विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४४५
अवस्था वाला हुआ, इस प्रकार यदि चौदह वर्ष की लड़की का
विवाह अठारह वर्ष के लड़के से होकर दो वर्ष बाद गौना किया
जावे तो आयुर्वेद के उन ऋषियो की राय ठीक मिल जावेगी
जिन्होने उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के लिये सोलह वर्ष की स्त्री
और बीस वर्ष का पुरुष योग्य बतलाया है। किसी की राय
मे २५ वर्ष का लड़का और १६ की लडकी, और किसी की राय
मे १६ की लड़की और बीस वर्ष का लड़का ठीक होता है।
जितने विवाह बड़ी लड़की और छोटा लड़का ऐसे हो गये
हैं उनके सुधार का तो कोई उपाय नही। सम्भव है मूर्ख
माता पिता को इस प्रकार के भयंकर परिणामो का पता न हो
क्योकि आज तक इस विषय की कोई पुस्तक नही बनी, न कोई
चर्चा ही इस विषय की है कि बेमेल विवाह का क्या परिणाम
होता है। मुझे तो इसका परिणाम इसलिये मालूम है कि मेरे
पास पचीस वर्षों मे लाखो स्त्रियां अनेक प्रकार के रोगों वाली
इलाज के लिये आईं। इनमें हजारों इस प्रकार के बेमेल विवाह
की भी थी जिनके पति की अवस्था पत्नी की अवस्था से बहुत
कम और बहुत सी ऐसी स्त्रियां आईं जिनके पति बुड्ढे और
स्त्रियां पन्द्रह, सोलह, अठारह, या बीस वर्ष की थी। ऐसे विवाह
बहुत हानिकारक हैं।
रतिक्रिया के योग्य स्त्री की अवस्था
स्त्री की गर्भाधान के योग्य अवस्था सोलह वर्ष की है
अर्थात् स्त्री सोलह वर्ष की अवस्था मे बालिग होती है
४४६ आनन्द सान्दर
और पुरुष वीस वर्ष की अवस्था मे वालिग होता है यह
शास्त्रकारो का मत है; परन्तु अव समय के अनुसार चौदह
वर्ष की स्त्री और अठारह वर्ष का पुरुष वालिग समझा
जाता है। यदि पति की अवस्था कम हुई और स्त्री की अधिक
तो वह प्रसंग ठीक नही कर सकता क्योंकि जव तक उसकी
अवस्था प्रसंग के योग्य होगी तव तक स्त्री की अवस्था और भी
अधिक हो जावेगी।
मेरे पास वनारस से एक स्त्री इलाज के लिये आई जिसकी
अवस्था २७ सत्ताईस दर्प की थी। उसे हिस्टीरिया (मूर्छा) रोग
था। देखने मे वह बहुत हृष्ट पुष्ट और सव प्रकार से आरोग्य
थी। साथ में उसकी सास आई थी। मैंने उसे देखते ही कहा तुम्हें
तो कोई रोग नहीं मालूम होता, तुम तो अच्छी खासी हो। तव
उसकी सास ने कहा कि मै इसे इसलिये लाई हूं कि विवाह हुए
तीन वर्ष हुए, अभी तक कोई वचा नहीं हुआ और न कभी गर्भ
ही रहा और इसे वेहोशी हो जाती है, सो इसे देखिये कि क्या
खरावी है मैंने उसकी नाड़ी देखी कोई रोग नहीं था। नाड़ी से
कोई रोग हो तो पता लगे तव मैं उसे एकान्त मे जहां स्त्रियो के
गुप्त रोगो की परीक्षा करती हू, ले गई। परीक्षा करने से भी किसी
प्रकार का कोई गुप्त रोग न पाया, तव मैने उस स्त्री से कहा
कि तुम्हें कोई रोग नहीं है; तुम यह वताओ और सव सच्चा हाल
कहो तुम्हारे पति मे तो कोई खरावी नही है। तुम तो निरोग हो
परन्तु तुम्हारे पति मे खरावी मालूम होती है। तव उस स्त्री ने
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४४७
लज्जित हो मुझसे कहा देवी जी आप ठीक कहती हैं, मेरे पति
किसी योग्य नहीं हैं। उनकी अवस्था पन्द्रह वर्ष की है, मेरी
