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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 421 में से

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पृष्ठ 260

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
आदि समर्पित कर रहे हैं. आप इन सब को स्वीकारने की कृपा कीजिए. ( २९ )
बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम्.
येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि.. ( ३० )
हे मरुद्गण! इंद्र देव वृत्रहंता है. आप उन के लिए बृहत्साम गाइए, जिन्होंने
ज्योति उत्पन्न की, अन्न की बढ़ोत्तरी की, देवों को देवों के लिए जाग्रत
किया. ( ३० )
अध्वर्वो अद्रिभिः सुत ष्यं सोमं पवित्र ऽ आनय. पुनीहीन्द्राय पातवे.. ( ३१)
हे अध्वर्यु! आप पत्थरों से कूट कर निचोड़े गए पवित्र सोम को अपने पुत्रों के
लिए लाइए. इंद्र देव के पीने के लिए आप इसे पवित्र कीजिए. ( ३१ )
यो भूतानामधिपतिर्यस्मिँल्लोका ऽ अधि श्रिताः.
य ऽ ईशे महतो महाँस्तेन गृह्णामि त्वामहं मयि गृह्णामि त्वामहम्.. (३२)
जो प्राणियों के अधिपति हैं, सब लोक जिस के आश्रित हैं, जो ईश्वर हैं,
महान् हैं, हम उस महान् को ग्रहण करते हैं. आप हम को ग्रहण कीजिए. हम आप
को ग्रहण करते हैं. ( ३२ )
उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्ण ऽ एष ते योनिरश्विभ्यां
त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्णे.. ( ३३)
हे ओषधि रूप रस! आप को दोनों अश्विनीकुमारों के लिए उपयाम में ग्रहण
किया गया है. आप को सरस्वती के उत्तम संरक्षण हेतु ग्रहण किया गया है. आप
को इंद्र के उत्तम संरक्षण हेतु ग्रहण किया गया है. यह अश्विनीकुमार, सरस्वती देवी
और इंद्र देव का मूल स्थान है. अश्विनीकुमार, सरस्वती देवी और इंद्र देव की कृपा
से हमारा संरक्षण हो. ( ३३ )
प्राणपा मे अपानपाश्चक्षुष्पाः श्रोत्रपाश्च मे.
वाचो मे विश्वभेषजो मनसोसि विलायकः.. ( ३४)
हे ओषधे! आप हमारे प्राण, अपान, नेत्र, कर्ण और वाणी रक्षक हैं, आप सब
के वैद्य हैं. आप मन का विलय करने की कृपा करें. ( ३४ )
अश्विनकृतस्य ते सरस्वतिकृतस्येन्द्रण सुत्राम्णा कृतस्य.
उपहूत ऽ उपहूतस्य भक्षयामि.. (३५)
हे ओषधे! अश्विनी देवों द्वारा संस्कार किए गए, सरस्वती देवी द्वारा पुष्ट किए
गए, इंद्र देव द्वारा उत्पन्न किए गए, आप को हम आमंत्रित करते हैं. आप का हम
सेवन करते हैं. ( ३५ )
२६० – यजुर्वेद