रि ᳵ शाः सुराधसः.
बृहस्पतिपुरोहिता देवस्य सवितुः सवे.
देवा देवैरवन्तु मा.. (११)
२५६ - यजुर्वेद 632/16