विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
को अपने हाथ से नष्ट करते हैं उसे हस्तमैथुन कहते हैं। आगे
चलकर जवानी मे उन्हें २० बीस प्रकार के प्रमेहों में कोई सा प्रमेह
उत्पन्न होता है। प्रमेह वीर्य सम्बन्धी बडे भारी रोगो मे एक रोग
है। वैद्यक शास्त्र बतलाता है कि प्रमेह रोग स्वभाव से ही महादुष्ट
रोगी है। इस कारण इसका इलाज बडी सावधानी से करना
चाहिये। प्रमेह रोग मे पुरुष की जान मे प्रकट रूप मे कोई विशेष
कष्ट तो शुरू मे होता नही क्योंकि स्वप्न मे वीर्य निकल जाने से
कोई तकलीफ मालूम नही होती, पाखाना फिरते समय जोर
करने मे धातु निकलना कुछ भी दुखदाई नही प्रतीत होता,
पेशाब के साथ धातु जाने मे भी कुछ दिक्कत नहीं होती। संभोग
के समय शीघ्रपात होना इत्यादि किसी प्रकार के धातु विकार
मे कुछ तकलीफ मालूम न होने से रोगी पुरुष कुछ भी परवाह
नही करते और कुछ चिन्ता भी नही रहती। दुनियां के सभी काम
रोते भीकते गिरते पडते चले ही जाते हैं।
रोग बढ़ते बढ़ते जब अधिक बढ़ जाता है और शरीर आल सी
और असमर्थ होता मालूम होने लगता है तब कुछ २ चिन्ता होती
है सो भी ऐसी नही कि लगाकर औषधि हो जिससे रोग दूर होजावे।
प्रमेह मौजूद है और सहवास मे कमी न होने पावे यह विचार
सदैव बना रहता है। औषधि मगाया करते हैं सो भी प्रमेह की
नहीं, शीघ्रपात की। जिससे स्त्री प्रसन्न रहे। वे लोग महामूर्ख हैं
जो प्रमेह रोगो को सरल समझ कर परवाह नही करते वे अपने
पैरो मे आप कुल्हाड़ी मारते हैं। सन्तान भी वैसी ही होती है।
॥ ३
त्र
मू
ग
रो
य
न
क
व
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५१०
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आनन्द
मन्दिर
दसवां अध्याय
-:०:-
१८
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विवाह विज्ञान-काम
नपुंसकों की संभोग ~~~~~~~~~
आसेक्यश्च सुगंधीच कुम्भीकरश्चैष्य- कृत्य
सरेतसस्त्वमीज्ञेया अशुक्रःषंडसंज्ञितः ॥
अर्थात्—आसेक्य, सुगन्धि, कुम्भिक, और ईर्ष्यक, इन चारों
नपुंसकों में तो उत्तेजनात्मक वीर्य होता है परन्तु स्त्री की सी चेष्टा
वाले नपुंसक में नहीं होता । इसका कारण यह है कि:—
अनयाविप्रकृत्यातु तेषांशुवहा शिराः ।
हर्षात्स्फुटत्वमायान्ति ध्वजोच्छ्रायस्ततो भवेत् ॥
अर्थात्—पहिले कहे हुए चार नपुंसकों में वास्तव में तो वीर्य नहीं
है परन्तु उनकी विरुद्ध चेष्टा (वीर्य भक्षण योनि और पुरुष इन्द्री
का सूंघना, गुदा मैथुन और दूसरे को मैथुन करते देखना )
इन कारणों से वीर्य न रहते हुए भी वीर्य वाली नाड़ियां हर्षयुक्त
होकर फूल जाती हैं उसी से उन नपुंसकों की इन्द्री में चैतन्यता
उत्पन्न होजाती है ।
