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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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सती और शिव का दाम्पत्य प्रेम ५
है, परन्तु हमारा तुम्हारा नाम भी नहीं लिया। यो साधारण समय
में तुम जाना चाहती तो मुझे कोई इनकार न था परन्तु ऐसे समय
में न बुलाना हमलोगों का अपमान करना है, इस समय यदि तुम
बिना बुलाये जाओगी तो तुम्हारा बड़ा अपमान होगा।
तुम्हारे पिता ने हम लोगों का अपमान करने के लिये ही यह यज्ञ
किया है ऐसा मेरा ख्याल है। इस कारण बिना बुलाये तुम जाओगी
तो तुम्हारा अपमान होगा, तुम्हे पछताना पड़ेगा, तुम्हारा अपमान
होने से मेरा अपमान होगा।
सती ने प्रार्थना की कि हे स्वामिन ! पुत्री यदि पिता के यहां
बिना बुलाये भी चली जांय तो अपमान नहीं होता क्योंकि पिता
का घर भी तो अपना ही घर है। पुत्री के लिये पिता निमन्त्रण भेजे
या न भेजे पुत्री को जाने में मेरे विचार से तो कुछ अपमान की
बात नहीं होनी चाहिये ।
इस पर शिवजी ने कहा—इस विषय में अधिक कहने सुनने
की कोई बात नहीं है यदि तुम्हारी इच्छा जाने की ही है तो मैं
मना भी नहीं कर सकता चली जाओ। शिवजी की आज्ञा पाकर
सती ने पिता के घर जाने की तैयारी की। जब चलने लगी तब
शिवजी ने फिर समझाया कि देखो वहां जाकर जो कुछ भी कार्य
करना वह बड़े विचार से करना और समय का हर समय ध्यान
रखना सब कार्य समय का विचार करके करना ।
शिवजी ने सती को समझाया तो खूब परन्तु सती को माता
का स्नेह खींच ले गया क्योकि नारद जी सती से कहगये थे कि

६ भूमिका
"तुम्हें यज्ञ में तुम्हारे पिता ने नही बुलाया इस लिये तुम्हारी
माता ने अन्न जल त्याग दिया है और वे बडी दुःखी हैं" ।
नारद जी के कहने के अनुसार सती ने माता का दुःख
सुनकर जाना ही उचित समझा, इस लिये शिवजी की बात पर
कुछ विशेष ध्यान नही दिया ।
सती अपने पिता के यहा पहुंच गईं। घर में सती की माता
अन्न जल त्याग कर सती के लिये दुःखित पडी रो रही थी ।
माता की यह दशा देखकर सती को भी बडा दुःख हुआ । माता
के निकट जाकर सती ने कहा "माता मैं आगई" ।
सती की आवाज माता के कानो मे पहुची और वह सुनते
ही उठी, सती को हृदय से लगा लिया, माता पुत्री के स्नेह का
प्रेम सागर उमड पडा । दोनों परस्पर हृदय से लगकर रोने
लगीं । माता से मिलकर सती ने पिता से मिलने की इच्छा
प्रकट की । माता ने कहा—नही ! बेटी पिता से इस समय
मिलना उचित नही है क्योकि वे इस समय यज्ञशाला मे हैं। ऐसे
समय वहा तुम्हारा जाना मै भला नही समझती ।
सती को इस बात का बड़ा दुःख था कि पिता ने मुझे
निमंत्रण क्यो नही दिया इसलिये वह पिता से इस बात का
उलाहना देने की धुन मे थी इस कारण उसने एक न सुनी । वह
यज्ञशाला मे पिता के पास पहुच गई ।
सती को देखकर यज्ञशाला मे बैठे हुए सभी ऋषि मुनि
आदिको ने सती को पिता के पास जाने के लिये रास्ता दे दिया

