विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसीता और रावण का सम्बाद ५३
किसी भांति हे भीरु ! न इसमें देरी होगी ।
हो सकता है राम, न मेरे दास बराबर,
कर आहार-विहार, राम से चित्त हटाकर ॥
भारतेश मैं जनक को, तुरत बना दूंगा प्रिये !
और तुझे क्या चाहिये, आज्ञा दे उसके लिये ।
अल्प काल में नष्ट, नव वयस होजाती है,
बीत गई जो घडी, नहीं फिर वह आती है ॥
अपनी अनुपम देह, व्यर्थ मत मिट्टी कर तू,
छोड राम का ध्यान, प्रेम से मुझको वर तू ।
तेरी चेरी मयसुता, होगी सीते आज से,
क्यों उत्तर देती नहीं ? नाहक चुप है लाज से ॥
दशकन्धर के वचन, श्रवण कर सीता बोलीं,
किन्तु राम-पद से न, तनिक मति उसकी डोली ।
मुझसे मन को हटा, लगा उसको निज-जन में,
राजनीति को समझ, दशानन अपने मन में ॥
कभी भूलकर भूप को, अन्याय न करना चाहिये,
ध्यान-सहित निज धर्म को, मन में धरना चाहिये ।
क्यों गिरता है मूढ ! अन्ध हो अधर्म कूप में ?
व्यर्थ न कालिख लगा, स्वयं हो भूप रूप में ॥
छल करके, पर-वस्तु तुझे हरना न चाहिये,
निर्बल को बल-विवश, कभी करना न चाहिये ।