इसप्रकार की स्त्रियां नपुंसक भी देखी जाती हैं । मेरे पास
इलाज के लिये सभी प्रकार की रोगी स्त्रियां आया करती हैं और
२५ पचीस वर्षों में मैं लाखों स्त्रियो का इलाज कर चुकी हूं इनमे
सभी प्रकार के रोगों वाली स्त्रिया देखी गई । जो स्त्रिया मेरे पास
इलाज के लिये आती हैं वे अपना सभी प्रकार का हाल खुलासा कह
नन्द मन्दिर
नासा हाल के उनकी चिकित्सा ठीक नहीं
चिट्टियां भी प्रतिदिन पचासो आया करती हैं ।
उने चिट्ठियों मे भी अपने रोग का खुलासा हाल रोगी स्त्रिया लिख
दिया करती है जो हाल रह जाता है मैं पत्र द्वारा पूछलेती हू ।
स्त्री पुरुषो की सब रोग सम्बन्धी चिट्ठियां गुप्त रक्खी जाती हे
मेरे सिवाय दूसरा कोई नहीं देख सकता इसलिये कोई रोगी स्त्री
पुरुष मुझे अपने रोग का खुलासा हाल लिखने में संकोच नहीं
करता ।
रागी स्त्रियो की जबानी हाल (सुनने, उनके पत्रों से जानने
तथा स्त्रियो की परीक्षा करने से आयुर्वेद में लिखे उपर्युक्त लक्षणो
को मैने बिलकुल सच पाया है इसीलिये अनुभव में आये हुये
लक्षणों को सबको मालूम करने के लिये लिख रही हू ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७५
पुरुषार्थ हीनता या नपुंसकत्व
अब मैं यहां पर सब प्रकार के नपुंसकों का वर्णन विस्तार
करती हूं क्योकि जितने नपुंसक हैं सब माता पिता की
मूर्खता से ही विपरीत रति करने से उत्पन्न होते हैं। इन्हीं सब
नपुंसको से पाठक आसनों का फल समझ ले।
नपुंसक पुरुष के लक्षण
वैद्यक शास्त्र बतलता है कि:—
संकल्प प्रवणो नित्यं प्रियां वश्यामथापि वा ।
न याति लिंग शैथिल्यात्कदाचिद्याति वा यदि ॥
अर्थ यह है कि पुरुष स्त्री प्रसग करने की इच्छा तो मन
में सदैव करे परन्तु अपनी स्त्री से भी प्रसग न कर सके इन्द्री
की कमजोरी के कारण स्त्री के पास जाते भी डरे। यदि किसी
प्रकार प्रसग करे भी तो शीघ्रही उस पुरुष का श्वास फूलने लगे
और शरीर मे पसीना आने लगे। इन्द्री मे ठीक ठीक उत्तेजना न
हो। इसप्रकार वह पुरुष लज्जित होकर बड़ा दुःखी हो और उस
बिचारे के विचार मन के मन मे ही रह जावे। यह साधारण
नपुंसको के लक्षण हैं।
जिन पुरुषो मे ये लक्षण पाये जावे उन्हे नपुंसक समझ
लेना चाहिये चाहे वे जन्म से हों अथवा किन्ही कारणो से पैदा
होगये हो।
२७६ आनन्द मन्दिर
नपुंसकता के विशेष कारण
ध्वजभंगस्य चोत्पत्तिं लक्षणं शृणु विस्तरात् ।
अत्यम्ललवणाक्षार विरुद्धाजीर्ण भोजनात् ॥
जो पुरुष नियम पूर्वक आहार विहार नहीं करते, खटाई नमक
तथा क्षार पदार्थों का अधिक सेवन करते हैं और विरुद्ध भोजन
करते हैं वे कुछ दिनों मे नपुसक हो जाते हैं ।
अत्यंबुपानाद्विषमपिष्टान्नगुरु भोजनात् ।
दधिक्षीरानूपमांससेवनादतिकर्षणात् ॥
जो पुरुष भली भांति विधि पूर्वक न पकाया गया अन्न भक्षण