सती ने पिता से जाकर नमस्कार किया फिर चारों ओर देखा तो
यज्ञ में सब देवताओं के भाग थे पर शिव जी का भाग न था ।
सती को देखते ही राजा दक्ष की आंखे सती के ऊपर क्रोध से
लाल होगईं और वे कर्कश स्वर से बोले—सती ! तुझे किसने
बुलाया, तू यहां किस के बुलाने से आई है ?
सती पिता की ऐसी क्रोध युक्त वाणी सुनकर चकित रहगईं
उनको ऐसी आशा स्वप्न में भी न थी उनके हृदय मे पिता के
कठोर वचन वाण की समान लगे और वे दुःखित हो बोलीं
"पिता जी मुझे बुलाया तो किसी ने नहीं परन्तु मैं माता पिता के
स्नेह के कारण स्वयं चली आई क्योंकि मैंने बहुत दिनो से अपनी
प्यारी माता और आपको देखा नहीं था। पिताजी ! आपने मिलने
की बहुत दिनों से मेरी उत्कण्ठा थी, मैंने क्या अपराध किया है
जो आपने अपनी इस प्यारी पुत्री को भुला दिया" ?
"पिताजी ! आप चाहे मुझे भुलादे परन्तु मैं आपकी पुत्री हूं
आपका जो वात्सल्य प्रेम मुझपर रहा है उसे मै कभी स्वप्न मे भी
नही भूल सकती ।"
सती का इस प्रकार पिता से वार्तालाप सुनकर यज्ञशाला
में बैठे हुए सभी ऋषि मुनि बड़े ध्यान और आश्चर्य मे सती की
ओर देखने लगे जिसका हाथ आहुति देने को उठा था वह वैसा,
ही रह गया। सभी अपने अपने कार्य को भुलाकर सती की नम्रता
भरी मधुर वाणी सुनने लगे ।
सती की इस प्रकार की नम्रता युक्त विनय से भी राजा दक्ष
पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ा। वे सती से कहने लगे—तेरा यह वहाना

८
भूमिका


मेरे सामने न चलेगा। ऐसा बहाना मैं नही सुन सकता यह उसी
निर्लज्ज को सुनाना जिसके साथ तेरा सम्बन्ध हुआ है।
सती ने कहा—पिताजी ! आप मुझे जो इच्छा हो कहिये
परन्तु आप उन्हे कुछ न कहिये आपके मुह से यह बात शोभा
नहीं देती आप मेरे स्वामी को निर्लज्ज बना रहे हैं ऐसे कटु-
वाक्य मै सुन नहीं सकती ।
राजा दक्ष ने कहा—मै इसमे असत्य क्या कहता हू, तेरा
पति निर्लज्ज तो है ही क्योकि पागल की समान वाघम्बर धारी
अमृत और विष को एक समान समझने वाले को मैंने निर्लज्ज
कहा तो इसमे बुराई क्या है।
सती बोली—पिताजी ! आप उन्हे चाहे जो समझे मेरे तो वे
जीवन सर्वस्व और पूज्य देव है। आप उन्हे ऐसे कटु वाक्य न कहे ।
राजा दक्ष को सती की बात सुनकर बड़ा क्रोध आगया और
वे अपने क्रोध को न संभाल सके। फिर विशेष क्रोध में आकर
वे सती के पति शिवजी को अनेक कटुवाक्य कहने लगे ।
सती ने कहा—पिताजी ! आप को इतना क्रोध मेरे ऊपर क्यों
आरहा है यदि मुझसे जाने अथवा बिना जाने कोई अपराध हो
गया हो तो उसके लिये मैं क्षमा चाहती हू, यदि आप मुझे मेरा
वह अपराध जिसपर आप इतने अप्रसन्न है बतला कर उसका
प्रायश्चित भी बतलादे तो मै उसे करने को अभी तैयार हूं।
राजा दक्ष के होठ क्रोध से कांपने लगे और नेत्र लाल होगये
वे बोले—तेरे अपराध का प्रायश्चित तेरी मृत्यु के सिवाय और