अवस्था सत्ताईस वर्ष की है। तीन वर्ष विवाह को हुए, गौना
भी विवाह के साथ ही हुआ। कुछ दिनो तक तो सास ससुर ने
मेरे पास आने ही नहीं दिया। इधर डेढ़ वर्ष से पति मेरे पास
आते तो हैं किन्तु वे किसी योग्य नहीं हैं। मुझसे बोलते हैं परन्तु
मेरी इच्छा आज तक कभी नहीं हुई। मै यही नहीं जानती कि
स्त्री की इच्छा कैसे होती है। मेरे साथ की और स्त्रियां जब मुझे
मिलती हैं और इस विषय से बातचीत होती है, तब मुझे बड़ा
दु ख होता है। जब मै महीने से होती हूँ तब मेरी इच्छा कई
दिनों तक होती है, जब कभी पति से संभोग हुआ तब वे दो
चार मिनट मेरे पास रहे फिर सुस्त होकर सो रहते हैं। मै बेचैन
होजाती हूं। इसी शोक और चिन्ता से बेहोशी आ जाया करती
है। मेरा दस पांच दिन तक यही हाल रहता है।
जब प्रसंग होता है मुझे उस समय कुछ भी मालूम नहीं
होता केवल क्रोध और शोक ही से काम पड़ता है। इसी चिन्ता
का रोग है। जब इस विषय की अधिक चिन्ता करती हूं तभी
बेहोशी आजाया करती है। रात दिन बेचैन सी रहा करती हूं।
मेरे मूर्ख अन्धे मां बाप ने यह नहीं देखा कि जिसके साथ
लड़की का विवाह कर रहे हैं वह लड़की के जोड़ का तो हो।
यह कहकर वह स्त्री रोने लगी और मेरे सामने ही उसे
हिस्टीरिया का दौरा हुआ; उस समय मुझे उसके माता पिता और
४४८ आनन्द मन्दिर
सास ससुर दोनो पर बड़ा क्रोध आया । मैने उसकी सास को
बुलाकर पृछा तुम्हारे लड़के की अवस्था क्या है, जिसकी यह
बहू है। उसने कहा पन्द्रह सोलह वर्ष की होगी। मैंने कहा तुम
महामूर्ख हो, तुम्हारे पति भी बडे अज्ञान हैं, जो उतनी कम उम्र में
लड़के का विवाह कर दिया फिर भी उतनी ज्यादह उम्र की बहू से।
इसकी बीमारी का यही कारण है, उस पर भी तुम सन्तान
चाहती हो। तुमने अपने लड़के और दूसरे की लडकी, दोनों का
जीवन बरबाद किया ।
वह स्री बडी लजित हुई और कहने लगी देवी जी अब
तो कुछ उपाय बतलाओ । रिश्तेदारो ने मिलकर धोखा दिया,
लड़की की उम्र ठीक नही बतलाई । मैंने उस रोगी स्री से फिर
एकान्त मे जाकर पृछा तो मालूम हुआ कि दहेज मे अच्छी
रकम मिलने के कारण विवाह किया गया और इसी कारण
रिश्तेदार दलालो ने लडके के बाप को मेरी उम्र ठीक नहीं
बतलाई ।
जो माता पिता केवल रिश्तेदारों और नाई-पंडित आदि
की बातों मे आकर स्वय लड़की की अवस्था और आरोग्यता
नही देखते, अन्धे होकर विवाह कर डालते हैं वे बड़ी भारी
अज्ञानता करते है। इस प्रकार के मेरे पास हजारों उदाहरण
मौजूद हैं, क्योंकि इस प्रकार की लाखों स्रियां मेरे पास
आचुकी हैं, और उनके सब प्रकार के रोगों की चिकित्सा
मैंने की है।
सौत के लड़के को दुख देने का फल । पृ० ५०९ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४४६
छोटा पति बड़ी पत्नी
पत्नी की अवस्था अधिक और पति की कम होने से दोनो
का जीवन दुःखमय व्यतीत होता है, क्योंकि शास्त्रकारो ने
बतलाया है :-
बालेति गीयते नारी यावद्वर्षाणि षोडश ।
ततस्तु तरुणी ज्ञेया द्वात्रिंशद्वत्सरावधि ॥
तदूर्ध्वमधिरूढा स्यात्पंचाशद्वत्सरावधि ।
वृद्धा तत्परतोज्ञेया सुरतोत्सववर्जिता ॥
