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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

( ३ ) वानप्रस्थप्रकरण प्राणों के स्थान ”

( ४७ )
कृषि आदि से जीविका न होने पर शरीर के अंगों, अस्थियों की संख्या ४५५
अन्य साधन ४३५ इन्द्रियों के विषय-गन्धादि ४५८
राजा द्वारा वृत्ति निर्धारण ” कर्मेन्द्रियाँ ”
( ३ ) वानप्रस्थप्रकरण प्राणों के स्थान ”
वानप्रस्थ के धर्म ४३६ प्राणस्थानों के विस्तार ४५९
स्वयं प्राप्त फल द्वारा पंचमहायज्ञ ४३७ स्नायु, धमनी, पेशियों
द्रव्यसंचय का नियम ४३८ की संख्या ४६०
स्नान, स्वाध्याय और दान ४३९ बालों और रोओं की संख्या ४६१
वानप्रस्थ के भोजन का नियम ” शरीर में रसों का अनुपात ४६२
चान्द्रायणादि व्रत का नियम ” शरीर में आत्मा की स्थिति ४६३
पञ्चाग्निसेवन आदि ४४० ‘बृहदारण्यक’ तथा योगशास्त्र
समदृष्टि होने का नियम ४४१ का निर्देश ”
भैक्षाचरण ” आत्मा के ध्यान की विधि ४६४
शरीर त्याग का नियम ४४२ शब्द ब्रह्म की उपासना ”
मुक्ति के मार्ग सामगान, वीणा ”
( ४ ) यतिधर्मप्रकरण वादन आदि ४६५
यतिधर्म का निरूपण ४४२ गीतज्ञ की योनि ”
यति के धर्म ४४४ आत्मा से सम्पूर्ण जगत्
भिक्षाटन ४४५ की उत्पत्ति ४६६
यति के पात्र और उनकी शुद्धि ४४६ मुनियों का प्रश्न ”
इन्द्रियसंयम और अनिष्टमय यज्ञ से प्रजासृष्टि ”
संसार ४४७ आत्मा द्वारा सुख-दुःख का भोग
ध्यान और ब्रह्मदर्शन ४४८ क्यों ? ४६७
धर्म के लिए आश्रमविशेष आदिदेव से चार वर्णों की
आवश्यक नहीं ” उत्पत्ति ४६८
सत्य, अस्तेय आदि धर्म ” मुनियों की शंका ४६९
ब्रह्म से अनेक जीवात्मा की उत्पत्ति ४४९ कर्मानुसार योनि की प्राप्ति ४७०
आत्मा द्वारा किया गया कर्म ” कर्मों के फल की प्राप्ति का समय ”
आत्मा का शरीरधारण ४५० कैसा व्यक्ति किसी योनि में जन्म
शरीरधारण की प्रक्रिया और लेता है ४७१
अवस्थाएँ ४५१ सत्त्वादि गुण का परिणक ४७२
गर्भ में शरीर का विकास और आत्मा को पिछले जन्म का बोध
शारीरिक गुणों के उद्भव का क्यों नहीं होता ४७३
क्रम ४५३ आत्मा का समष्टि, व्यष्टि भेद ४७४
दोहद का महत्त्व ” धातुएं और आत्मा से जगत्
गर्भ के महीनों में विकास की की उत्पत्ति ”
दशाएँ ४५४ जगत् के सृजन की प्रक्रिया ४७५
प्रसव का समय ४५५ आत्मा के विषय में प्रमाण ४७६

( ४८ )
आत्मा का अज्ञान और क्लेश ४७६ | उपपातक ५०८
मुक्ति कौन पाता है ? ४७८ | जाति अंश के कारणभूत पाप "
मोक्षप्राप्ति का हेतु ४७९ | ब्राह्मणहत्या के प्रायश्चित्त की विधि ५१३
कर्मफलभोग के लिए शरीरधारण आत्मा को नट से उपमा " | ब्रह्मवध के विषय में विशेष नियम ५१४
मोक्ष का मार्ग, स्वर्गमार्ग संसरण-मार्ग ४८१ | प्रोत्साहक आदि के लिए दण्ड-प्रायश्चित्त ५१६
आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण ४८३ | बालक और वृद्ध के लिए आधा प्रायश्चित्त ५१७
क्षेत्रज्ञ का स्वरूप ४८४ | ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त की अवधि ५१८
बुद्धि आदि की उत्पत्ति " | ब्रह्महत्या का दूसरा प्रायश्चित्त ५२१
गुणस्वरूप ४८५ | ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त का अतिदेश ५२५
स्वर्गमार्ग, पितृयान ४८६ | आत्रेयी की हत्या का प्रायश्चित्त ५२६
पितृयान के मुनियों का वर्णन ४८७ | आत्रेयी का लक्षण "
ज्ञान के हेतु " | सुरापान प्रायश्चित्त ५२७
आत्मज्ञानी और देवयान ४८८ | सुरा के विषय में विचार ५२८
उपासना की विधि ४८९ | एकादश मद्य ५२९
धारणात्मक योगाभ्यास का प्रयोजन ४९० | सुरापान का दूसरा प्रायश्चित्त ५३०
योग की सिद्धि के लक्षण ४९१ | सुरायुक्त शुष्कान्न के भक्षण का प्रायश्चित्त "
कर्मों के त्याग से मुक्ति " | सुरापात्र में जल पीने का प्रायश्चित्त ५३१
गृहस्थ के लिए भी मुक्ति संभव " | मद्यपान का प्रायश्चित्त ५३२
( ५ ) प्रायश्चित्तप्रकरण | द्विजाति की पत्नी के विषय में सुरापान प्रायश्चित्त ५३४
कर्मविपाक का निरूपण ४९२ | सुवर्णस्तेय का प्रायश्चित्त "
महापातकी का पुनः पुनः जन्म " | शङ्ख के विचार ५३५
कर्म के अनुसार शरीरधारण ४९६ | सुवर्ण शब्द का अर्थ ५३६
पतित होने का कारण और आवश्यकता ४९७ | सुवर्णस्तेय का दूसरा प्रायश्चित्त ५३७
प्रायश्चित्त का अधिकारी " | गुरुतल्पगमन का प्रायश्चित्त ५३९
प्रायश्चित्त न करने पर दोष ४९९ | गुरु शब्द का अर्थ "
इक्कीस नरक ५०० | गुरुतल्पगमन का दूसरा प्रायश्चित्त ५४२
प्रायश्चित्त का फल ५०१ | महापातकियों के साथ संसर्ग का प्रायश्चित्त ५४६
महापातकी ५०२ | इस विषय में नियम का अपवाद ५४९
ब्रह्महत्या के समान पाप ५०५ | शूद्रादि के विषय में प्रायश्चित्त ५५०
सुरापान के समान पाप " | गोवध का प्रायश्चित्त ५५१
सुवर्णस्तेय के समान पाप ५०६
गुरुतल्प के समान पाप "
गुरुतल्पातिदेश ५०७

( ४६ )
अवस्था के अनुसार प्रायश्चित्त का नियम ५५३
गोपालक की उपेक्षा से गोहत्या का प्रायश्चित्त ५५५
स्त्रियों के प्रायश्चित्त के विषय में विशेष नियम ५५६
पुरुषों के विषय में प्रायश्चित्त के विशेष नियम ५५७
उपपातकों के प्रायश्चित्त ५५८
स्त्री, शूद्र, विट्, क्षत्र के वध का प्रायश्चित्त ५६२
स्त्रीवध का प्रायश्चित्त ५६३
अनुपपातक प्राणिवध के विषय में प्रायश्चित्त ५७०
बिल्ली मारने पर प्रायश्चित्त ५७१
वृक्षादि काटने पर प्रायश्चित्त ५७३
पुंश्चली, वानर के वध का प्रायश्चित्त और उनके स्पर्श से शुद्धि का उपाय ५७५
वीर्यस्खलन का प्रायश्चित्त ५७६
ब्रह्मचारी द्वारा स्त्रीभोग का प्रायश्चित्त ५७८
स्वप्न में वीर्यपातहुने के प्रायश्चित्त का मन्त्र ५८०
संन्यास से भ्रष्ट होने पर प्रायश्चित्त ,,
अन्य अनुपपातक का प्रायश्चित्त ५८१
गुरु के लिए प्रायश्चित्त का विधान ५८२
सब प्रकार की हिंसा का प्रायश्चित्त ५८३
झूठा दोष लगाने पर प्रायश्चित्त ,,
भ्रातृजायागमन का प्रायश्चित्त ५८५
रजस्वला पत्नी के संभोग का प्रायश्चित्त ,,
अयाज्य व्यक्ति का यज्ञ कराने का प्रायश्चित्त ५८७
वेदविप्लावन का प्रायश्चित्त ५८८


