सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 704 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

५४ भूमिका
अधर्म दृष्टि जिस भूप की, हुई अन्य के साथ में,
राज-दण्ड रहता नहीं, राक्षस ! उसके हाथ में ॥
जिसकी है जो वस्तु, उसे वह फिर मिलती है,
सदा किसी की नहीं, चालबाजी चलती है ।
शठ ! हठ मत कर कभी बड़ा धोखा खावेगा,
केवल तेरा अयश, जगत में रह जावेगा ॥
छल विहीन के साथ में, छल करना अन्याय है,
राक्षस अब भी संभल जा, सविनय मेरी राय है ।
पल में सब सम्पत्ति, नष्ट होती है खल की,
निर्बल दल की आह, नहीं होती है हलकी ॥
विमल चाल को छोड़, चाल तू मत चल छल की,
सुचाल तज मत पैठ, कोठरी में कज्जल की ।
भूतल पर अन्याय का, फल मिलता है शीघ्र ही,
कुशल नहीं है दीखता, तेरा, तू टल जा कहीं ॥
निर्गन्धा हो भूमि, धूम से हीन अनल हो,
स्पर्श रहित हो वही, रूप के सहित अनिल हो ।
रावण ! ये हो जायं, सभी अघटित घटनायें,
पर मन डिगता नहीं, सती का लोभ दिखाये ॥
चल यौवन ही नहीं, किन्तु जीवन भी चल है,
जिसको है यह ज्ञान, उसीका जन्म सफल है ॥
इसीलिये लंकेश, पतिव्रत मैं पालूंगी,