विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाह विज्ञान-कामशाला २८३
कुम्भिक नपुंसक
अरजस्का यदानारी श्लेष्मरेताव्रजेद्ऋतौ ।
अन्यासक्ताभवेत्प्रीतिर्जायतेकुम्भिलस्तदा ॥
इसका अर्थ यह है कि अल्प रज वाली अर्थात् जिस स्त्री
का रज अधिक प्रसंग के कारण कम हो गया है, निर्बल हो गया
है, अथवा रज क्षीण होगया है, ऐसी स्त्री का पति भी शिथिल
वीर्य वाला हो और सम्भोग करे उस समय स्त्री की सम्भोग से
इच्छा पूरी न हो (क्योंकि शिथिल वीर्य वाला पुरुष स्त्री की शान्ति
नहीं कर सकता इसलिये उस स्त्री की इच्छा अन्य पुरुष से संभोग
कराने की बनी रहती है) और गर्भ रहजावे तो कुम्भिक नपुंसक
उत्पन्न होता है ।
दूसरा कारण
मातुर्व्यवायप्रति मेन चक्री-
स्याद्बीजदौर्बल्यतयापितुश्च ॥
स्त्री के विपरीत मैथुन करने से अर्थात् पुरुष स्त्री के नीचे
होकर स्त्री को अपने ऊपर करके स्त्री से संभोग करावे यह विपरीत
संभोग कहलाता है ।
इस प्रकार विपरीत संभोग