स्वाध्यायत्याग का प्रायश्चित्त ५८९
अग्नित्याग का प्रायश्चित्त ,,
आश्रम में न रहने का प्रायश्चित्त ५९०
समुद्रयात्रा का प्रायश्चित्त ५९१
वेश्यागमन का प्रायश्चित्त ,,
प्याज आदि खाने पर प्रायश्चित्त ५९३
संधिनी गाय का दूध पीने पर प्रायश्चित्त ५९५
गर्हित मांस खाने का प्रायश्चित्त ,,
अपवित्र द्रव्य से स्पृष्ट वस्तु खाने का प्रायश्चित्त ५९५
बुरे विचार से प्रदत्त अन्न खाने का प्रायश्चित्त ५९९
बासी भोजन करने का प्रायश्चित्त ,,
गुणदुष्टशुक्त आदि के भक्षण का प्रायश्चित्त ६००
क्रियादुष्ट अन्न के भक्षण का प्रायश्चित्त ,,
एकाह्यादि श्राद्धभोजन का प्रायश्चित्त ६०३
अपुत्रादि के अन्नभक्षण का प्रायश्चित्त ६०४
जातिभ्रंश करने वाले पाप का प्रायश्चित्त ६०४
(६) प्रकीर्णकप्रायश्चित्तानि
निषिद्ध दान लेने का प्रायश्चित्त ६०४
गुरु की भर्त्सना का प्रायश्चित्त ६०५
विप्र को मारने के लिए उद्यत होने पर दण्ड ६०६
पादप्रहार का प्रायश्चित्त ,,
मनु द्वारा बताये गये प्रकीर्णक-प्रायश्चित्त ,,
नित्य, श्रौतादि कर्म न करने पर प्रायश्चित्त ,,
इन्द्रधनुष देखने का प्रायश्चित्त ६०७
यज्ञोपवीत चढ़ाये विना मलमूत्र-त्याग का प्रायश्चित्त ,,

५ या० भू०

( ५० )

चोर और पतित के साथ भोजन करने का प्रायश्चित्त ६०७
नीलरंगे वस्त्र धारण करने का प्रायश्चित्त "
देशविशेषगमन का प्रायश्चित्त ६०८
प्रायश्चित्त के विषय में देश और काल का विचार ६०९
पतित के घड़ा फोड़ने की विधि ६१०
पतित को समाज में मिलाने की विधि "
पतितत्याग की विधि का अतिदेश ६११
स्त्रियों का विशेष रूप से पतित होना ६१२
चरितव्रत के विषय में विशेष ६१३
जाति में सम्मिलित करने की दूसरी विधि ६१४
रहस्यप्रायश्चित्त ६१५
दूसरा प्रायश्चित्त ६१७
सुरापान का रहस्यप्रायश्चित्त "
सुवर्णस्तेय का प्रायश्चित्त ६१८
गुरुतल्प का प्रायश्चित्त "
उपपातक का रहस्य प्रायश्चित्त ६२०
सौ बार प्राणायाम का नियम "
अपवित्र वस्तु मुख में डालने का प्रायश्चित ६२१
अज्ञानवश किये गये पाप का प्रायश्चित्त "
साधारण पवित्र मन्त्र ६२२
यम और नियम ६२४

सान्तपन नाम का व्रत ६२५
महासान्तपन व्रत ६२६
पर्णकृच्छ्रव्रत ६२७
पादकृच्छ्रव्रत ६२८
प्राजापत्यकृच्छ्र ६२९
अतिकृच्छ्र ६३०
कृच्छ्रातिकृच्छ्र "
पराककृच्छ्र ६३१
सौम्यकृच्छ्र "
तुलापुरुषकृच्छ्र "
चान्द्रायणव्रत ६३२
दूसरे प्रकार का चान्द्रायण ६३३
कृच्छ्र और चान्द्रायण का साधारणतः आचरण ६३४
प्रायश्चित्त में वपन का विचार ६३६
अनादिए पाप का प्रायश्चित्त "
व्रत न कर सकने पर गोदान आदि ६३७
महापातक आदि में गायों की संख्या "
चान्द्रायण आदि में गायों की संख्या "
पुनः पाप करने पर पुनः प्रायश्चित्त ६३८
व्रत न कर सकने पर ब्राह्मण भोजन ६३९
कृच्छ्र और चान्द्रायण का फल ६४०
इस शास्त्र के अध्ययन और श्रवण का फल "
टिप्पणी (नोट्स) ६४३
पद्यार्धानुक्रमणिका ६९७

11639

उपोद्घातप्रकरणम्

॥ श्रीः ॥

याज्ञवल्क्यस्मृतिः

‘मिताक्षरा’ सहितहिन्दीव्याख्योपेता

आचाराध्यायः ॥ १ ॥

उपोद्घातप्रकरणम्

धर्माधर्मौ तद्विपाकाश्चयोऽपि क्लेशाः पञ्च प्राणिनामायतन्ते ।
यस्मिन्नेतैर्नो परामृष्ट ईशो यस्तं वन्दे विष्णुमोङ्कारवाच्यम् ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यमुनिभाषितं मुहुर्विश्वरूपविकटोक्तिविस्तृतम् ।
धर्मशास्त्रमृजुभिर्मिताक्षरा बालशोधविधये विविच्यते ॥ २ ॥
याज्ञवल्क्यशिष्यः कश्चित्प्रश्नोत्तररूपं याज्ञवल्क्यमुनिप्रणीतं धर्मशास्त्रं संक्षिप्य
कथयामास-यथा मनुप्रणीतं भृगुः । तस्य चायमाद्यश्लोकः—
योगीश्वरं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मुनयोऽब्रुवन् ।
वर्णाश्रमेतराणां नो ब्रूहि धर्मानशेषतः ॥ १ ॥
योगिनां सनकादीनामीश्वरः । ^२ श्रेष्ठस्तं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मनोवाक्काय-
कर्मभिः पूजयित्वा मुनयः सामश्रवःप्रभृतयः श्रवणधारणयोग्या अब्रुवन् उक्तवन्तः
धर्मान्नोऽस्मभ्यं ^४ब्रूहीति । कथम् ? अशेषतः कार्त्स्न्येन । केषाम् ? वर्णाश्रमेत-
राणाम्, वर्णा ब्राह्मणादयः; आश्रमा ब्रह्मचारिप्रभृतयः, इतरेऽनुलोमप्रतिलोम-
जाता मूर्धावसिक्तादयः । ‘इतर’शब्दस्य ‘द्वन्द्वे च’ (पा. १।१।३१) इति
सर्वनामसंज्ञाप्रतिषेधः । अत्र च ‘धर्म’शब्दः षड्विधस्मार्तधर्मविषयः । तद्यथा—
वर्णधर्मः, आश्रमधर्मः, वर्णाश्रमधर्मः, गुणधर्मः निमित्तधर्मः, साधारणधर्मश्चेति ।
तत्र वर्णधर्मो ब्राह्मणो नित्यं मद्यं वर्जयेदित्यादि । आश्रमधर्मोऽग्नीन्धनभैक्ष-
१. पाठान्तरम्—मनुक्तं । २. प्रभुस्तं । ३. सोमश्रवाद्यः ।
४. ब्रूहि कथयेति । ५. स्मार्तकर्मविषयः । ६. वर्जयेद्विति ।