अर्थात्—सोलह वर्ष तक स्त्री बाला कहलाती है। इसके
बाद बत्तीस वर्ष की अवस्था तक तरुणी अर्थात् जवान रहती है
बत्तीस वर्ष के बाद पचास वर्ष तक प्रौढ़ा और पचास वर्ष के
बाद स्त्री वृद्धा हो जाती है। वृद्धा स्त्री सम्भोग के लिये वर्जित है।
वृद्धा के साथ प्रसग करने से आयु कम होतो है।
जिस स्त्री की अवस्था अट्ठाइस वर्ष की और पति की
चौदह वर्ष. की; जैसे कि अनेक जोड़े देखने मे आते हैं। इस
हिसाव से स्त्री की बाल अवस्था तो व्यतीत होगई। अब बत्तीस
वर्ष की अवस्था जब स्त्री की हुई अर्थात् बत्तीस वर्ष की अवस्था
तक स्त्री तरूण ( जवान ) रही किन्तु तब पति की अवस्था
अठारह वर्ष की हुई। देखिये अभी पति स्त्री प्रसग करने के योग्य
नहीं हुआ और स्त्री की जवानी भी बिदा होना चाहती है। स्त्री
२९
-like curve (notch)
- bottom curve
- vertical line
- that is unmistakably 'य'!
- Next letter:
- त with 'े' = ते.
Wait, is there really no 'व'?
Yes! The typesetter literally dropped the 'व'! It is printed as "प्रौढोद्भायते" or "प्रौढोद्भावयते"?
Wait, could it be "प्रौढोद्भावयते"? No, there is NO 'व'!
Wait, could it be "प्रौढोद्भायते"?
Wait, what if the word is:
"प्रौढोद्भायते" - wait, could "द्भायते" be read by an OCR as "प्रौढोद्भायते" or "प्रौढोद्भावयते"?
Wait, is that a 'व' fused with 'य'?
In some fonts, does 'व्य' exist?
Yes! 'व्य' has the circle of 'व' connected to 'य'!
Wait! LOOK AT 'व्य':
In 'सेव्यमाना' (L10):
Look at 'व्य' in 'सेव्यमाना':
It has 'व' loop connected to 'य'!
Now look at this letter:
Does it have 'व' connected to 'य'?
NO! In 'सेव्यमाना', 'व्य' has a round loop on the left, NOT the notch of 'य'!
In L11, the letter
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४५१
किसी योग्य न थे। जब स्त्री तरुणी हुई तब भी पति नावालिग ही
रहे। जब पति प्रसंग करने योग्य हुए तब तक पत्नी वृद्धा हुई फिर
बतलाये दोनो का जीवन व्यर्थ हुआ या नही। यह बात दूसरी है
कि लड़कपन से ही नावालिगी मे ही पति प्रसंग करना शुरू करदे
तो भी तो पति का जीवन रोगो का घर बन जाता है और पत्नी
भी प्रसंग के योग्य अवस्था होने पर, यदि पति ठीक न हुआ तो
रोगी और दुष्ट स्वभाव की होजाती है । इस प्रकार कुसमय प्रसंग
आरम्भ होने से पति पत्नी दोनो का जीवन वरवाद होता है ।
यह बात मै अपने पचीस वर्ष के अनुभव से हजारो ऐसी
स्त्रियो के रोगो की चिकित्सा करके तथा उनके शोक और चिन्ता
को देख सुनकर लिख रही हूं क्योंकि ऐसे स्त्री पुरुषो का जीवन
व्यर्थ जाता है और सन्तान भी नही होती । ऐसे कुटुम्ब वाले भी
दुःखित और चिन्तित रहते हैं और स्त्रियां भी प्रायः दुष्ट स्वभाव
की होजाती हैं ।
ऐसी स्त्रियो को यदि दुष्ट स्त्रियो की संगति मिलगई तो वे
कुल को कलंकित करती हैं और ऐसी स्त्रियों के पति भी
व्यभिचारी हो जाते हैं । फिर गरमी सुजाक आदि भयंकर रोगो
मे ग्रसित हो दुःखमय जीवन व्यतीत करते हैं अथवा जो कुसं-
