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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 782 में से

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पृष्ठ 54

( ४८ )
आत्मा का अज्ञान और क्लेश ४७६ | उपपातक ५०८
मुक्ति कौन पाता है ? ४७८ | जाति अंश के कारणभूत पाप "
मोक्षप्राप्ति का हेतु ४७९ | ब्राह्मणहत्या के प्रायश्चित्त की विधि ५१३
कर्मफलभोग के लिए शरीरधारण आत्मा को नट से उपमा " | ब्रह्मवध के विषय में विशेष नियम ५१४
मोक्ष का मार्ग, स्वर्गमार्ग संसरण-मार्ग ४८१ | प्रोत्साहक आदि के लिए दण्ड-प्रायश्चित्त ५१६
आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण ४८३ | बालक और वृद्ध के लिए आधा प्रायश्चित्त ५१७
क्षेत्रज्ञ का स्वरूप ४८४ | ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त की अवधि ५१८
बुद्धि आदि की उत्पत्ति " | ब्रह्महत्या का दूसरा प्रायश्चित्त ५२१
गुणस्वरूप ४८५ | ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त का अतिदेश ५२५
स्वर्गमार्ग, पितृयान ४८६ | आत्रेयी की हत्या का प्रायश्चित्त ५२६
पितृयान के मुनियों का वर्णन ४८७ | आत्रेयी का लक्षण "
ज्ञान के हेतु " | सुरापान प्रायश्चित्त ५२७
आत्मज्ञानी और देवयान ४८८ | सुरा के विषय में विचार ५२८
उपासना की विधि ४८९ | एकादश मद्य ५२९
धारणात्मक योगाभ्यास का प्रयोजन ४९० | सुरापान का दूसरा प्रायश्चित्त ५३०
योग की सिद्धि के लक्षण ४९१ | सुरायुक्त शुष्कान्न के भक्षण का प्रायश्चित्त "
कर्मों के त्याग से मुक्ति " | सुरापात्र में जल पीने का प्रायश्चित्त ५३१
गृहस्थ के लिए भी मुक्ति संभव " | मद्यपान का प्रायश्चित्त ५३२
( ५ ) प्रायश्चित्तप्रकरण | द्विजाति की पत्नी के विषय में सुरापान प्रायश्चित्त ५३४
कर्मविपाक का निरूपण ४९२ | सुवर्णस्तेय का प्रायश्चित्त "
महापातकी का पुनः पुनः जन्म " | शङ्ख के विचार ५३५
कर्म के अनुसार शरीरधारण ४९६ | सुवर्ण शब्द का अर्थ ५३६
पतित होने का कारण और आवश्यकता ४९७ | सुवर्णस्तेय का दूसरा प्रायश्चित्त ५३७
प्रायश्चित्त का अधिकारी " | गुरुतल्पगमन का प्रायश्चित्त ५३९
प्रायश्चित्त न करने पर दोष ४९९ | गुरु शब्द का अर्थ "
इक्कीस नरक ५०० | गुरुतल्पगमन का दूसरा प्रायश्चित्त ५४२
प्रायश्चित्त का फल ५०१ | महापातकियों के साथ संसर्ग का प्रायश्चित्त ५४६
महापातकी ५०२ | इस विषय में नियम का अपवाद ५४९
ब्रह्महत्या के समान पाप ५०५ | शूद्रादि के विषय में प्रायश्चित्त ५५०
सुरापान के समान पाप " | गोवध का प्रायश्चित्त ५५१
सुवर्णस्तेय के समान पाप ५०६
गुरुतल्प के समान पाप "
गुरुतल्पातिदेश ५०७