२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
चर्यादिः । वर्णाश्रमधर्मः पालाशो दण्डो ब्राह्मणस्येत्येवमादिः । गुणधर्मः शाखी-
याभिषेकादिगुणयुक्तस्य राज्ञः प्रजापरिपालनादिः । निमित्तधर्मो विहिताकरण-
प्रतिषिद्धसेवननिमित्तं प्रायश्चित्तम् । साधारणधर्मोऽहिंसादिः । ‘न हिंस्यात्सर्व्वा
भूतानि’ इत्याचण्डालं साधारणो धर्मः । ‘शौचाचारांश्च शिक्षयेत्’इत्याचार्यकरण-
विधिप्रयुक्तत्वाद्वर्मशास्त्राध्ययनस्य प्रयोजनादिकथनं नातीवोपयुज्यते । तत्र चायं
क्रमः-प्रागुपनयनात्कामचारकामवादकामभक्षाः । ऊर्ध्वमुपनयनाद्राग्वेदाध्यय-
नोपक्रमाद्धर्मशास्त्राध्ययनं, ततो धर्मशास्त्रविहितयमनियमोपेतस्य वेदाध्ययनं,
ततस्तदर्थजिज्ञासा, ततस्तदर्थानुष्ठानमिति । तत्र यद्यपि धर्मार्थकाममोक्षाः
शास्त्रेणानेन प्रतिपाद्यन्ते, तथापि धर्मस्य प्राधान्याद्धर्मग्रहणम् । प्राधान्यं च
धर्ममूलत्वादितरेषाम् । न च वक्तव्यं धर्ममूलोऽर्थोऽर्थमूलो धर्म इत्यविशेष इति ।
यतोऽर्थमन्तरेणापि जपतपस्तीर्थयात्रादिना धर्मनिष्पत्तिः, अर्थलेशोऽपि न
धर्ममन्तरेणेति । एवं काममोक्षावपीति ॥ १ ॥
भाषा— किसी समय ) योगियों में श्रेष्ठ याज्ञवल्क्य की पूजा करके
( सोमश्रवस आदि ) मुनियों ने कहा कि आप वर्णों, आश्रमों और दूसरे
( अनुलोमज-प्रतिलोमज संकर जातियों ) का धर्म हमें पूर्णरूप से
बताइए ॥ १ ॥
एवं पृष्टः किमुवाचेत्याह—
मिथिलास्थः स योगीन्द्रः क्षणं ध्यात्वाऽब्रवीन्मुनीन् ।
यस्मिन्देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्निबोधत ॥ २ ॥
मिथिला नाम नगरी तत्र स्थितः स याज्ञवल्क्यो योगीश्वरः क्षणं ध्यात्वा
किञ्चित्कालं मनः समाधाय एते श्रवणाधिकारिणो विनयेन पृच्छन्तीति युक्तमेतेभ्यो
वक्तुमित्युक्त्वाऽन्मुनीन् । किम् ? ‘यस्मिन्देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्नि-
बोधयत’–इति । कृष्णसारो मृगो यस्मिन्देशे स्वच्छन्दं विहरति तस्मिन्देशे
दद्यमाणलक्षणा धर्मा अनुष्ठेया नान्यत्रेत्यभिप्रायः ॥ २ ॥
भाषा—मिथिला नगरी में विराजमान उस योगीश्वर ने थोड़ी देर
अपने मन में विचार करके मुनियों से कहा कि जिस देश में काले
मृग ( स्वच्छन्द ) विचरण करते हैं उस देश में ( अनुष्ठेय ) धर्मों को
समझिए ॥ २ ॥
१. सर्वभूतानि इति । २. श्रुत्युक्तशौचाचारान् । ३. जपतीर्थयात्रा ।

आचाराध्यायः ३
'शौचाचारांश्च शिक्षयेत्'इत्याचार्यस्य धर्मशास्त्राध्यापनविधिः । शिष्येण
तदध्ययनं कर्तव्यमिति कुतोऽवगम्यत इत्यत आह—
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः ।
वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ ३ ॥
पुराणं ब्रह्मादि, न्यायस्तर्कविद्या, मीमांसा वेदवाक्यविचारः, धर्मशास्त्रं
मानवादि, अङ्गानि व्याकरणादीनि षट्, एतैरुपेतश्चत्वारो वेदाः विद्याः पुरुषार्थ-
साधनानि, तासां स्थानानि च चतुर्दश, धर्मस्य च चतुर्दश स्थानानि हेतवः ।
एतानि च त्रैवर्णिकैरध्येतव्यानि । तदन्तर्भूतत्वाद्वर्मशास्त्रमप्यध्येतव्यम् । तत्रैतानि
ब्राह्मणेन विद्याप्राप्तये धर्मानुष्ठानाय चाधिगन्तव्यानि ! क्षत्रियवैश्याभ्यां
धर्मानुष्ठानाय । तथा च शङ्खेन विद्यास्थानान्युपक्रम्योक्तम्—'एतानि ब्राह्मणोऽ-
धिकुरुते स च वृत्तिं दर्शयतीतरेषाम्' इति । मनुरपि द्विजातीनां धर्मशास्त्राध्य-
यनेऽधिकारः, ब्राह्मणस्य प्रवचने नान्यस्येति दर्शयति ( २।१६) 'निषेकादि-
श्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिन्ज्ञेयो नान्यस्य
कँर्हिचित् ॥ विदुषा ब्राह्मणेनेदमध्येतव्यं प्रयत्नतः । शिष्येभ्यश्च प्रवक्तव्यं सम्यङ्-
नान्येन केनचित् ॥' इति ॥ ३ ॥
भाषा—पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और ( व्याकरण आदि )
अङ्गों सहित ( चारों ) वेद चौदह विद्या के और धर्म के स्थान या
कारण हैं ॥ ३ ॥
अस्तु धर्मशास्त्रमध्येतव्यं, याज्ञवल्क्यप्रणीतस्यास्य शास्त्रस्य किमायातमित्यत
आह—
मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः⁴ ।
यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥ ४ ॥
पराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ ।
शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः⁶ ॥ ५ ॥
'उशनः' शब्दपर्यन्तो द्वन्द्वैकवद्भावः । याज्ञवल्क्यप्रणीतमिदं धर्मशास्त्रमध्येत-
व्यमित्यभिप्रायः । नेयं परिसंख्या, किंतु प्रदर्शनार्थमेतत् । अतो बौधायनादेरपि
धर्मशास्त्रत्वमविरुद्धम् । एतेषां प्रत्येकं प्रामाण्येऽपि साकाङ्क्षाणामाकाङ्क्षापरिपूरण-
मन्यतः क्रियते । विरोधे विकल्पः ॥ ४-५ ॥
१. पुरुषार्थज्ञानानि, पुरुषार्थसाधनज्ञानानि । २. तदन्तर्गतत्वात् ।
३. तत्र ब्राह्मणेनैतानि । ४. कस्यचित् । ५. ऽङ्गिरः । ६. प्रवर्त्तका ।

४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
भाषा—मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशनस्, अङ्गिरस्, यम,
आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शङ्ख, लिखित, दक्ष,
गौतम, शातातप और वसिष्ठ-ये धर्मशास्त्रों के प्रणेता हैं ॥ ४-५ ॥
इदानीं धर्मस्य कारकहेतूनाह-
देशे काल उपायेन द्रव्यं श्रद्धासमन्वितम् ।
पात्रे प्रदीयते यत्तत्सकलं धर्मलक्षणम् ॥ ६ ॥
देशो 'यस्मिन्देशे मृगः कृष्णः' ( १।२ ) इत्युक्तलक्षणः, कालः संक्रान्त्यादिः,
उपायः शास्त्रोक्तेतिकर्तव्यताकलापः, द्रव्यं प्रतिग्रहादिलब्धं गवादि, श्रद्धा
आस्तिक्यबुद्धिः, तदन्वितं यथा भवति तथा । पात्रं 'न विद्यया केवलया' (आचार-
१।२०० ) इत्येवमादिवक्ष्यमाणलक्षणम् । प्रदीयते यथा न प्रत्यावर्तते तथा
परस्वत्वापत्यवसानं त्यज्यते । एतद्धर्मस्योत्पादकम् । किमेतावदेव नेत्याह-
सकलमिति । अन्यदपि शास्त्रोक्तं जातिगुणहोमयागादि तत्सकलं धर्मस्य कारणं
जातिगुणद्रव्यक्रियाभावात्मकं चतुर्विधं धर्मस्य कारणमित्युक्तं भवति । तच्च
समस्तं व्यस्तं वा यथाशास्त्रं द्रष्टव्यम् । श्रद्धा सर्वत्रानुवर्तत एव ॥ ६ ॥
भाषा—(पवित्र) देश में (उपयुक्त) समय पर विधिपूर्वक जो भी
(स्वर्णादि) द्रव्य योग्य व्यक्ति को दान दिया जाता है वह सब धर्म का
लक्षण है ॥ ६ ॥
इदानीं धर्मस्य ज्ञापकहेतूनाह-
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
सम्यक्सङ्कल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ ७ ॥
श्रुतिर्वेदः, स्मृतिर्धर्मशास्त्रम्, तथा च मनुः (२।१०) 'श्रुतिस्तु वेदो
विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः' इति । सदाचारः सतां शिष्टानामाचारोऽनुष्ठानम्,
स्वस्य चात्मनः प्रियं, वैकल्पिकेषु विषये यथा-'गर्भाष्टमेऽष्टमे वाब्दे' (आचार.
२।१४ ) इत्यादावात्मेच्छैव नियमिका । सम्यक्सङ्कल्पजातः कामः शास्त्रविरुद्धो
यथा-'मया भोजनव्यतिरेकेणोदकं न पातव्यम्' इति । एते धर्मस्य मूलं
प्रमाणम् । एतेषां विरोधे पूर्वपूर्वस्य बलीयस्त्वम् ॥ ७ ॥
भाषा-वेद-धर्मशास्त्र, सज्जनों के आचरण, अपने आत्मा के अनुकूल
(उत्तम) कार्य तथा विवेकपूर्ण संकल्प से उत्पन्न हुई इच्छा-ये सब धर्म का
मूल कहे गये हैं ॥ ७ ॥
१. विरोधे तु । २. नुष्ठानं नाशिष्टानाम् । ३. इत्यत्रात्मेच्छैव.
इत्याद्विच्छारमेच्छैव । ४. शास्त्राविरुद्धः कामो यथा ।