गति से बचे रहे तो उदासीन रोगी निर्बल और दुर्बलता से
जीवन व्यतीत करते है। परन्तु पता लगाया जावे तो ऐसे पति कम
निकलेगे। स्त्रियां तो किसी प्रकार अपना जीवन पतिव्रत धर्म की
रक्षा कर काट भी लेती हैं किन्तु अनेक पति इसी कारण दूसरा विवाह
४५२ आनन्द मन्दिर
कर लेते हैं और स्त्रियां आत्मघात कर लेती हैं। इस प्रकार दोनों
का जीवन नष्ट होजाता है। यह उन अन्धे और मूर्ख माता पिता
का दोष है जो विना लडका लडकी का मेल मिलाये ही विवाह
कर देते हैं। ऐसे बेमेल विवाह वाली रोगी अनेक स्त्रियां मेरे
पास आया करती है और अपने छोटे पति की दुःखद कहानी
कहा करती है।
संभोग और निर्वलता
मेरे पास अनेक स्त्रियां ऐसी भी आईं जिनके पति बिलकुल
अनजान होते हैं। मूर्खतावश अथवा लालचवश माता पिता लड़के
मे कुछ भी नही देखते। केवल लड़के मे मर्द के चिन्ह हैं यही देख
कर विवाह करदेते हैं। लड़का बिलकुल अनजान और लड़की पूरी
स्त्री यानी सत्तरह अठारह वर्ष की होती है। विवाह की खुशी मे
लड़की तो फूली नही समाती। जब विवाह होकर पति से सामना
होता है तो कर्म पर हाथ रखकर रोती है और माता पिता को
क़ोसती है।
ऐसे माता पिता भी विवाह के बाद ही गौना करने को उत्स-
हित रहते हैं कि किसी तरह से पतोहू घर पर आवे इसलिये
गौना भी हठ करके उसी वक्त कराते हैं। घर पर आकर लड़के
की बहिन, भौजाई, चाची, ताई, और अड़ोस पड़ोस की स्त्रियां
सोहाग रात की जल्दी मचाती हैं और लड़के को किसी तरह से उस
कमरे मे जहां नई बहू है बन्द कर देती हैं। बन्द होने पर वह रोता
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४५३
भी है परन्तु उन मूर्खा खियो को तो उसी मे आनन्द आता है,
मानो उन्ही सब की सोहागरात हो रही है। बड़ी खुशी से गाना
बजाना खाना पीना होता है। उस गाने बजाने मे लड़के की
चिल्लाहट सुन कर भी कोई परवाह नही की जाती।
बहू तो पूरी अवस्था प्राप्त है और पतिजी अनजान है। संभोग
का नाम भी नही जानते पत्नी तो अपनी इच्छा पूरी करना चाहती
है, क्योंकि वह तो अनेक वार मासिकधर्म से होचुकी है; इसलिये
उसे सभोग की प्रबल इच्छा है। गर्भाधान के लिये उसकी
इन्द्रियां ऋतु होने पर सभोग के लिये उत्साहित हो चुकी हैं इस
लिये वह इसी दिन का रास्ता देख रही थी। वह तो अपनी इच्छा
पूरी करना चाहती है। परन्तु जब वह पति को इस काम में अन-
जान पाती है तो उस की सब इच्छाएं हृदय मे भस्म हो जाती है।
उसी दिन के लिये नही सदैव के लिये वह निराश हो जाती है।
वह किसी प्रकार उस छोटे से पति पर भी सन्तोष करके-यदि पति
का प्यार करना चाहती है तो पति उससे डरता है, दूर भागता है।
यदि पति इस छोटी अवस्था में कुसंगति मे पड़कर कुछ इस
विषय मे शिक्षा पा चुके होते हैं और उन्होने प्रसंग किया भी, तो
उससे उस युवती पत्नी की काम वासना की तृप्ति नही होती
वह यदि प्रतिदिन भी इस प्रकार प्रसग करता है तो भी पत्नी की
इच्छा पूत्ति न होकर और भी उत्तेजना बढकर व्याकुलता होती
है और पति जी दिन दिन निर्बल होते जाते हैं यहाँ तक कि
वीर्य-क्षीण होने से कुछ दिन बाद किसी काम के नही रहते।
१५४ आनन्द मन्दिर
