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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

४४ भूमिका
दाम्पत्य प्रेम का अभाव
दाम्पत्य प्रेम का भी यही हाल है कि पुरुष ने स्त्री को केवल
विषय भोग के ही लिये समझ रक्खा है इसलिये जैसा चाहिये स्त्री
पुरुष को वैसे दाम्पत्य प्रेम का आनन्द नहीं मिलता । इसी कारण
सन्तान भी रोगी निर्बल दुर्बल और कम आयुवाली होती है ।
दाम्पत्य प्रेम के विषय मे भी यहां वेद और शास्त्रो का मत
बतलाया जाता है । वेद मे परमात्मा आज्ञा देता हैः—
देवा अग्रे न्यपद्यन्त पत्नीः,
समस्पृशन्त तन्वस्तनूभिः ॥
सूर्येव नारि विश्वरूपा महित्वा,
प्रजावती पत्या संभवेह ॥
हे सौभाग्यवती स्त्री ! तू इस गृहाश्रम मे, प्रथम जैसे
विद्वान् लोग उत्तम स्त्रियों को प्राप्त होते है और शरीरों से शरीरो
को स्पर्श करते है वैसे विविध सुन्दर रूप को धारण करने वाली
सत्कार को प्राप्त होकर सूर्य की कान्ति के समान अपने स्वामी
के साथ मिलके उत्तम सन्तान उत्पन्न करने वाली हो ।
संपितरावृत्विये सृजेथां,
माता पिता च रेतसो भवाथः ।

दाम्पत्य प्रेम का अभाव ४५
मर्य इव योषमधिरोहयैनां,
प्रजां कृण्वाथामिह पुष्यतं रयिम् ॥
अर्थात्—हे स्त्री पुरुषो ! तुम बालकों के उत्पन्न करने वाले ऋतु
समय में सन्तानो को अच्छे प्रकार उत्पन्न करो। माता और पिता
दोनो वीर्य को मिलाकर गर्भाधान करने वाले हों। हे पुरुष !
इस अपनी स्त्री को प्राप्त होने वाले पति के समान सन्तानो मे
बढ़ो और दोनों इस गृहाश्रम मे प्रेम पूर्वक मिलकर सन्तान को
उत्पन्न करो और पालन पोषण करो तथा पुरुषार्थ से धन को
प्राप्त करो।
तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व,
यस्यां बीजं मनुष्या वपन्ति ।
या न ऊरू उशती विश्रयाति,
यस्यामुशन्तः प्रहरेम शेपः ॥
अर्थात्—हे वृद्धिकारक पुरुष ! जिसमे मनुष्य लोग वीर्य को
बोते हैं। जो हमारी कामना करती हुई ऊरु को विशेष सुन्दरता से
आश्रित करती है। जिसमे सन्तानो की कामना करते हुए हम
उपस्थेन्द्रिय का प्रहरण करते हैं उस अतिशय कल्याण करने
हारी स्त्री को सन्तान उत्पत्ति के लिये प्रेम से प्रेरणा कर।
हे स्त्री और पुरुष ! जैसे सूर्य सुन्दर प्रकाशयुक्त प्रभात वेला
मे प्राप्त होता है वैसे ही सुख से घरके मध्य मे सन्तान उत्पत्ति

४६ भूमिका

की क्रिया को अच्छे प्रकार जानने वाले, सदा हास्य और आनन्द
युक्त बड़े प्रेम से अत्यन्त प्रसन्न हुए उत्तम चाल चलनवाले, धर्मयुक्त
व्यवहार में अच्छे प्रकार चलने वाले, उत्तम पुत्र वाले, श्रेष्ठ
गृहादि सामग्री युक्त उत्तम प्रकार जीवों को धारण करते हुए गृह-
स्थाश्रम के व्यवहारों को पूर्ण करो।

इहेमाविन्द्र संनुद चक्रवाकेव दम्पती ।
प्रजयै नौ स्वस्तकौ विश्वमायुर्व्यश्नुताम् ॥

अर्थात्—हे इन्द्र ! परमैश्वर्य युक्तविद्वान् ! आप संसार मे इन
स्त्री पुरुषो को समय पर विवाह करने की आज्ञा दीजिये और ऐसी
व्यवस्था दीजिये कि जिससे ब्रह्मचर्य पूर्वक शिक्षा को पाकर दम्पति
(पति और पत्नी) चकवा चकवी के समान एक दूसरे से प्रेमवृद्ध
रहें अर्थात् प्रेम मे वधे रहे (एक दूसरे के विरुद्ध आचरण न करे)
और गर्भाधान विधि से उत्पन्न हुई सन्तान से ये दोनों सुखी
होकर सम्पूर्ण १०० वर्ष पर्यन्त आयु को पावे।