करते हैं, जो पानी अधिक पिया करते हैं और जो गरिष्ट (पिट्ठी
आदि के ) भारी पदार्थ तथा दही दूध और अनूप सचारी जीवो
का मास सेवन करते हैं इन कारणों सेवे भी कुछ दिनों मे नपुसक
हो जाते हैं ।
कन्यायां चैव गमनादयोनिगमनादपि ।
दीर्घरोमणीं चिरोत्सृष्टां तथैव च रजस्वलाम् ॥
इसका अर्थ यह होता है कि जो पुरुष बारह वर्ष से कम
आयु वाली स्त्री से प्रसंग करते हैं अथवा जो प्राकृतिक नियम के
विरुद्ध अयोनि मैथुन (हस्त मैथुन, लड़कों के साथ दुष्ट कर्मआदि)
करते हैं तथा जिस स्त्री के गुप्त स्थान में बहुत बड़े बड़े बाल हों
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७७
जिसका रज स्खलित होने मे बहुत देरी लगे और जो ऋतु से
हुई हो ऐसी स्त्री से प्रसंग करते हैं वे पुरुष कुछ दिनो मे नपुसक
हो जाते हैं ।
दुर्गंधां दुष्टयोनिं च तथैव च परिश्रुताम् ।
नरस्य प्रमदां मोहादतिहर्षात्प्रगच्छत ॥
वैद्यकशास्त्र बतलाता है कि जो पुरुष ऐसी स्त्री से प्रसंग करता
है जिसकी योनि से दुर्गंधि आती हो । जिस स्त्री के गरमी, सुजाक
रज विकार अथवा प्रदर सोमरोग हो ऐसी स्त्री से गमन करता है
अथवा जिसकी योनि किसी भी रोग से दूषित हो गीली रहती हो
या नियम के विरुद्ध कुआसन उलटे सीधे हो मूर्खता से नियम
विरुद्ध मैथुन करता है वह पुरुष भी नपुंसक हो जाता है ।
चतुष्पदाभिगमनाच्छ्लेफसरचाभिघाततः !
अधावनाद्वा मेढ्रस्य शस्त्रादंत नख क्षतात् ॥
इसका अर्थ यह होता है कि जो अज्ञानी मूर्ख पुरुष पशुओं
के साथ प्रसंग करता है वह शीघ्र ही कुछ दिनो मे नपुसक हो जाता
है और जिसकी इन्द्री मे चोट लगी हो, जो इन्द्री को साफ नहीं
करता, जिसकी इन्द्री मे किसी कारण से शस्त्र लगा हो, नाखून
लगकर घाव हो जाने से और अत्यन्त प्रसंग करने से वीर्य
नष्ट होकर इन्द्री की नसें कमजोर होगई हो वह पुरुष नपुसक
होजाता है ।
चतुर्थ खण्ड: दाम्पत्य कलह-निवारण, प्रेम-संवर्धन एवं गृहस्थ सुख
२७८ आनन्द मन्दिर
वृद्धावस्था की नपुंसकता
जघन्यमध्यप्रवरं वयस्त्रिविध मुच्यते ।
अथ च प्रवरे शुक्रं प्रायशः क्षीयते नृणाम् ॥
वृद्धावस्था मे मनुष्यों का वीर्य क्षीण हो जाता है। मनुष्य की
अवस्था तीन प्रकार की है बुढ़ापे में वीर्य क्षीण होने से मनुष्य
नपुसक हो जाता है ।
रसादीनां संक्षयाच्च तथैवावृष्य सेवनात् ।
बलवर्णेन्द्रियाणां च क्रमेणैव परिक्षयात् ॥
बुढापे में पुरुष के शरीर मे रक्त मांस बल वीर्य बनाने वाले
जो रसादि हैं उनके क्षय होने से तथा जो पुरुष रसादिको को
अधिक बनाने वाले, जिनसे बल वीर्य की वृद्धि और पुष्टि होती है
ऐसे पदार्थों का सेवन नहीं करता अथवा उसे ये पदार्थ खाने को
मिलते ही नही परन्तु विषय वासना में लिप्त रहता है, प्रसग