आचाराध्यायः ५
देशादिकारकहेतूनामपवादमाह—
इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् ।
अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥ ८ ॥
इज्यादीनां कर्मणामयमेव परमो धर्मः यद्योगेन बाह्यचित्तवृत्तिनिरोधेनात्मनो
दर्शनं याथातथ्यज्ञानम् । योगेनात्मज्ञाने देशादिनियमो नास्तीत्यर्थः । तदुक्तं
'यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात्' (ब्र. सू. ४।१।६।१०) इति¹ ॥ ८ ॥
भाषा—यज्ञानुष्ठान, आचार, इन्द्रियनिग्रह, अहिंसा, दान, वेदाध्ययन और
(पुण्य) कर्मों में यही श्रेष्ठ धर्म है कि योग अर्थात् बाह्य चित्तवृत्ति के निरोध
द्वारा आत्मा का याथातथ्य बोध हो ॥ ८ ॥
कारकहेतुषु ज्ञापकहेतुषु वा संदेहे तु निर्णयहेतुमाह—
चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत्त्रैविद्यमेव वा ।
सा ब्रूते यं स धर्मः स्यादेको वाऽध्यात्मवित्तमः ॥ ९ ॥
चत्वारो ब्राह्मणाः वेद²धर्मशास्त्रज्ञाः पर्षत् । तिस्रो विद्या अधीयन्त इति
त्रैविद्याः, तेषां समूहस्त्रैविद्यम् । धर्मशास्त्रज्ञत्वमत्राप्यनुवर्तते, तद्वा पर्षत् ।
सा पूर्वोक्ता पर्षत् यं ब्रूते स धर्मः । अध्यात्मज्ञानेषु निपुणतमो धर्मशास्त्रज्ञश्च³
एकोऽपि वा यं⁴ब्रूते सोऽपि धर्मः ॥ ९ ॥
भाषा—वेद और धर्म को जानने वाले चार पुरुषों की या तीन विद्याओं के
ज्ञाता तीन ही पुरुषों की पर्षत होती है । वह (पर्षत) जो भी कहे वह
धर्म होता है । अध्यात्मज्ञान में निपुणतम एक ही व्यक्ति जो कुछ कहता है
वह धर्म होता है ॥ ९ ॥
इत्युपोद्घातप्रकरणम् ।
ब्रह्मचारिप्रकरणम्
एतैर्नवभिः श्लोकैः सकलशास्त्रोपोद्घातमुक्त्वा इदानीं वर्णादीनां धर्मान्वक्तुं
प्रथमं तावद्वर्णानाह—
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रयो द्विजाः ।
निषेकाद्याः श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः ॥ १० ॥
ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राश्चत्वारो वर्णा वक्ष्यमाणलक्षणास्तेषामाद्यास्त्रयो ब्राह्मण-
क्षत्रियवैश्या द्विजाः, —द्विजायन्त इति द्विजाः, तेषां द्विजानां वै एव न⁵ शूद्रस्य,
१. पातञ्जले । २. वेदशास्त्रधर्मज्ञाः । ३. वेदधर्मशास्त्रज्ञश्च । ४. सोऽपि धर्म एव । ५. न शूद्राणां ।

६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
एतेन शूद्रस्यामन्त्रकाः क्रियाः इत्युक्तं भवति, 'शूद्रोऽप्येवंविधः कार्यो बिना
मन्त्रेण संस्कृतः' इति यमोक्तेः । निषेकाद्याः निषेको गर्भाधानमाद्यो यासां
तास्तथोक्ताः । श्मशानं पितृवनं तत्संबन्धि कर्म १अन्तो यासां ताः क्रिया
मन्त्रैर्भवन्ति ॥ १० ॥
भाषा—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये (चार) वर्ण हैं; इनमें
आरंभ के तीन द्विज हैं। गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक की इनकी सभी
क्रियाएँ मन्त्रों द्वारा सम्पादित होती हैं ॥ १० ॥
इदानीं ताः क्रिया अनुक्रामति—
गर्भाधानमृतौ पुंसः सवनं स्पन्दनात्पुरा ।
षष्ठेऽष्टमे वा सीमन्तो मास्येते जातकर्म च ॥ ११ ॥
अह्न्येकादशे नाम चतुर्थे मासि निष्क्रमः ।
षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि चूडा कार्या यथाकुलम् ॥ १२ ॥
गर्भाधानमित्यनुगतार्थं कर्मनामधेयम् । एवं वक्ष्यमाणान्यपि । तद् गर्भाधान-
मृतौ ऋतुकाले वक्ष्यमाणलक्षणे । पुंसवनाख्यं कर्म गर्भचलनात्पूर्वम् । षष्ठेऽष्टमे
वा मासि सीमन्तोन्नयनम् । एते च द्वे पुंसवन-सीमन्तोन्नयने क्षेत्रसंस्कारकर्म-
त्वात्सकृदेव कार्ये, न प्रतिगर्भम् । तथाह देवलः—'सकृच्च संस्कृता नारी
सर्वगर्भेषु संस्कृता । य य गर्भं प्रसूयेत स सर्वः संस्कृतो भवेत्' इति । यद्वा-एते
आ इते आगते गर्भकोशाज्जाते २कुमारे जातकर्म एकादशेऽहनि ३नाम ।
तच्च पितामहमातामहादिसम्बद्धं कुलदेवतासम्बद्धं वा । यथाह शङ्खः (२।१४)—
'कुलदेवतासम्बद्धं पिता नाम कुर्यात्' इति । चतुर्थे मासि निष्क्रमणलक्षणं
सूर्यावेक्षणं कर्म । षष्ठे मास्यन्नप्राशनं कर्म । चूडाकरणं तु यथाकुलं कार्यमिति प्रत्येके
सम्बध्यते ॥ ११-१२ ॥
भाषा— गर्भाधान संस्कार (गर्भधारण के) समय पर होता हैं और
पुंसवन गर्भचलन के पहले होता है; जन्म लेने पर जातकर्म, ग्यारहवें
दिन नामकरण, चौथे मास में निष्क्रमण, संस्कार करे । छठें मास में
अन्नप्राशन संस्कार करे और चूडाकरण संस्कार कुल की रीति के
अनुसार करना चाहिए ॥ ११-१२ ॥
एतेषां नित्यत्वेऽप्यानुषङ्गिकं फलमाह—
एवमेनः शमं याति बीजगर्भसमुद्भवम् ।
१. अन्ते यासां । २. कुमारे जाते । ३. नामकशब्द ।

