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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 421 में से

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पृष्ठ 249

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
जो पितर अग्नि के समान तेजस्वी हैं, जो पितर स्वर्गलोक के बीच में हैं, वे
पितर स्वधा से आनंदित होते हैं. उन को स्वयं प्रकाशित परमात्मा अच्छी नीयत प्रदान
करें. उन के शरीर को आवश्यकता के अनुसार कर्म का फल प्रदान करने की कृपा
करें. (६०)
अग्निष्वात्तान्ऋतुमतो हवामहे नाराश १७ से सोमपीथं य ऽ आशुः.
ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वय १७ स्याम पतयो रयीणाम्.. (६१)
जो पितर अग्नि के समान तेजस्वी हैं, जो नीतिवान हैं, हम उन का आह्वान
करते हैं. हम प्रशंसित व सोमपान में तीव्र गतिशील पितर का आह्वान करते
हैं. वे हमारे ब्राह्मण पितर अच्छी तरह आह्वान योग्य हैं. हम धनों के स्वामी हो
जाएं. (६१)
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे.
मा हि १७ सिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व ऽ आगः पुरुषता कराम.. (६२)
हे पितरगणो! हम दाहिने घुटने पर टिक कर आप को आमंत्रित करते हैं.
आप इस पूरे यज्ञ में अपना अभिमत प्रकट करने की कृपा करें. आप हम को
हिंसित न करें. पितरगण यहां आने और हमारी रक्षा करने की कृपा करें. (६२)
आसीनासो ऽ अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय.
पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त ऽ इहोजं दधात.. (६३)
पितरगण लाल सूर्यलोक में विराजे हुए हैं. आप हमारे लिए धन धारिए. मनुष्यों
के लिए ऐश्वर्य दीजिए. पितर पुत्रों के लिए वैभव दें. ऊर्जा धारण करें. (६३)
यमग्ने कव्यवाहन त्वं चिन्मन्यसे रयिम्.
तन्नो गीर्भिः श्रवाय्यं देवत्रा पनया युजम्.. (६४)
हे अग्नि! कविगण आप की स्तुति करते हैं. आप चिन्मय हैं. आप धन धारिए.
आप हमारी उन वाणियों को सुनिए. देवताओं के लिए इस हवि की रक्षा कीजिए.
हवि को उन तक पहुंचाइए. (६४)
यो अग्निः कव्यवाहनः पितॄन् यक्षदृतावृधः.
प्रेदु हव्यानि वोचति देवेभ्यश्च पितृभ्य ऽ आ.. (६५)
हे अग्नि! आप हवि वाहक हैं. आप सत्यमय यज्ञ की बढ़ोतरी करने वाले हैं.
आप देवताओं व पितरों तक हवि प्रेषित करने की कृपा करें. (६५)
त्वमग्न ऽ ईडितः कव्यवाहनावाढव्यानि सुरभीणि कृत्त्वी.
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवी १७ षि.. (६६)
यजुर्वेद - २४९