करने मे जिसने कमी नही की उसके क्रमशः बल वीर्य वर्ण और
इन्द्रियों के क्षीण होने से तथा परिश्रम करते रहने और बलवर्द्धक
पदार्थ खाने को न मिलने से वह मनुष्य बुढापा आते ही शीघ्र ही
नपुँसक होजाता है। फिर बुढ़ापे मे वह अत्यन्त दुर्बल तनक्षीण
बलहीन हो जाता है, शरीर की दशा पलट जाती है, उसे रोग
शीघ्रही घेर लेते हैं। यह बुढ़ापे की नपुसकता है ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७६
चिंता क्रोध और शोक से नपुंसकता
अतिप्रचिंतनाश्चैव शोकात्क्रोधाद्भयादपि ।
ईर्ष्यात्कंठात्तथोद्वेगात्समा विंसतिको नरः ॥
जिनको अत्यन्त चिंता हर समय लगी रहती है, जिनको
क्रोध अधिक आता है, जिनको भारी शोक मे पड़ना पड़ता है, जो
किसी कारण से हृदय में भयभीत रहते हैं और जो पराई ईर्षा
में ही लगे रहते हैं इन कारणों से वे पुरुष भी कुछ दिनो मे
नपुसक होजाते हैं ।
अन्य कारणों से नपुंसकता
वाल्यावस्था से वीर्य के नष्ट करने से जवानी में वेश्याग-
मन से, हस्त मैथुन से, निर्वलता की दशा में अधिक उपवास करने
से, कम खाने से और समय कुसमय खाने से, समय कुसमय प्रसंग
से शरीर के वल वीर्य नष्ट होकर मनुष्य को कुछ दिनों मे नपुसक
वना देते हैं ।
ऊपर लिखे कारणों से तो अच्छे पुरुष जिनके शरीर मे पूर्व
से नपुंसकता का कोई लक्षण नही होता है, अपनी ही अनियमित
क्रियाओ से नपुंसक हो जाते हैं। दूसरे नपुंसक वे होते हैं जो
माता पिता के दोष से जन्म से ही नपुसक पैदा होते हैं । ऐसे
नपुंसकों के विषय में आगे लिखा जाता है जो कई प्रकार के
२८० आनन्द मन्दिर
होते हैं। जिस प्रकार पुरुप नपुसक होते हैं इसी प्रकार स्त्री भी
नपुसक होती हैं उनका वर्णन भी इस अध्याय मे आगे किया।
जायगा।
नपुंसक होने का कारण
अतएवचशुक्रस्य बाहुल्याज्जायते पुमान् ।
रक्तस्यस्त्रीतयोः साम्ये क्लीवःस्यात् ॥
अर्थात्—पीछे कहे हुए कारणो से अर्थात् पुरुप का वीर्य
अधिक होने से पुत्र और स्त्री का रज अविक होने से कन्या गर्भ में
आती है और स्त्री पुरुप दोनो का रज वीर्य वरावर होने से
नपुसक सन्तान उत्पन्न होती है।
आरोग्य और बलिष्ट सन्तान
स्त्रीपुंसयोस्तुसंयोगेयद्यादौविसृजेत्पुमान् ।
शुक्रं ततः पुमान्वीरोजायते बलवान् दृढः ॥
अथचेद्बनितापूर्वं विसृजेद्रक्तसंयुतम् ।
ततोरूपान्विता कन्या जायते दृढसंहता ॥
अर्थात्—स्त्री पुरुप के सयोग में यदि प्रथम पुरुप का वीर्य
स्व
प्रेम-हार
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २८१
समय गर्भ रहे तो हृष्ट पुष्ट और बलिष्ठ रूपवती कन्या गर्भ
में आवेगी ।
यह वात मैं पीछे लिख चुकी हूं कि कामशास्त्र वैद्यकशास्त्र का
ही एक अङ्ग है उसका तात्पर्य यह कदापि नहीं हो सकता कि