ऐसी स्त्रियां अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित होजाती हैं
और चिड़चिड़े स्वभाव की होजाती हैं। हिस्टीरिया का दौरा होने
लगता है। असाध्य प्रदर रोग होजाता है। वे पागल होजाती हैं ।
हर समय क्रोध मे भरी रहती है उनका स्वभाव कलह करने का
होजाता है।
स्त्री हर प्रकार का कष्ट सहलेती है। आपत्ति का पहाड़ सिर
पर आगिरें तो उससे भी नही घवडाती, परन्तु ऋतु स्नाता स्त्री
को गर्भाधान क्रिया के समय यदि योग्य पति न मिले तो वह चित्त
मे वडी दुखी होती है यदि पति रोगी हो, मरगया हो कही विदेश
गया हो तो दुःख नही मानती। परन्तु छोटा हो अथवा वूढा
हो तो वड़ी दुःखी होती हैं। अपना जीवन ही व्यर्थ समझती हैं
अनेक सुशीला स्त्रिया इस दुःख के कारण माता पिता की
मुर्खता पर रो रो कर आत्महत्या कर बैठती हैं। अथवा कुलको
कलंकित कर विधर्मिणी होजाती हैं।
इस विषय मे यदि पता लगाइये तो हजारो उदाहरण ऐसे
मिलेगे कि इस प्रकार के अनमेल विवाहो से दुखी होकर कितनी
ही स्त्रियो ने आत्महत्या किया होगा।
मेरे पास अनेक स्त्रिया ऐसे विवाह वाली आई उन्ही से
ऊपर लिखे विषय का वास्तविक पता लगा है।
आनन्द
मन्दिर
सत्रहवां अध्याय
—:•:—
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४५७
बाबा का विवाह
बूढ़ों का विवाह भी बड़ा भयंकर है। इसका बहुत
बुरा परिणाम होता है। बूढ़े विवाह वाली स्त्रियां भी मेरे पास
अब तक हजारो ही आईं वृद्ध विवाह से स्त्री को जो कष्ट
और दुःख होता है उस दुःख और कष्ट की कहानी मैने अनेक
स्त्रियो की जबानी सुनी है, जो इलाज के लिये मेरे पास आया
करती हैं।
जो माता पिता अज्ञानतावश अथवा लालचवश या किसी
दबाव अथवा धनवान पुरुष को देखकर अपनी प्यारी कन्या
का विवाह बुड्ढों के साथ कर देते हैं, वे बड़ा भारी अधर्म्म,
अन्याय और अत्याचार करते हैं। शास्त्रकारो ने बतलाया है
कि कन्या को चाहे मरण पर्यन्त क्वारी रहने दे परन्तु बूढ़े
वर के साथ कभी विवाह न करे इसी प्रकार छोटे वर के
साथ न करे। बेचारी कन्या तो अबोध होती है प्रायः देखा
गया है कि बूढ़े बाबा धन का लालच दिखला कर दस ग्यारह वर्ष
की ही कन्या ढूंढ़ते है। कन्या तो दस ग्यारह अथवा बारह वर्ष
की होती है और पति जी उसके बाबा के समान पूरे खुरांट।
किसी २ के तो मुंह मे दांत तक नही होते। नकली दाँत और
बालो मे खिजाब लगाये, आखो मे नजर की कमजोरी से चश्मा
लगाये जब कि सभी इन्द्रियां कमजोर होजाती हैं ऐसी अवस्था
मे भी वे विवाह करने के लिये जवान बनने की कोशिश करते है।
४५८ आनन्द मन्दिर
ऐसे मूर्ख और अत्याचारी पुरुषो को आगे चलकर बड़ा कष्ट
भोगना पड़ता है और उनकी अन्तिम अवस्था बड़ी ही दुःखमय
कटती है। वे दुनियां मे मुह दिखलाने लायक नही रहते।
यदि स्त्री, दुष्ट पुरुषो अथवा दुष्ट स्त्रियो की संगति मे पडगई तो
स्त्री भी अनेक कष्टो से जीवन व्यतीत करती है और दोनो कुलो
को कलंकित करती है। जो अपने धर्म पर दृढ़ रहती हैं वे कितने
ही कष्ट मिले दुख को ही सुख समझकर जीवन व्यतीत करती
है। इस प्रकार माता पिता की अज्ञानता से बाल पति अथवा
