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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

सीता और रावण को सम्बाद ५५
तेरे मुख पर राख, अयश की मैं डालूंगी।
टालूंगी जीती नहीं, निगसागम आदेश को,
देश वेश प्रतिकूल जो, धिक है उस सुख लेश को ॥
क्यों राक्षस ! क्या तुझे, काल ने आघेरा है ?
इसीलिये हित वाक्य, नहीं सुनता मेरा है ।
क्यो करके अन्याय, कलङ्कित तू होता है ?
शीघ्र चेत जा मोह, दिवस में क्यो सोता है ॥
पुरजन परिजन भी तुझे, क्यों समझाते हैं नहीं ?
क्या वे तेरे साथ में, दुख सुख पाते हैं नहीं।
साधु-वेश धर प्रथम, मुझे तूने फुसलाया,
वश मे करके अहो, भयङ्कर भय दिखलाया ॥
क्षत्रिय करसे छीन, मुझे क्यों दुख देना है !
निज प्रज्ञा से काम, नहीं क्यों तू लेता है।
मूढ ! किसी की एक सी, राज्यश्री रहती नहीं,
उत्पीड़क के भार को, मही सदा सहती नहीं ॥
मन में निज-गति देख, तनिक भी गर्व न कर तू,
हे राक्षस मत शलभ-तुल्य, उड करके मर तू।
शस्त्र सुसज्जित सभी, सुभट हैं तेरे तो क्या,
राज्य सैन्य से रहित, राम मेरे हैं तो क्या ॥
न्यायपरायण ईश वह, न्यायी जनके हाथ में,
विजय-जयन्ती को कभी, देगा ही रह साथ में।