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र
आनन्द मन्दिर
केवल विवाहित स्त्री पुरुषों के लिये
दाम्पत्य प्रेम
और
रतिक्रिया का गुप्तरहस्य
लेखिका
आयुर्वेदिक स्त्री चिकित्सा में भारत विख्यात
श्रीमती यशोदादेवी
प्रथमवार ] [आ) साढ़ेसात रु०

मुद्रक व प्रकाशक
पं० श्रीराम शर्मा
स्त्री शिक्षा पुस्तकालय
कर्नलगंज, प्रयाग

बनिता हितैषी प्रेस
कर्नलगंज, इलाहाबाद

सा नारी धर्मभागिनी । पृ० १५ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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सती और शिव का दाम्पत्य प्रेम ६
कुछ नहीं होसकता, तेरी मृत्यु से ही उस अधम निर्लज्ज शिवका
मेरा सम्बन्ध नष्ट होगा तभी तेरा अपराध क्षमा होगा।
सती को पति के लिये "अधम" शब्द पिता के मुख से
सुनकर इतना अधिक दुःख और हृदय को कष्ट हुआ कि वे मरने
मे तय्यार होकर पितासे कहने लगी—पिता जी! यदि आपको मेरे
प्राणान्त से ही संतोष हो तो मैं तय्यार हूं, मेरे मरने से ही आप
मेरा अपराध क्षमा करने के अभिलाषी है तो मै आपकी आज्ञा
पालन करने को तय्यार हूं।
राजा दक्ष के मुह से एक शब्द भी नहीं निकला। सती
यज्ञशाला मे पद्मासन लगाकर बैठ गई। अपने गेरुवे कपडो
से, जो पहिने थी अपने मुख आदि समस्त शरीर को ढक लिया।
बात की बात मे सती के शरीर से एक प्रचण्ड अग्नि की लपट
निकलकर आकाश मे विलीन होगई। इस भयानक दृश्य को देखकर
यज्ञशाला के सभी ऋषि मुनि आदि अवाक् रहगये। सबके हृदय
दुःख से भर गये। सती के शरीर का अंत होते ही शिवजी के गणो
को यह समाचार मालूम हुआ। उन्होने आकर राजा दक्ष के शरीर
को, यज्ञशाला और राजमहल आदि को नष्ट कर दिया।
सती की मृत्यु का दुःखदाई समाचार पाकर शिवजी को
अपनी प्रिय पत्नी के विछोह का जो दुःख हुआ वह लिखकर सम-
झाना कठिन है। सती का अपने पति शिव जी पर जैसा प्रेम
था उसकी प्रशसा करना व्यर्थ है। पाठक पाठिकाये इसी घटना से
स्वयं समझले कि पिता के मुह मे पति की निन्दा सुनकर सती ने
अपने प्राण त्याग दिये, इससे अधिक प्रेम और क्या होसकता है।