आचाराध्यायः ७
एवमुक्तेन प्रकारेण गर्भाधानादिभिः संस्कारकर्मभिः कृतैरेनः पापं शमं
याति। किम्भूतम् ? बीजगर्भसमुद्भवं शुक्रशोणितसंबद्धं गात्रव्याधिसंक्रान्तिनिमित्तं
वा, न तु पतितोत्पन्नत्त्वादि ॥—
स्त्रीणां विशेषमाह—
तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ॥ १३ ॥
एता जातकमीदिकाः क्रियाः स्त्रीणां तूष्णीं विनैव मन्त्रैर्यथाकालं कार्याः ।
विवाहः पुनः समन्त्रकः कार्यः ॥ १३ ॥
भाषा— इस प्रकार से ( इन संस्कारों द्वारा ) शुक्र और गर्भ से संबद्ध पाप
शान्त होता है । ये जातकमीदि ) स्त्रियों के लिये विना मन्त्र के किये जाते हैं
और विवाह संस्कार मंत्रों के साथ होता है ॥ १३ ॥
उपनयनकालमाह—
गर्भाष्टमेऽष्टमे वाऽब्दे ब्राह्मणस्योपनायनम् ।
राज्ञामेकादशे सैके विशाभेके यथाकुलम् ॥ १४ ॥
गर्भाधानमादिं कृत्वा जननं वाऽष्टमे वर्षे ब्राह्मणस्योपनायनं उपनयनमेवोप-
नायनम् । स्वार्थे अण् । १वृत्तानुसारत, छन्दोभङ्गात् । आर्षं वा दीर्घत्वम् ।
अत्रेच्छया विकल्पः । राज्ञामेकादशे । विशां वैश्यानां सैके एकादशे । द्वादशे
इत्यर्थः । 'गर्भ'ग्रहणं सर्वत्रानुवर्तते । समासे गुणभूतस्यापि 'गर्भ'शब्दस्य बुद्धया
विभज्योभयत्राप्यनुवर्तनं कार्यम् । 'गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भाद्धि द्वादशे विशः'
( शंख. २।७) इति स्मृत्यन्तरदर्शनात् । यथा अथ ४शब्दानुशासनं, केषां
शब्दानाम् ? लौकिकानां वैदिकानामिति । अत्रापि कार्यमित्यनुवर्तते । कुलस्थित्या
केचिदुपनयनमिच्छन्ति ॥ १४ ॥
भाषा— गर्भकाल से आठवें अथवा जन्म से आठवें वर्ष में ब्राह्मण का
उपनयन संस्कार होता है । इसी प्रकार कुल के अनुसार क्षत्रिय के लिए ग्यारहवें
वर्ष में और वैश्य के लिये बारहवें वर्ष में यह संस्कार विहित है ॥ १४ ॥
गुरुधर्मनाह—
उपनीय गुरुः शिष्यं महाव्याहृतिपूर्वकम् ।
वेदमध्यापयेदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेत् ॥ १५ ॥
स्वगृह्योक्तविधिनाेपनीय गुरुः ५शिष्यं महाव्याहृतिपूर्वकं वेदमध्यापयेत् ।
महाव्याहृतयश्च भूर्भुवस्स्वस्त्यान्ताः सप्त । पञ्च वा गौतमाभिप्रायेण । किञ्च
१. अवधिं कृत्वा जन्मनो । २. प्रकरणानुसारम् । ३. वचनात् ।
४. शब्दानामिति । ५. शिष्यं गुरुः ।

८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
शौचाचारांश्च वक्ष्यमाणलक्षणान् शिक्षयेत् । 'उपनीय शौचाचारांश्च शिक्षयेत्'
इत्यनेन प्रागुपनयनात्कामचारो दर्शितो वर्णधर्मान्वर्जयित्वा । स्त्रीणामप्येतत्स-
मानं विवाहादर्वाक् , उपनयनस्थानीयत्वाद्विवाहस्य ॥ १५ ॥
भाषा- गुरु शिष्य का उपनयन संस्कार करके उसे महाव्याहृतियों के
साथ वेद पढ़ावे और शौच के नियमों की शिक्षा दे ॥ १५ ॥
शौचाचारानाह-
दिवासंध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः ।
कुर्यान्मूत्रपुरीषे च रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः ॥ १६ ॥
कर्णस्थं ब्रह्मसूत्रं यस्य स तथोक्तः । कर्णश्च दक्षिणः, 'पवित्रं दक्षिणे कर्णे
कृत्वा विण्मूत्रमुत्सृजेत्' इति लिङ्गात् । असावहनि संध्ययोश्च उदङ्मुखो मूत्र-
पुरीषे कुर्यात् । चकाराद्भस्मादिरहिते देशे । रात्रौ तु दक्षिणामुखः ॥ १६ ॥
भाषा- यज्ञोपवीत कान पर चढ़ाकर दिन में एवं सन्ध्या को उत्तर की
ओर मुख करके तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुख करके मूत्र और पुरीष का
त्याग करे ॥ १६ ॥
गृहीतशिश्नश्चोत्थाय मृद्भिरभ्युद्धृतैर्जलैः ।
गन्धलेपक्षयकरं शौचं कुर्यादतन्द्रितः ॥ १७ ॥
किंच, अनन्तरं शिश्नं गृहीत्वोत्थायोद्धृताभिरद्भिर्वक्ष्यमाणलक्षणाभिर्मृद्भिश्श्च
गन्धलेपयोः क्षयकरं शौचं कुर्यात् । अतन्द्रितोऽनलसः । उद्धृताभिरद्भिरिति
जलान्तःशौचनिषेधः । अत्र 'गन्धलेपक्षयकरम्' इति सर्वाश्रमिणां साधारणमिदं
१शौचम् । मृत्संख्यानियमस्त्वदृष्टार्थः ॥ १७ ॥
भाषा- शिश्न को पकड़ कर और उठाकर, अलग लिये गये जल और
मिट्टी द्वारा (मल के) गन्ध एवं लेप को नष्ट करने वाला शौच आलस्यरहित
होकर करे ॥ १७ ॥
अन्तर्जानु शुचौ देश उपविष्ट उदङ्मुखः ।
प्राग्वा ब्राह्मेण तीर्थेन द्विजो नित्यमुपस्पृशेत् ॥ १८ ॥
शुचौ अशुचिद्रव्यासंसृष्टे । देश इत्यु२पानच्छयनासनादिनिषेधः । उपविष्टो
न स्थितः शयानः प्रह्वो गच्छन्वा । उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वेति दिगन्तरनिवृत्तिः ।
'शुचौ देशे' इत्येतस्मात्पादप्रक्षालनप्राप्तिः । ब्राह्मेण तीर्थेन वक्ष्यमाणलक्षणेन
द्विजो न शूद्रादिः । नित्यं सर्वकालमाश्रमान्तरगतोऽपि । उपस्पृशेदाचामेत् ।
कथम् ? अन्तर्जानु जानुनोर्मध्ये हस्तौ कृत्वा दक्षिणेन हस्तेनेति ॥ १८ ॥
१. शौचमिदं । २. इत्युपादानात् ।

आचाराध्यायः
भाषा—ब्राह्मण प्रतिदिन दोनों घुटनों के बीच हाथ रखकर, पवित्र
स्थल पर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठे और ब्राह्म तीर्थ से आचमन
करे ॥ १८ ॥
प्राजापत्यादितीर्थान्याह—
कनिष्ठादेशिन्यङ्गुष्ठमूलान्यग्रं करस्य च ।
प्रजापतिपितृब्रह्मदेवतीर्थान्यनुक्रमात् ॥ १९ ॥
कनिष्ठायास्तर्जन्या अङ्गुष्ठस्य च मूलानि करस्याग्रं च प्रजापतिपितृब्रह्मदेव-
तीर्थानि यथाक्रमं वेदितव्यानि ॥ १९ ॥
भाषा—कनिष्ठा, तर्जनी और अंगुठे के मूलभाग तथा हाथ का अग्रभाग-
ये सब क्रमशः प्रजापति तीर्थ, पितृतीर्थ और देवतीर्थ कहे जाते हैं ॥ १९ ॥
आचमनप्रकारः—
त्रिः प्राश्यापो द्विरुन्मृज्य खान्यद्भिः समुपस्पृशेत् ।
अद्भिस्तु प्रकृतिस्थाभिर्हीनाभिः फेनबुद्बुदैः ॥ २० ॥
वारत्रयमपः पीत्वा मुखमङ्गुष्ठमूलेन द्विरुन्मृज्य खानि छिद्राणि ऊर्ध्वकाय-
गतानि घ्राणादीनि अद्भीरुपस्पृशेत् । १अद्भिरित्यशान्तरसंसृष्टाभिः । २पुनरद्भि-
रित्यवग्रहणं प्रतिच्छिद्रमुदकस्पर्शानार्थम् । स्मृत्यन्तरात्-'अङ्गुष्ठेन प्रदेशिन्या घ्राणं
चैव मुखं स्पृशेत् । अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां च चक्षुः श्रोत्रं पुनः पुनः ॥ कनिष्ठाङ्गुष्ठ-
योर्नाभिं हृदयं तु तलेन वै । सर्वाभिस्तु शिरः पश्चाद्बाहू चाग्रेण संस्पृशेत् ॥'
इति । पुनस्ता एव विशिनष्टि-प्रकृतिस्थाभिः गन्धरूपरसस्पर्शान्तरमप्राप्ताभिः ।
फेनबुद्बुदरहिताभिः । तु शब्दादूर्ध्वधारागतानां शूद्राद्यावर्जितानां च
निषेधः ॥ २० ॥
भाषा—तीन बार जल पीकर, (अँगूठे के मूलभाग से) दो बार मुख
धोकर, नाक, कान, आँख और मुँह का जल से स्पर्श करे। वह जल स्वच्छ
होना चाहिए' उसमें फेन एवं बुलबुले न होंवे ॥ २० ॥
| हृत्कण्ठतालुगाभिस्तु यथासंख्यं द्विजातयः ।
शुध्येरन्स्त्री च शूद्रश्च सकृत्स्पृष्टाभिरन्ततः ॥ २१ ॥
हृत्कण्ठतालुगाभिरद्भिर्यथाक्रमेण द्विजातयः शुष्यन्ति । स्त्री च शूद्रश्च
अन्ततः ३अन्तर्गतेन तालुना स्[पृ]ष्टाभिरपि । 'सकृत्' इति वैश्याद्विशेषः । च
शब्दादनुपनीतोऽपि ॥ २१ ॥
१. संस्पृष्टाभिः । २. पुनर्रवग्रहणं । ३. अन्तेन ।