प्रबुध्यस्व सुबुधाबुध्यमाना,
दीर्घायुत्वाय शतशारदाय ।
गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो,
दीर्घ त आयुः सविता कृणोतु ॥

हे पत्नी ! तू (शतशारदाय) सौ वर्ष पर्यन्त दीर्घ काल जीने
के लिये उत्तम बुद्धि युक्त संज्ञान हो मेरे घर को प्राप्त हो और

दाम्पत्य प्रेम का अभाव ४७
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मुझ घर के स्वामी की स्त्री, जैसे तेरा दीर्घकाल पर्यन्त जीवन हो। वैसे
ही उत्तम ज्ञान और उत्तम व्यवहार को यथावत जान, अपनी
आशा को सब जगत् की उत्पत्ति और सम्पूर्ण ऐश्वर्य का देनेवाला
परमात्मा कृपा से सदा सिद्ध करे जिससे तू और मै सदा उन्नतिशील
होकर आनन्द में रहें।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः।
अन्यो अन्यमभिहर्यतवत्सं जातमिवाघ्न्या ॥
ईश्वर आज्ञा देता है—
हे गृहस्थो ! मै ईश्वर तुमको जैसी आज्ञा देता हूँ वैसा
ही करो जिससे तुमको अक्षय सुख हो अर्थात् जैसी अपने
लिये सुख की इच्छा करते और दुःख नहीं चाहते हो वैसे ही
पिता माता सन्तान स्त्री पुरुष दास मित्र पड़ोसी और अन्य सबसे
समान हृदय से रहो। मनसे सम्यक प्रसन्नता और वैर विरोधादि
रहित व्यवहार को तुम्हारे लिये स्थिर करता हूं।
जैसे उत्पन्न हुये बछड़े पर गाय प्रेम से वर्त्तती है वात्सल्य-
भाव रखती है तुम भी एक दूसरे से प्रेम पूर्वक कामना से वैसा
ही वर्त्ताव करो।
सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैवच।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥
हे गृहस्थो ! जिस कुल मे पत्नी से पति और पति से पत्नी

४८ भूमिका
सदा प्रसन्न रहते हैं उसी कुल मे निश्चित कल्याण होता है और
जिसमे दोनो परस्पर अप्रसन्न रहते हैं उस कुल मे नित्य कलह
वास करता है जैसा कि आजकल प्राय पति पत्नी मे कलह
रहा करती है।
यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत् ।
अप्रमोदात् पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्त्तते ॥
यदि स्त्री पुरुष पर रुचि न रक्खे या पुरुष को प्रसन्न न करे
तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर मे कामोत्पत्ति भली भांति न
हो के सन्तान नही होती और यदि होवे तो दुष्ट होती है ।
इसी प्रकार गर्भाधान क्रिया के समय पुरुष स्त्री को प्रसन्न
न करे तो स्त्री को उत्तेजना नही होती इसलिये गर्भ रहता ही
नही है ।
स्त्रियान्तु रोचमानायां सर्वतद्रोचते कुलम् ।
तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ मनु०
जो पुरुष स्त्री को प्रसन्न नही करता उस स्त्री के अप्रसन्न
रहने से सब कुल भर अप्रसन्न और शोकातुर रहता है और जब
पुरुष से स्त्री प्रसन्न रहती है तब सब कुल आनन्द रूप प्रसन्न
दिखलाई देता है ।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाक्रियाः ॥