१० भूमिका

जिस प्रकार सती अपने प्रिय पति से प्रेम करती थीं उससे
कहीं अधिक शिव जी का प्रेम सती पर था। शिवजी ने ससुर
के यहाँ पहुँच कर राजा दक्ष की यज्ञशाला में जाकर देखा, हवन
कुण्ड से हवन की सुगन्धि की जगह रक्त और मांस जलने की
दुर्गन्ध आरही थी। राजा दक्ष का शरीर अनेक टुकडों मे इधर उधर
पड़ा हुआ था। राज महलो से हाहाकार की आवाज आरही थी।
शिवजी को अपनी पत्नी सती के मृत शरीर को देखकर बड़ा
दुख हुआ। शिवजी ने अपनी प्यारी पत्नी का मृत शरीर उठाकर
अपने कंधे पर रखलिया और सती के शोक में पागल के समान
पहाड़ो की कंदराओ में फिरने लगे। शिवजी को अपनी प्यारी
पत्नी सती से इतना स्नेह था कि वे उसके मृत शरीर को छोड़ना
ही नही चाहते थे। मृत शरीर को ही देख देखकर उन्हें कुछ
सन्तोष सा होता था।
शिवजी रातदिन सती के मृत शरीर को लिये फिरते थे।
ससार के सभी कार्य भूल कर केवल सती के शरीर को खिलाते
रहते थे और सती के मुख का दर्शन कर संतोप करते थे। शिवजी
के इस प्रकार से रहने से देवताओं को बड़ी चिंता हुई परंतु किसी
का साहस नही था कि शिवजी के पास आकर सती के मृत शरीर को
शिवजी से अलग कराता। इसलिये सब देवताओं ने सभा करके
यह निश्चय किया कि जब तक शिवजी से सती का मृत शरीर
अलग न किया जावेगा तब तक शिव जी का चित्त शांत न
होगा। इस प्रकार सती के शरीर को देवो ने शस्त्रो से टुकड़े टुकड़े
कर डाला। सैकड़ो टुकड़े करके अनेक स्थानों मे भेज दिया जहां

जहा सती के शरीर के टुकड़े गये वहां वहा तीर्थ होगये जो देवी
मठ कहे जाते हैं जैसे ज्वालामुखी, देवीहिंगलाज, विन्ध्यवासिनी
देवी आदि। भारतवर्ष भरमें १०८ देवी के प्रसिद्ध मंदिर हैं।
शिव और सती का दाम्पत्य प्रेम भारत के धर्मग्रंथों अर्थात
भारत के प्राचीन इतिहास में प्रसिद्ध है। उसी दिन से सती धर्म
अर्थात पातिव्रत धर्म की प्रतिष्ठा नी नींव पडी। जो स्त्री पति के
प्रेम के कारण शरीर त्याग करती है वह सती कही जाती है।
और उसकी देश पूजा करता है। भारत की स्त्रियों की पतिभक्ति
जगद्विख्यात है। भारत की स्त्रियां अपने पति की निन्दा सुनकर
अब भी प्राण त्यागने को तैयार होजाती हैं।
पति और पत्नी मे कैसा प्रेम होना चाहिये यह भारत के
प्राचीन ऋषि मुनियों ने और देवताओं ने प्रत्यक्ष दिखला दिया है।
शिवजी का दाम्पत्य प्रेम आदर्श प्रेम है। जबसे पति पत्नी में प्रेम
का अभाव हुआ। पुरुष स्त्रियों का अनादर करने लगे और स्त्रियां
रोगी ही रोगी सन्तान उत्पन्न करने लगीं। पुरुष स्त्री को केवल
विषय वासना की तृप्ति करने तथा विषयाग्नि की शांति का यंत्र
समझ कर अनियम रति क्रिया करने लगे तब से दाम्पत्य प्रेम
और सुख का नाश होगया।
जब से मनगढंत कामशास्त्र कोकशास्त्र आदि की अनेक
गन्दी पुस्तकों का प्रचार हुआ है तब से देखा जाता है स्त्रियो
और पुरुषों की रोगी संख्या दिन प्रति दिन बढती जाती है
और इसी कारण हमारे देश के बालको की रोगी तथा मृत्यु संख्या
अन्य देशों के बालकों की रोगी तथा मृत्यु संख्या से अधिक है।