१० याज्ञवल्क्यस्मृतिः

भाषा—द्विजाति अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः हृदय,
कण्ठ और तालु तक जल के पहुँचने पर शुद्ध होते हैं। स्त्री और शूद्र तो
तालु से एक ही बार जल स्पर्श कराने पर शुद्ध हो जाते हैं ॥ २१ ॥
स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्मार्जनं प्राणसंयमः ।
सूर्यस्य चाप्युपस्थानं गायत्र्याः प्रत्यहं जपः ॥ २२ ॥
प्रातःस्नानं यथाशास्त्रमब्दैवतैर्मन्त्रैः 'आपोहिष्ठा' इत्येवमादिभिर्मार्जनम् ।
प्राणसंयमः प्राणायामो वक्ष्यमाणलक्षणः । ततः सूर्यस्योपस्थानं सौरमन्त्रेण
गायत्र्याः । 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' इत्याद्यायाः प्रतिदिनंसं २जपः कार्यः । 'कार्य'-
शब्दो यथालिङ्गं प्रत्येकमभिसंबध्यते ॥ २२ ॥
भाषा—स्नान, अब्दैवत मन्त्र द्वारा मार्जन, प्राणायाम, (तदुपरान्त )
सूर्योपस्थान और गायत्री का जप प्रतिदिन करे ॥ २२ ॥
प्राणायामविचारः—
गायत्रीं शिरसा सार्धं जपेद् व्याहृतिपूर्विकाम् ।
प्रतिप्रणवसंयुक्तां त्रिरयं प्राणसंयमः ॥ २३ ॥
गायत्रीं पूर्वोक्ताम् 'आपोज्योतिः' इत्यादिना शिरसा संयुक्तां उक्तव्याहृति-
पूर्विकां प्रतिव्याहृति प्रणवेन संयुक्तां ओंभूः ओंभुवः ओस्वरिति त्रीन्वारान्मुख
नासिकासंचारिवायुं निरुन्धन् मनसा जपेदित्ययं सर्वत्र प्राणायामः ॥ २३ ॥
भाषा—शिरोमन्त्र और महाव्याहृति (का जप करने) के उपरान्त
(प्रत्येक महाव्याहृति में) प्रणव जोड़ते हुए गायत्री का तीन बार (मुख
और नासिका की) श्वासवायु रोककर जप करने पर एक प्राणायाम
होता है ॥ २३ ॥
सावित्रीजपप्रकारः—
प्राणानायम्य संप्रोक्ष्य तृचेनाब्दैवतेन तु ।
जपन्नासीत सावित्रीं प्रत्यगातारकोदयात् ॥ २४ ॥
संध्यां प्राक्प्रातरेवं हि तिष्ठेदा सूर्यदर्शनात् ।
प्राणायामं पूर्वोक्तं कृत्वा तृचेनाब्दैवतेन पूर्वोक्तेनात्मानमद्भिः संप्रोक्ष्य सावित्रीं
जपन् प्रत्यक्संध्यामा³सीत । अर्थात् 'प्रत्यङ्मुख' इति लभ्यते । आ तारकोदयात्
तारकोदयावधि । प्राक्संध्यां प्रातः समये एवं पूर्वोक्तविधिमाचरन् प्राङ्मुखः
सूर्योदयावधि तिष्ठेत् । अहोरात्रयोः संधौ या क्रिया विधीयते सा संध्या । तत्र
१. मित्यादेः । २. जपः कार्यः । ३. मुपासीत ।

खण्डमण्डलस्योपलब्धिः स संधिः ॥ २४ ॥

अहः संपूर्णादित्यमण्डलदर्शनयोग्यः कालः, तद्विपरीता रात्रिः । यस्मिन्काले
खण्डमण्डलस्योपलब्धिः स संधिः ॥ २४ ॥
भाषा—प्राणायाम के उपरान्त मार्जन के मंत्र से सिर पर जल छिड़ककर
(सन्ध्या को) पश्चिम की ओर मुख करके तारागण का उदय होने तक सावित्री
का जप करे ॥ २४ ॥
अग्निकार्यं ततः कुर्यात्संध्ययोरुभयोरपि ॥ २५ ॥
ततः संध्योपासनानन्तरं द्वयोः संध्ययोरग्निकार्यं अग्नौ कार्यं समित्प्रक्षेपादि
यत्तत्कुर्यात् स्वगृह्योक्तेन विधिना ॥ २५ ॥
भाषा—इसी प्रकार प्रातःकाल सूर्य के उदय होने तक पूर्व दिशा को
करके मुख जप करे । इसके उपरान्त दोनों सन्ध्याओं में (सायं एवं प्रातः)
अग्निहोत्र करे ॥ २५ ॥
ततोऽभिवादयेद्वृद्धानसावहमिति ब्रुवन् ।
तदनन्तरं वृद्धान् गुरुप्रभृतीन्अभिवादयेत् । कथम् ? असौ देवदत्तशर्माऽहमिति
स्वं नाम कीर्तयन् ॥—
गुरुं चैवाप्युपासीत स्वाध्यायर्थं समाहितः ॥ २६ ॥
आहूतश्चाप्यधीयीत लब्धं चास्मै निवेदयेत् ।
हितं तस्याचरेन्नित्यं मनोवाक्कायकर्मभिः ॥ २७ ॥
तथा गुरुं वक्ष्यमाणलक्षणमुपासीत तत्परिचर्यापरस्तदधीनस्तिष्ठेत् । स्वाध्या-
यार्थमध्ययनसिद्धये समाहितोऽविक्षिप्तचित्तो भवेत् । आहूतश्चाप्यधीयीत गुर्वाहूत
एवाधीयीत, न स्वयं गुरुं प्रेरयेत् । यच्च लब्धं तत्सर्वं गुरवे निवेदयेत् । तथा तस्य
गुरोर्हितमाचरेत् । नित्यं सदा । मनोवाक्कायकर्मभिः न प्रतिकूलं कुर्यात् ।
अपिशब्दाद्गुरुदर्शने गौतमोक्तं कण्ठप्रावृतादि वर्जयेत् ॥ २६-२७ ॥
भाषा—तब 'मैं अमुक हूँ' ऐसा कहते हुए श्रेष्ठ व्यक्तियों को प्रणाम
करे । अध्ययन के लिए दत्तचित होकर गुरु की परिचर्या करे । (गुरु द्वारा)
बुलाये जाने पर ही अध्ययन करे और जो कुछ प्राप्त हो वह सब गुरु को
अर्पित करे । मन, वाणी, शरीर और कार्यों द्वारा उनके अनुकूल कार्य
करे ॥ २६-२७ ॥
कृतज्ञाद्रोहिमेधाविशुचिकल्या²नसूयकाः ।
अध्याप्या धर्मतः साधुशक्ताप्तज्ञानवित्तदाः ॥ २८ ॥
१. लब्धं तस्मै । २. कल्याणसूचकाः । ३. अध्याप्याः साधुशक्ताप्तस्वार्थदा
धर्मतस्त्विमे ।