वेद शास्त्रों की आज्ञा ४६
जिस घर मे नारियों की पूजा अर्थात् सत्कार होता है उस
कुल मे दिव्य गुण, दिव्य भोग और उत्तम सन्तान उत्पन्न होती
है और जिस कुल मे स्त्रियों की पूजा अर्थात् आदर सत्कार नहीं
होता उस कुल की सब क्रियाएं निष्फल होती है।
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशुतत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्द्धते तद्धिसर्वदा ॥
जिस कुल मे स्त्रियां अपने अपने पुरुषो के दुष्टाचरणों से वा
व्यभिचारादि दोषो से शोकातुर रहती है वह कुल शीघ्रही नाश
को प्राप्त होजाता है और जिस कुल मे स्त्रीजन पुरुषो के उत्तमा-
चरणों से प्रसन्न रहती हैं वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है।
यदि पुरुष श्रेष्ठ हो तो दुष्टा स्त्रियां भी सभल जाती हैं। शास्त्र
बतलाता है, ऋषियों का कहना है।
एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्ट प्रसूतयः ।
उत्कर्ष योषितः प्राप्ताः स्वैःस्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥
अर्थात्-इस संसार में दुष्टाचरण युक्त बहुत स्त्रियां अपने
अपने पतियों के शुभ गुणों से सुधर गई और सुधर जाती हैं तथा
सुधर जायंगी इसलिये यदि पुरुष श्रेष्ठ हो तो स्त्रियां श्रेष्ठ और पुरुष
दुष्ट हों तो स्त्रियां दुष्ट होजाती हैं। इससे प्रथम पुरुषो को उत्तम
होकर स्त्रियों को उत्तम बनाना चाहिये ।
४

५० भूमिका
प्रजनार्थं महाभागा पूजार्हा गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥
हे पुरुषो ! संतानोत्पत्ति के लिये महा भाग्योदय करने वाली
पूजा के योग्य गृहस्थाश्रम को प्रकाश मय करती हुई सतानोत्पत्ति
करने कराने वाली घरों मे स्त्रियां ही हैं। वे श्री अर्थात् लक्ष्मी स्वरूप
होती हैं । लक्ष्मी और स्त्रियों मे कुछ भी भेद नहीं है । क्योंकि
दोनो से ही घर की समान शोभा है ।
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्ग पितॄणामात्मनश्चहि ॥
इसका अर्थ यह है कि संतानोत्पत्ति, धर्म कार्य, उत्तम सेवा
और रति सुख आदि तथा अपना और पितरो का जितना सुख
है वह सब स्त्री ही के आधीन होता है ।
इसलिये अपनी शुभ कामना चाहने वाले तथा आरोग्य
दीर्घजीवी होकर उत्तम संतति की इच्छा रखने वाले और मनुष्य
जीवन का आनन्द तथा सुख चाहने वाले पुरुषो को हर प्रकार
से स्त्रियों को प्रेम पूर्वक रखकर प्रसन्न रखना चाहिये। केवल उन्हे
विषय भोग की सामिग्री समझ कर रतिक्रिया की ही मशीन न
समझनी चाहिये । अपनी आरोग्यता तथा स्त्री की आरोग्यता के
लिये, दोनो के दीर्घजीवन के लिये नियम पूर्वक रतिक्रिया कर
उत्तम संतान उत्पन्न करनी चाहिये । तभी जीवन का सच्चा सुख
और आनन्द प्राप्त होता है ।

सीता और रावण का सम्वाद ५१
सीता और रावण का सम्वाद
दाम्पत्य प्रेम के लिये आवश्यक है कि अपनी स्त्री के बिना
दूसरी स्त्री का सर्वदा त्याग रक्खे। वैसे ही स्त्री भी अपने विवा-
हित पुरुष को छोड़कर अन्य पुरुषों से सदैव पृथक रहे। परस्त्री
गमन से बड़े २ धीर वीर विद्वानों का भी तेज नष्ट हो जाता है
रावण को देखिए जब वह हत तेज होकर भिखारी के रूप में
सीता के सामने आया फिर जब उन्हें जबर्दस्ती उठाकर लेगया
और धमकाया तो सीता जी क्या उत्तर देती हैं:—
क्रोधातुर दशशीस, जानकी-निकट खडा हो,
डरता बोला किन्तु, प्रकट में बड़ा कड़ा हो।
सीते ! मुझको देख, तुझे डरना न चाहिये,
बनवासी के लिये, व्यर्थ मरना न चाहिये ॥
यद्यपि राक्षसों के लिये, कुछ भी नही अधर्म है,
तो भी तुझे प्रसन्न ही, रखना मेरा कर्म है।
सीते मुझको मान, तुझे भी मान मिलेगा,
अपमानित कर मुझे न, तेरा काम चलेगा ॥
भोग योग्य नृपसुते ! वृथा हठ योग न कर तू,
मुझे समझ निज दास, समझ लज्जा को धर तू।
कौन वस्तु है विश्व में, जिसे न ला दूंगा तुझे,
यदि निज लस्मित वदन को, क्षण भर दिखला दे मुझे ॥
मैं तेरा होचुका, और तू मेरी होगी,