वृद्ध पति जिन स्त्रियों को मिलता है उनका जीवन दुःखमय व्यतीत
होता है।
इस विषय मे भी मेरे पास सैकड़ो उदाहरण सच्चे मौजूद हैं।
मेरे पास बूढे पतियों की सैकड़ो ही स्त्रियां अनेक रोगों मे ग्रसित
इलाज के लिये आई। स्त्रियो और उनके पतियो को इस बात का
पता ही नही है कि स्त्री को रोग किस कारण से उत्पन्न हुए है।
जहां इलाज के लिये पतिजी स्त्री को लेजाते हैं उन चिकित्सको
को भी इस बात का अनुभव नहीं है कि बूढ़े पतिदेव ही इन
रोगो का कारण हैं। इलाज मे हजारो रुपया बरबाद करते है कुछ
लाभ नही होता।
चिकित्सको और लेडी डाक्टरो (स्त्री-चिकित्सक) को भी
इस बात का अनुभव नही है जो ठीक ठीक रोगों का कारण
समझ सके। इस विषय मे मै अपने अनुभव की कुछ रोगी
स्त्रियो का हाल लिखती हूँ, आशा है बूढे पति इन सच्चे उदाहरणो
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४५६
को पढ़ कर इसे भलीभांति समझेंगे और उस पर विचार करेंगे
तथा दूसरों को भी उपदेश करेंगे जिससे अन्य मूर्ख कामान्ध बूढ़े
यदि आगे को अपना जीवन सुखमय बनाना चाहें तो बुढ़ापे में
कदापि विवाह न करें ।
कई वर्ष व्यतीत हुए एक सेठ जी ने अपनी स्त्री को मेरे
पास इलाज के लिये भेजा। उस स्त्री की अवस्था अठारह वर्ष की
थी, उसे हिस्टीरिया, पागलपन हृदय की धड़कन और सिरकी
पीड़ा आदि रोग थे । जब वह मेरे पास आई उसकी माता साथ
में थी । मैंने उसे देखा, वह बडी हृष्ट पुष्ट स्त्री थी । उसे कोई
बीमारी की शिकायत देखने मे नही थी मैं उसे रोगी स्त्रियो के
देखने वाले कमरे में उसकी माता से अलग लेगई। मैंने उसकी सब
प्रकार से परीक्षा की । किसी प्रकार का गुप्त रोग भी नही था ।
तब मैंने उससे उसके पति की अवस्था पूछी पति की अवस्था
पूँछते ही उदास हो, नीचे को सिर करके बोली पचपन 'इतना
कहते ही उसे हिस्टीरिया का दौरा हुआ। मैने उसकी हालत देखी
वास्तव मे उसे इस समय बडा ही कष्ट था मैं उस स्त्री को उठवा
कर दूसरे कमरे मे लेगई और पलंग पर लिटाकर हिस्टीरिया शांत
करने के उपाय करके ठीक किया । मैंने उसकी माता को अलग
करके एकान्त मे उससे पूछा कि पति की अवस्था पूछने ही तुम
उदास क्यो हो गई, सच्चा हाल बतलाओ ।
उसने कहा—देवी जी ! क्या कहूँ, बडी लज्जा और दुःखकी बात
है । मेरे मूर्ख माता पिता ने कुछ देखा नही केवल धन देखकर
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४६० आनन्द मन्दिर
विवाह कर दिया इसी से मेरी यह दशा है । जब उनकी सूरत
देखती हूँ, तभी मुझे इतना दुःख होता है जो कह नही सकती ।
जब वे मेरे पास आते हैं। तब मेरे दिमाग मे पागलपन सा हो
जाता है और कई दिन तक शिर घूमता है । शरीर व्याकुल
रहता है। लगभग पांच वर्ष विवाह को हुए। आज तक मैंने विवाह
का सुख नही जाना। जब बहुत व्याकुल होजाती हूँ तब बीमारी
का बहाना करके पिता के यहा चली जाती हूँ । ससुराल मे मुझे
किसी प्रकार का कष्ट नही है धन की कमी नही है सभी सुख
हैं परन्तु विवाह का कोई सुख नही है मैंने आपका नाम बहुत
दिनो से सुन रक्खा था इसलिये आपसे अपने दुःख की कहानी
सुनाने के लिये इलाज के बहाने से माता को लेकर आई हू ।