१२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
कृतमुपकारं न विस्मरतीति कृतज्ञः। अद्रोही दयावान् । मेधावी ग्रन्थ-
ग्रहणधारणशक्तः । शुचिर्बाह्याभ्यन्तरशौचवान् । कल्यः आधिव्याधिरहितः ।
अनसूयको दोषानाविष्करणेन गुणाविष्करणशीलः । साधुः वृत्तवान् । शक्तः
शुश्रूषायाम् । आप्तो बन्धुः । ज्ञानदो विद्याप्रदः । १वित्तदोऽर्पणपूर्वकसमर्थप्रदाता ।
एते गुणाः समस्ता व्यस्ताश्च यथासंभवं द्रष्टव्याः । एते च धर्मतः शास्त्रानुसारेण
अध्याप्याः ॥ २८ ॥
भाषा—कृतज्ञ, द्रोहहीन, मेधावी, पवित्र आधिव्याधि में मुक्त, परदोषान्वेषण
से विरत, सदाचारी, ( सेवा में ) समर्थ, बन्धु, विद्याप्रद एवं धनदाता — ये ही
शास्त्र के अनुसार अध्यापन योग्य होते हैं ॥ २८ ॥
दण्डादिधारणमाह—
दण्डाजिनोपवीतानि मेखलां चैव धारयेत् ।
तथा स्मृत्यन्तरप्रसिद्धं पालाशादिदण्डं, अजिनं च १कार्ष्णादि, उपवीतं
कार्पासादिविनिर्मितं, मेखलां च मुञ्जादि, ब्राह्मणादिर्ब्रह्मचारी धारयेत् ॥—
भैक्षचर्याप्रकारः—
ब्राह्मणेपु चरेद् भैक्षमनिन्द्येष्वात्मवृत्तये ॥ २९ ॥
आदिमध्यावसानेषु भवच्छब्दोपलक्षिता ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां भैक्षचर्या२ यथाक्रमम् ॥ ३० ॥
पूर्वोक्तदण्डादियुक्तो ब्रह्मचारी ब्राह्मणेप्वनिन्द्येषु अभिशस्तादिव्यतिरिक्तेषु
स्वकर्मनिरतेषु भैक्षं३ चरेत् । आत्मवृत्तये आत्मनो जीवनाय न परार्थं आचार्य-
तद्भार्यापुत्रव्यतिरेकेण । निवेद्य गुरवे तदनुज्ञातो भुञ्जीत । 'तदभावे तत्पुत्रादा'
इति नियमात् । अत्र च 'ब्राह्मण' ग्रहणं संभवे ४सति नियमार्थम् । यत्तु
'सार्ववर्णिकं भैक्षचरणम्' इति, तस्त्रैवर्णिक५विषयम् । यच्च 'चातुर्वर्ण्यं चरेद्वैक्षम्'
इति, तदापद्विषयम् । कथं भैक्षचर्या कार्या ? आदिमध्यावसानेषु भवच्छब्दो-
पलक्षिता 'भवति भिक्षां देहि', 'भिक्षां भवति देहि', भिक्षां देहि भवति इत्येवं
वर्णक्रमेण भैक्षचर्या कार्या ॥ २९-३० ॥
भाषा—पलाश का दण्ड, कृष्णमृगचर्म, यज्ञोपवीत और मूँज की मेखला
धारण करे । जीवन निर्वाह के लिए पवित्र ( अर्थात् अपने कर्म में रत रहने
वाले ) ब्राह्मणों के घर भिक्षायाचन करे । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः
आरम्भ, मध्य और अन्त में 'भवत्' शब्द का प्रयोग करते हुए भिक्षा की
याचना करे ॥ २९-३० ॥
१. अर्पणपूर्वकं । २. कार्ष्णाजिनादि । ३. भैक्ष्य । ४. सति ।
नियमार्थं । ५. त्रैवर्णिकप्राप्त्यर्थम् ।

आचाराध्यायः [१९]
भोजनप्रकारः—
कृताग्निकार्यो भुञ्जीत वाग्यतो गुर्वनुज्ञया ।
आपोशानक्रियापूर्वं सत्कृत्यान्नमकुत्सयन् ॥ ३१ ॥
पूर्वोक्तेन विधिना भिक्षामहृत्य गुरवे निवेद्य तदनुज्ञया कृताग्निकार्यो
वाग्यतो मौनी अन्नं सत्कृत्य संपूज्य अकुत्सयन्ननिन्दन् आपोशानक्रियां 'अमृतोप-
स्तरणमसि' इत्यादिकां पूर्वं कृत्वा भुञ्जीत । अत्र पुनः अग्निकार्यग्रहणं
संध्याकाले कथञ्चिदकृताग्निकार्यस्य ^१कालान्तरविधानार्थं न पुनस्तृतीय-
प्राप्त्यर्थम् ॥ ३१ ॥
भाषा--(हवनादि) अग्निकार्य करके गुरु की आज्ञा पाकर, आचमन
करके, अन्न का सत्कार करके और (अन्न की) निन्दा न करते हुए मौन
होकर भोजन करे ॥ ३१ ॥
ब्रह्मचर्ये स्थितो नैकमन्नमद्यादनापदि ।
ब्राह्मणः काममश्नीयाच्छ्राद्धे व्रतमपीडयन् ॥ ३२ ॥
ब्रह्मचर्ये स्थित ^२एकान्नं नाद्यादनापदि स्वास्थ्याभावे । ब्राह्मणः पुनः
श्राद्धेऽभ्यर्थितः सन् ^३काममश्नीयात् । व्रतमपीडयन् मधुमांसपरिहारेण ।
अत्र 'ब्राह्मण' ग्रहणं क्षत्रियादेः श्राद्धभोजनव्युदासार्थम् । 'राजन्यवैश्ययोश्चैव
नैतत्कर्म प्रचक्षते' इति स्मरणात् ॥ ३२ ॥
भाषा-ब्रह्मचर्याश्रम में रहते हुए, रोगादि विपत्ति से मुक्त दशा में किसी
एक ही (व्यक्ति के) अन्न का भोजन न करे; श्राद्ध भोजन के अवसर पर ब्राह्मण
अपने व्रत का उल्लंघन न करते हुए ऐसा कर सकता है ॥ ३२ ॥
मधुमांसादिवर्ज्यान्त्याह—
मधुमांसाञ्जनोच्छिष्टशुक्तस्त्रीप्राणिहिंसनम् ।
भास्करालोकनाश्लीलपरिवादादि वर्जयेत् ॥ ३३ ॥
मधु क्षौद्रं, न मद्यम्; तस्य 'नित्यं मद्यं ब्राह्मणो वर्जयेत्' इति निषेधात् ।
मांसं छागादेरपि । अञ्जनं घृतादिना गात्रस्य, कज्जलादिना चाक्ष्णोः । उच्छिष्ट-
मग्गुरोः । शुक्तं निष्ठुरवाक्यं, ^४नाम्लरसः, तस्या भक्ष्यप्रकरणे निषेधात् । स्त्रियसमुप-
भोगे । प्राणिहिंसनं जीववधः । ^५भास्करस्योदयास्तमयावलोकनम् । अश्लीलम-
सस्र्यंभाषणम् । परिवादः संवसद्रूपस्य परदोषस्य ख्यापनम् । 'आदि' शब्दात्
स्मृत्यन्तरोक्तं गन्धमाल्यादि गृह्यते । एतानि ब्रह्मचारी वर्जयेत् ॥ ३३ ॥
१. कालान्तरं मध्याह्नादि । २. एकान्नमेकस्वामिकम् । ३. कामं यथेष्टम् ।
४. न रसादि । ५. भास्करस्य चालोकनं । ६. गुह्यभाषणं ।