निर्बल दुर्बल हीनाङ्ग और नपुंसक सन्तान होने का साधन वतलावे ।
यह विषयी लोगो ने अपने आनन्द के लिये वना लिया है ।
नपुंसकों की उत्पत्ति
पित्रो रत्यल्पवीर्य्यत्वादासेव्याःपुरुषो भवेत् ।
सशुक्रंप्राश्यलभतेध्वजोच्छ्रायमसंशयम् ॥
इसका अर्थ यह है जिन दम्पतियो का अधिक प्रसंग के
कारण रज वीर्य क्षीण होगया है ऐसे अत्यन्त क्षीण वीर्य वाले
माता पिता के संयोग से जो गर्भ रहता है उससे आसेव्य नामक
नपुंसक उत्पन्न होता है ।
आसेव्य नपुंसक
पुरुष सभोग करने की शक्ति नहीं रखता जव वह अपने
मुख मे दूसरे के मैथुन करने से स्खलित वीर्य को भक्षण करे
तव उसकी इच्छा सम्भोग करने की होती है अर्थात् उसे उत्तेजना
उत्पन्न होती है ऐसा आयुर्वेद का मत है ।
आसेव्य नपुंसक जव तक किसी वलवान पुरुष से अपने
मुख में मैथुन न करावे और उसका स्खलित वीर्य भक्षण न करे
१८२ आनन्द मन्दिर
तब तक इस नपुसक पुरुष की इन्द्रि स्त्री प्रसग करने योग्य नही
होती। इस नपुसक का इसी कारण दूसरा नाम मुख योनि कहा है।
पाठको ? देखा आपने, कैसी घृणा की बात है, कैसे दुःख
की बात है। ऐसा कौन मूर्ख पुरुष होगा जो ऐसी सन्तान उत्पन्न
करना चाहेगा इसलिये सबको ध्यान रखना चाहिये कि जब
तक पति पत्नी का रज वीर्य ठीक न हो, किसी प्रकार की खराबी
हो, तब तक गर्भाधान क्रिया अर्थात् स्त्री प्रसग नही करना चाहिये।
जो स्त्री पुरुष नियम विरुद्ध सभोग करके रज वीर्य से क्षीण
होगये हैं उन्हे ब्रह्मचर्य का पालन करके इस पुस्तक मे लिखे
अनुसार औषधियो का सेवन करके रजवीर्य को शुद्ध करके तब
सभोग करना चाहिये ।
सौगंधिक नपुंसक
यः पूतियोनौजायेत स सौगंधिक संज्ञितः ।
सयोनिशेफसोगन्धमाघ्रायलभते बलम् ॥
इसका अर्थ यह है कि जिस स्त्री की योनि मे दुर्गंधि आती
हो उसके सभोग से जो गर्भ रहकर पुत्र उत्पन्न होता है वह
सौगंधिक नपुसक कहलाता है, यह नपुसक पुरुष जब स्त्री की
योनि और पुरुष की इन्द्री को सूघे तब उसकी इन्द्री चैतन्य
होती है उत्तेजित होती है । इस नपुसक का दूसरा नाम नाशा
योनि कहा है।
विवाह विज्ञान-कामशाला २८३
कुम्भिक नपुंसक
अरजस्का यदानारी श्लेष्मरेताव्रजेद्ऋतौ ।
अन्यासक्ताभवेत्प्रीतिर्जायतेकुम्भिलस्तदा ॥
इसका अर्थ यह है कि अल्प रज वाली अर्थात् जिस स्त्री
का रज अधिक प्रसंग के कारण कम हो गया है, निर्बल हो गया
है, अथवा रज क्षीण होगया है, ऐसी स्त्री का पति भी शिथिल
वीर्य वाला हो और सम्भोग करे उस समय स्त्री की सम्भोग से
इच्छा पूरी न हो (क्योंकि शिथिल वीर्य वाला पुरुष स्त्री की शान्ति
नहीं कर सकता इसलिये उस स्त्री की इच्छा अन्य पुरुष से संभोग
कराने की बनी रहती है) और गर्भ रहजावे तो कुम्भिक नपुंसक
उत्पन्न होता है ।
दूसरा कारण