५२ भूमिका
रावण हततेज होकर भिखारी के रूप में सीता के सामने आया।

B.K. Mitra
सतीत्वरक्षा ( रावण सीता संवाद ) । पृ० ७१ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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सीता और रावण का सम्बाद ५३
किसी भांति हे भीरु ! न इसमें देरी होगी ।
हो सकता है राम, न मेरे दास बराबर,
कर आहार-विहार, राम से चित्त हटाकर ॥
भारतेश मैं जनक को, तुरत बना दूंगा प्रिये !
और तुझे क्या चाहिये, आज्ञा दे उसके लिये ।
अल्प काल में नष्ट, नव वयस होजाती है,
बीत गई जो घडी, नहीं फिर वह आती है ॥
अपनी अनुपम देह, व्यर्थ मत मिट्टी कर तू,
छोड राम का ध्यान, प्रेम से मुझको वर तू ।
तेरी चेरी मयसुता, होगी सीते आज से,
क्यों उत्तर देती नहीं ? नाहक चुप है लाज से ॥
दशकन्धर के वचन, श्रवण कर सीता बोलीं,
किन्तु राम-पद से न, तनिक मति उसकी डोली ।
मुझसे मन को हटा, लगा उसको निज-जन में,
राजनीति को समझ, दशानन अपने मन में ॥
कभी भूलकर भूप को, अन्याय न करना चाहिये,
ध्यान-सहित निज धर्म को, मन में धरना चाहिये ।
क्यों गिरता है मूढ ! अन्ध हो अधर्म कूप में ?
व्यर्थ न कालिख लगा, स्वयं हो भूप रूप में ॥
छल करके, पर-वस्तु तुझे हरना न चाहिये,
निर्बल को बल-विवश, कभी करना न चाहिये ।

५४ भूमिका
अधर्म दृष्टि जिस भूप की, हुई अन्य के साथ में,
राज-दण्ड रहता नहीं, राक्षस ! उसके हाथ में ॥
जिसकी है जो वस्तु, उसे वह फिर मिलती है,
सदा किसी की नहीं, चालबाजी चलती है ।
शठ ! हठ मत कर कभी बड़ा धोखा खावेगा,
केवल तेरा अयश, जगत में रह जावेगा ॥
छल विहीन के साथ में, छल करना अन्याय है,
राक्षस अब भी संभल जा, सविनय मेरी राय है ।
पल में सब सम्पत्ति, नष्ट होती है खल की,
निर्बल दल की आह, नहीं होती है हलकी ॥
विमल चाल को छोड़, चाल तू मत चल छल की,
सुचाल तज मत पैठ, कोठरी में कज्जल की ।
भूतल पर अन्याय का, फल मिलता है शीघ्र ही,
कुशल नहीं है दीखता, तेरा, तू टल जा कहीं ॥
निर्गन्धा हो भूमि, धूम से हीन अनल हो,
स्पर्श रहित हो वही, रूप के सहित अनिल हो ।
रावण ! ये हो जायं, सभी अघटित घटनायें,
पर मन डिगता नहीं, सती का लोभ दिखाये ॥
चल यौवन ही नहीं, किन्तु जीवन भी चल है,
जिसको है यह ज्ञान, उसीका जन्म सफल है ॥
इसीलिये लंकेश, पतिव्रत मैं पालूंगी,

सीता और रावण को सम्बाद ५५
तेरे मुख पर राख, अयश की मैं डालूंगी।
टालूंगी जीती नहीं, निगसागम आदेश को,
देश वेश प्रतिकूल जो, धिक है उस सुख लेश को ॥
क्यों राक्षस ! क्या तुझे, काल ने आघेरा है ?
इसीलिये हित वाक्य, नहीं सुनता मेरा है ।
क्यो करके अन्याय, कलङ्कित तू होता है ?
शीघ्र चेत जा मोह, दिवस में क्यो सोता है ॥
पुरजन परिजन भी तुझे, क्यों समझाते हैं नहीं ?
क्या वे तेरे साथ में, दुख सुख पाते हैं नहीं।
साधु-वेश धर प्रथम, मुझे तूने फुसलाया,
वश मे करके अहो, भयङ्कर भय दिखलाया ॥
क्षत्रिय करसे छीन, मुझे क्यों दुख देना है !
निज प्रज्ञा से काम, नहीं क्यों तू लेता है।
मूढ ! किसी की एक सी, राज्यश्री रहती नहीं,
उत्पीड़क के भार को, मही सदा सहती नहीं ॥
मन में निज-गति देख, तनिक भी गर्व न कर तू,
हे राक्षस मत शलभ-तुल्य, उड करके मर तू।
शस्त्र सुसज्जित सभी, सुभट हैं तेरे तो क्या,
राज्य सैन्य से रहित, राम मेरे हैं तो क्या ॥
न्यायपरायण ईश वह, न्यायी जनके हाथ में,
विजय-जयन्ती को कभी, देगा ही रह साथ में।