२४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
भाषा—मधु, मांस, लेप और अंजन (गुरु के अतिरिक्त अन्य का)
जूठा भोजन, कठोर वचन, स्त्री, जीवहिंसा, (उदय और अस्त के समय)
सूर्यदर्शन, अश्लील (और असत्य) भाषण तथा दोषान्वेषण इत्यादि से
परहेज रखे ॥ ३३ ॥
गुर्वादिलक्षणमाह—
स गुरुर्यः क्रियाः कृत्वा वेदमस्मै प्रयच्छति ।
उपनीय दद्वेदमाचार्यः स उदाहृतः ॥ ३४ ॥
योऽसौ गर्भाधानाद्या उपनयनपर्यन्ताः क्रिया यथाविधि कृत्वा वेदमस्मै
ब्रह्मचारिणे प्रयच्छति स गुरुः। यः पुनरुपनयनमात्रं कृत्वा वेदं १प्रयच्छति स
आचार्यः ॥ ३४ ॥
भाषा—वह गुरु होता है जो (उपनयन तक की) क्रियाएँ करके इस
(ब्रह्मचारी) को वेद का ज्ञान देता है। केवल उपनयन संस्कार करके वेद
प्रदान करने वाले को आचार्य कहा गया है ॥ ३४ ॥
उपाध्यार्त्विज्लक्षणम्—
एकदेशमुपाध्याय ऋत्विग्यज्ञकृदुच्यते ।
एते मान्या यथापूर्वमेभ्यो माता गरीयसी ॥ ३५ ॥
वेदस्यैकदेशं मन्त्रब्राह्मणयोरेकं अङ्गानि वा योऽध्यापयति स उपाध्यायः ।
यः पुनः पाकयज्ञादिकं वृतः करोति स ऋत्विक्। एते च गुर्वाचार्योपाध्यायर्त्विजो
यथापूर्वं यथाक्रमेण मान्याः पूज्याः । एभ्यः सर्वेभ्यो माता गरीयसी पूज्यतमा ॥३५॥
भाषा—(वेद के) एक भाग या अङ्ग की शिक्षा देने वाला उपाध्याय
होता है, और यज्ञकर्म कराने वाले को ऋत्विज् कहते हैं। ये (गुरु, आचार्य,
उपाध्याय और ऋत्विज्) क्रमानुसार पूज्य होते हैं, और माता इन सबसे
अधिक पूजनीय होती है ॥ ३५ ॥
वेदग्रहणार्थं ब्रह्मचर्यावधिमाह—
प्रतिवेदं ब्रह्मचर्यं द्वादशाब्दानि पञ्च वा ।
ग्रहणान्तिकमित्येके केशान्तश्चैव षोडशे ॥ ३६ ॥
यदा विवाहासंभवे 'वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वा' इति प्रवर्तते तदा प्रतिवेदं
वेदं वेदं प्रति ब्रह्मचर्यं पूर्वोक्तं द्वादशवर्षाणि कार्यम् । अशक्तौ पञ्च । 'ग्रहणान्तिकं'
इत्येके वर्णयन्ति । केशान्तः पुनर्गोदानाख्यं कर्म गर्भादारभ्य षोडशे वर्षे
१. ददाति ।

आचाराध्यायः १५
ब्राह्मणस्य कार्यम्। एतच्च द्वादशवार्षिके वेदव्रते बोद्धव्यम्। इतरस्मिन्पक्षे
यथासंभवं द्रष्टव्यम्। राजन्य-वैश्ययोस्तूपनयनकालवद् द्वाविंशे चतुर्विंशे वा१
द्रष्टव्यम् ॥ ३६ ॥
भाषा—प्रत्येक वेद के लिए बारह अथवा पांच वर्षों का ब्रह्मचर्यकाल
होता है; किन्तु कुछ लोग विद्याग्रहण के अन्त तक ब्रह्मचर्य बताते हैं।
केशान्त या गोदान नाम का कर्म (गर्भकाल से) सोलहवें वर्ष में करना
चाहिए ॥ ३६ ॥
उपनयनकालस्य परमावधिमाह—
आ षोडशादा द्वाविंशाच्चतुर्विंशाच्च वत्सरात् ।
ब्रह्मक्षत्रविशां काल औपनायनिकः परः ॥ ३७ ॥
अत ऊर्ध्वं पतन्त्येते २सर्वधर्मबहिष्कृताः ।
सावित्रीपतिता व्रात्या व्रात्यस्तोमादृते क्रतोः ॥ ३८ ॥
आषोडशाद्वर्षात्षोडशवर्षं यावत् आ द्वाविंशादा चतुर्विंशाद्वर्षाद्ब्रह्मक्षत्रविशां३
औपनायनिकः उपनयनसंबंधी परः कालः। नातः परमुपनयनकालोऽस्ति,
किन्तु अत ऊर्ध्वं पतन्त्येते सर्वधर्मबहिष्कृताः। सर्वधर्मेष्वनधिकारिणो भवन्ति।
सावित्रीपतिताः पतितसावित्रीका भवन्ति। सावित्रीदानयोग्या न भवन्ति।
व्रात्याः संस्कारहीनाश्च व्रात्यस्तोमात्क्रतोर्विना कृते तु तस्मिन्नुपनयनाधिकारिणो
भवन्ति ॥ ३७-३८ ॥
भाषा—सोलह, बाइस और चौबीस वर्ष तक क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय
वैश्य के लिए उपनयन संस्कार की आखिरी अवधि होती है। इस समय के
बाद (यज्ञोपवीत न होने पर) ये सभी धर्मों से बहिष्कृत होकर च्युत,
सावित्रीदान के अयोग्य और व्रात्यस्तोम यज्ञ के बिना व्रात्य अर्थात् संस्कारहीन
हो जाते हैं ॥ ३७-३८ ॥
'आद्यास्त्रयो द्विजाः' (आचार. २०।१) इत्युक्तं, तत्र हेतुमाह—
मातुर्यदग्रे जायन्ते द्वितीयं मौञ्जिबन्धनात् ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशस्तस्मादेते द्विजाः स्मृताः ॥ ३९ ॥
मातुः सकाशात्प्रथमं जायन्ते, मौञ्जिबन्धनाच्च द्वितीयं जन्म यस्मात्तस्मादेते
ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्या द्विजा उच्यन्ते ॥ ३९ ॥
१. वा यथासंभवं। २. त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः। ३. ब्राह्मणक्षत्रियविशां।

१६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
भाषा—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पहले माता से जन्म लेते हैं; मौजि-
मेखला के बाँधे जाने पर (उपनयन के समय) इन सबका दूसरा जन्म होता है;
अतः इन्हें द्विज कहा जाता है ॥ ३९ ॥
वेदग्रहणाध्ययनफलमाह—
यज्ञानां तपसां चैव शुभानां चैव कर्मणाम् ।
वेद एव द्विजातीनां निःश्रेयसकरः परः ॥ ४० ॥
यज्ञानां श्रौत-स्मार्तानां, तपसां कार्यसन्तापरूपाणां चान्द्रायणादीनां, शुभानां
च कर्मणां उपनयनादिसंस्काराणां अवबोधकत्वेन वेद एव द्विजातीनां परो
निःश्रेयसकरो १ नान्यः। 'वेद एव' इति तन्मूलकत्वेन स्मृतेरप्युपलक्षणार्थम् ॥ ४० ॥
भाषा—यज्ञों, तपस्याओं और (उपनयनादि) शुभ कर्मों का अवबोधक
होने से वेद ही द्विजातियों के लिए परम उपकारक होता है दूसरा नहीं ॥ ४० ॥
ग्रहणाध्ययनफलमुक्त्त्वेदानीं २काम्यव्रतब्रह्मयज्ञाध्ययनफलमाह—
मधुना पयसा चैव स देवांस्तर्पयेद् द्विजः ।
पितॄन्मधुघृताभ्यां च ऋचोऽधीते च३ योऽन्वहम् ॥ ४१ ॥
यजूंषि भक्तितोऽधीते योऽन्वहं स घृतामृतैः ।
प्रीणाति देवानाज्येन मधुना च पितॄंस्तथा ॥ ४२ ॥
स तु सोमघृतैर्देवांस्तर्पयेद्योऽन्वहं पठेत् ।
सामानि तृप्तिं कुर्याच्च पितॄणां मधुसर्पिषा ॥ ४३ ॥
योऽन्वहमृचोऽधीते स मधुना पयसा च देवान्पितॄंश्च मधुघृताभ्यां तर्पयति ।
यः पुनः शक्तितोऽन्वहं यजूंष्यधीते स घृतामृतैर्देवान्पितॄंश्च मधुसर्पिभ्यां तर्पयति ।
यस्तु सामान्यन्वहमधीते स सोमघृतैर्देवान्पितॄंश्च मधुसर्पिभ्यां प्रीणाति ।
ऋगादिग्रहणं सामान्येन ऋगादिमं६त्राप्रासद्यर्थम् ॥ ४१-४३ ॥
भाषा—जो द्विज प्रतिदिन ऋचाओं का अध्ययन करता है, वह मधु और
दूध से देवताओं के लिये तथा मधु और घृत से पितरों के लिये तर्पण करता है ।
जो (द्विज) प्रतिदिन यथाशक्ति यजुस् मन्त्रों का अध्ययन करता है वह घृत
और जल से देवताओं का तथा आज्य एवं मधु से पितरों को प्रसन्न करता है ।
जो (द्विज) प्रतिदिन सामवेद के मन्त्रों का पाठ करता है वह सोम और घृत
से देवताओं के लिए तर्पण करता है, और मधु तथा घृत द्वारा पितरों को तृप्ति
प्रदान करता है ॥ ४१-४३ ॥
१. परो मोक्षकरो । २. काम्यब्रह्म । ३. हि यो । ४. पितॄंश्च
मधुना द्विजः । ५. प्रीणाति । ६. मंत्र ।