मातुर्व्यवायप्रति मेन चक्री-
स्याद्बीजदौर्बल्यतयापितुश्च ॥
स्त्री के विपरीत मैथुन करने से अर्थात् पुरुष स्त्री के नीचे
होकर स्त्री को अपने ऊपर करके स्त्री से संभोग करावे यह विपरीत
संभोग कहलाता है ।
इस प्रकार विपरीत संभोग
३८४ आनन्द मन्दिर
से नाना प्रकार के प्रमेह स्वप्नदोष शीघ्रपात आदि रोग हैं। ऐसे
निर्बल वीर्य के द्वारा विपरीत रति से गर्भ रहने पर भी कुम्भिक
नपुंसक उत्पन्न होता है ।
स्वेगुदे ऽब्रह्मचर्याद्यःस्त्रीपुपुंवत्प्रवर्तते,
कुम्भिकः सतुविज्ञेयः ॥
कुम्भिक नपुंसक सम्भोग नहीं कर सकता जब वह पुरुष
किसी पुरुष से अपनी गुदा मे मैथुन करावे तब उसकी इन्द्री में
चैतन्यता आवे तब वह पुरुष के समान स्त्री के साथ प्रसंग कर
सकता है । ये कुम्भिक नपुंसक के लक्षण हैं ।
ईर्ष्यक नपुंसक
ईर्ष्याभितापावपिमन्दहर्षा-
दीर्ष्याह्वयस्यापिवदन्तिहेतुम् ॥
सम्भोग के समय पति पत्नी दोनों चित्त मे किसी से ईर्ष्या
द्वेष का भाव रक्खे हो और चित्त मे इसी विषय की चिन्ता हो
उस दशा मे जो गर्भ रह जावे उससे ईर्ष्यक नपुंसक उत्पन्न
होता है ।
दृष्ट्वाव्यवायमन्येषांव्यवाये यः प्रवर्त्तते ।
ईर्ष्यकः सतुविज्ञेयो दृग्योनिरयमीर्ष्यकः ॥
इसका अर्थ यह है कि जो पुरुष अन्य पुरुष को स्त्री प्रसंग
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २८५
करते देखे तब उसकी इन्द्री में चैतन्यता हो और वह स्त्री प्रसंग
करने के योग्य हो अर्थात् जब तक दूसरे को मैथुन करते न
देखे तब तक वह स्वयं मैथुन नहीं कर सकता । इसका कोई
इलाज आयुर्वेद में नही बतलाया। इसका यही इलाज है कि वह
पुरुष दूसरे पुरुष को स्त्री प्रसंग करते देखे तब उसकी इन्द्री मे
चैतन्यता उत्पन्न हो ।
पाठक पाठिकाओ ! देखिये किसी से ईर्ष्या द्वेप करना कितना
बुरा है । थोड़ी ही सी भूल में इसका प्रभाव सन्तान पर कैसा
बुरा पड़ता है। इसीलिये आयुर्वेदाचार्यों ने बतलाया है कि
संभोग के समय स्त्री पुरुष दोनो प्रसन्न चित्त हों । पुरुष को
चाहिये स्त्री को अनेक प्रकार से आलिंगन चुम्बन आदि प्यार करके
प्रसन्न करे और आप भी प्रसन्न चित्त हो । सब चिंता शोक
क्रोध आदि भुला देना चाहिये, ऐसी आयुर्वेद की आज्ञा है ।
स्त्री के नपुंसक होने का कारण
जिस प्रकार पुरुष माता पिता की अज्ञानता से नपुंसक
होता है उसी प्रकार स्त्री भी नपुसक होती है । स्त्रियों मे दो
प्रकार की नपुंसक होती हैं, एक तो वह जिसकी इच्छा ही संभोग
की न हो इस लिये उसके कभी गर्भ नही रहता । यह नपुंसक
स्त्री मासिक धर्म्म से भी नही होती । यह नपुंसक स्त्री इस
प्रकार उत्पन्न होती है कि संभोग के समय मूर्खता वश पुरुष
स्त्री को अपने ऊपर करके जैसा कि आजकल के अनेक काम-