अगर कोई उपाय मेरे उद्धार का हो सके तो कीजिये नही तो मेरा
जीवन रो रो कर ही व्यतीत होगा इस दशा में मैं जीवित नहीं
रहना चाहती ।
मैंने उस स्त्री की यह कष्ट कहानी सुनकर उसकी माता को
पास बुलाकर कहा—तुम लोग कैसे अन्धे हो जो बूढ़े से विवाह
कर दिया कैसी सुन्दर लड़की है तुम्हे इसके ऊपर दया नहीं
आयी ? तब उसने कहा कि लड़की को कमी किस बात की है,
धनवान् देखकर हम लोगो ने शादी की थी ।
मैंने उसकी माता से साफ २ कह दिया कि इसका पति बूढ़ा
है, इसी कारण यह सब बीमारियां हुई हैं। तुम लोग इस बात
को नहीं समझ सकते। तुम्हीं क्या बहुत से मूर्ख माता पिता इस
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६१
बात का ख्याल नहीं करते। धन के लालच मे विवाह कर देते हैं।
वर की अवस्था का ख्याल नहीं करते, फिर पीछे पछताते हैं ।
मैंने उस स्त्री के कहने के अनुसार जैसा कि उसने अपने
पति की शिकायते बतलाई थीं निश्चय करने के लिये उसके पति
के पास अपने औषधालय का रोगी फार्म भेजा वह रोगी
स्त्री और उसकी माता मेरे औषधालय के रोगी आश्रम मे ठहरी
रहीं । एक सप्ताह में जब उसके पति का रोगी फार्म भरकर आया
उसे देखने से पता लगा कि उसके पति को विवाह होने के दो
तीन वर्ष पहिले ही से अनेक रोग थे। शीघ्रपात और स्वप्रदोष तथा
शिथिलता आदि ने अपना पूरा प्रभाव जमा लिया था । उस
बूढे की बड़ी भारी मूर्खता थी जो उसने फिर से विवाह किया ।
वह स्त्री के बिलकुल काम का नहीं था क्योकि उसने अपना भी
इलाज कराने की इच्छा से अपना पूरा हाल लिख दिया था ।
इन्हीं कारणों से उसकी पहिली स्त्री के भी कभी गर्भ नहीं रहा था।
वृद्ध विवाह के भेद
वृद्ध विवाह कई प्रकार के होते हैं:—
१—वृद्ध पुरुष वास्तव मे सन्तान की इच्छा से विवाह
करते हैं । धनवान होने के कारण लोग उन्हे समझाते हैं कि यह
धन क्या होगा इसे कौन लेगा इसलिये विवाह अवश्य करो।
वे इन चापलूसों के समझाने पर इच्छा न होते हुए भी विवाह
कर लेते हैं, परन्तु शक्ति न होने से फिर भी सन्तान नहीं
? Yes, sometimes 'ज्यादा' is colloquially written or printed as 'ज्याद' or 'ज्याद्'. Here it looks like "ज्याद्".
कोई कोई बूढे केवल ऊपरी सेवा के लिये विवाह करते हैं ।
"बूढे": बूढे (or बूढ़े? It looks like बूढे without nukta, or with nukta? It's 'बूढे').
उन्हे बहकाने वाले कहते हैं कि बुढ़ापे मे अपनी ही स्त्री
"उन्हे": no bindi.
"मे": no bindi.
सेवा कर सकती है दूसरा नही कर सकता । इसलिये वे केवल
"नही": no bindi.
सेवा के ही लिये विवाह करते हैं । परन्तु उस सेवा का फल
"परन्तु": परन्तु.
बहुत बुरा होता है । उनसे केवल स्त्री से सेवा लेने का ही काम
हो सकता है विवाह का कुछ भी सुख नही मिलता । बुढ़े पति
"बुढ़े": with nukta or without? Looks like बुढ़े.
की स्त्रिया दुष्टो की संगति मे पड़कर दुष्ट स्वभाव की हो जाती है
"स्त्रिया": no bindi.
"दुष्टो": no bindi.
"मे": no bindi.
"जाती है": no bindi on है.
क्योकि पति शक्ति-हीन होते हैं ।
"क्योकि": no bindi.
"शक्ति-हीन