५६ भूमिका
भारत की मैं पतिव्रता हू, सुन दशकन्धर !
नश्वर है जब देह, मृत्यु का फिर क्या है डर ॥
देश धर्म के लिये, निछावर जो होती हैं,
कीर्ति-बीज को विपुल, विश्व में वे बोती हैं।
शारीरिक सुख के लिये, धर्म न छोडूंगी कभी,
कुल मर्यादा से नहीं, मैं मुख मोडूंगी कभी ॥
पर तू अच्छी बात, कभी क्या सुन सकता है,
मुक्ता को क्या कभी, चकोर चुन सकता है।
पूर्व पुण्य सब क्षीण हुये, मानो अब तेरे,
सभी काम विपरीत, लगे होने अब तेरे ॥
रोवेगा तू नरक मे, खोवेगा निज-राज को,
ईश्वर रक्खेगा सदा, राक्षस ! मेरी लाज को ।
इस प्रकार पर स्त्री सती-सीता की इच्छा करने वाला रावण
मारा गया । सुग्रीव की स्त्री की इच्छा करने वाला बालि मारा
गया ।
कीचक वध
पाण्डवो को महारानी द्रौपदी के सहित अज्ञातवास के
समय जब राजा विराट् के यहां रहना पड़ा। उस समय महारानी
द्रौपदी राजा विराट् के यहां दासी बनकर रही । उन्हीं के यहां
युधिष्ठिर भीम अर्जुन नकुल सहदेव भिन्न २ पदों पर कार्य
करने लगे ।

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BK. Mitra
वाली के वियोग मे तारा विलाप ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

BK. Mitra
कीचक वध (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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कीचक वध ५७
रानी द्रौपदी रूप गुण में अद्वितीय थी कोई उनका सानी
न था। अपनी लावण्य रूपी प्रभु की इस अद्भुत देन को वे
कहां छिपी रख सकती थीं। उन्होंने अपना राजसी वेश छोड़ दिया
था, सब सुख सम्पत्ति पर लात मार दी थी परन्तु वे अपने रूप
को कैसे छिपा सकती थी या बदल सकती थी।
राजा विराट् की सेना का सेनापति था कीचक। वह बड़ा
वहादुर और रूपवान योद्धा था। तमाम राज्य पर उसकी धाक
जमी हुई थी। उसके भय से कोई चूं तक न करता था।
वलवान, वहादुर और रूपवान होते हुए भी कीचक में
एक जबर्दस्त अवगुण था। वह अवगुण था विषय वासना,
काम लोलुपता, परस्त्री गमन। जिस अवगुण के कारण उच्च
से उच्च पुरुष का पतन हो जाता है। जो अवगुण तमाम गुणों
को ले डूबता है। उसीमें कीचक की राक्षसी प्रवृत्ति थी।
अन्तःपुर में उसका आना जाना था। एक दिन मलिन-
वसना सती साध्वी द्रौपदी पर उसकी दृष्टि पड़ी। द्रौपदी को
देखते ही उस कामान्ध का मन चंचल हो उठा। उस दिन से
वह नित्य ही द्रौपदी के देखने की ताक भाक में रहने लगा।
धीरे धीरे उसकी नीचता बढ़ी। वह द्रौपदी से मुसकुरा मुसकुरा
कर बातें भी करने लगा। उस दुष्ट की दृष्टि उस पर गड़ गयी।
द्रौपदी नीचे को मुख किये हुए शुद्ध सरल निश्छल हृदय से
उसकी बातों का उत्तर दे दिया करती थी। वे उसको उसी
भाँति देखती थी जिस प्रकार कोई पुत्री अपने पिता को देखती है।