१७ भूमिका
श्रीकृष्ण जी का दाम्पत्य प्रेम
श्रीकृष्ण को देखिये राधा के प्रेम मे किस प्रकार बंधे हुये थे
एकबार जब राधा मानकर के श्रीकृष्ण जी से रूठ गईं तब
श्रीकृष्ण जी कहते हैं:—
जब मान किया राधा ने, दे रसिक श्याम को झटका ।
तब प्रभु ने उनके पद पर, था मोर मुकुट को पटका ॥
मैं महा रक हू प्यारी ! तुम विश्व सम्पदा सारी ।
मैं रस लोभी मधुकर हू, तुम हो नन्दन की क्यारी ॥
है नारी सुख जीवन का, है यही स्वर्ग इस तन का ।
जो मूर्ख नारि को तजकर, लेते है रास्ता बन का ॥
नहिं स्वर्ग दूसरा बढ़कर, कहते है कृष्ण सुन राधे !
जो नारि बिना जीते हैं, वे हैं नर बड़े अभागे ॥
श्रीकृष्णचन्द्र और राधिकाजी का प्रेम प्रसिद्ध है। श्रीकृष्ण
चन्द्र जितने स्त्री-प्रेमी थे उतने ही ज्ञानी भी थे इस बात को
सभी जानते है। श्रीकृष्णजी योगिराज भी थे। राधा कृष्ण
तथा सती और शिवजी के चित्र और चरित्र से शिक्षा मिलती है
कि पत्नी के प्रेम से बढ़कर स्वर्ग भी नही है।
प्राचीन काल के आदर्श पुरुषो या महान व्यक्तियों के चरित्रो
पर आप ध्यान देगे तो आपको मालूम होगा कि उनका जीवन
दाम्पत्य प्रेम से कैसा आनन्दमय था। वे स्त्री के साथ अपने सांसारिक
जीवन को स्वर्गीय बना लेते थे और स्त्री के साथ ही आध्यात्मिक
जीवन का भी आनन्द लाभ करते थे। इसीलिये सभी ने दाम्पत्य
प्रेम को स्वर्गीय सुख बतलाया है और उसकी प्रशसा की है।

दाम्पत्य प्रेम और स्वर्ग ३६
दाम्पत्य प्रेम और स्वर्ग
दाम्पत्य प्रेम संसार का वह दुर्लभ पदार्थ है जिसकी चाहना
साधारण पुरुषों से लगाकर देवता तक करते हैं। दाम्पत्य प्रेम के
सुख से अधिक सुख स्वर्ग में भी नहीं है। शास्त्रकारों ने बतलाया है।
स्वर्गेऽपि दुर्लभं ह्येतदनुरागः परस्परम् ।
रक्त एको विरक्तोऽन्यस्तस्मात्कष्टतरं नु किम् ॥
अर्थात् पति पत्नी का पारस्परिक प्रेम स्वर्ग का भी दुर्लभ
पदार्थ है किन्तु एक के अनुरक्त और दूसरे के विरक्त होने पर
इसकी अपेक्षा कष्टकर और क्या होसकता है। भाव यह है कि
पति पत्नी से प्रेम न हो, एक दूसरे के विरुद्ध इच्छा वाला हो तो
इसकी बराबर इस जन्म मे दूसरा कोई दुःख और कष्ट भी नहीं है।
शास्त्रो के इन वाक्यों का प्रत्यक्ष उदाहरण घर घर देखा
जाता है। पति पत्नी से कलह बनी रहती है इसका कारण आगे
इसी पुस्तक में विस्तार पूर्वक बतलाया जावेगा। पति पत्नी मे अन-
बन रहने से मनुष्य को जीवन भर दुःख और कष्ट भोगने
पड़ते हैं। महर्षि मनुजी कहते हैं:-
सन्तुष्टो भार्य्यया भर्त्ता, भर्त्ता भार्य्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं, कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥
जिस घर में पति पत्नी परस्पर एक दूसरे से संतुष्ट रहते हैं उस
घर मे आनन्द और सुख निस्सन्देह अचल भाव से स्थित रहता है।

१४ भूमिका
देखने मे आता है कि प्राय. पति पत्नी से अनेक प्रकार की अस-
न्तुष्टता वनी ही रहती है इसका कारण यह है कि पुरुष स्त्री के
महत्व को नही समझता इस कारण पति के जो नियम और
कर्त्तव्य हैं उनमें सैकड़ा पीछे दो ही चार पति उनका पालन करते
होंगे । उन्ही का जीवन स्वर्ग-सुख का अनुभव करता होगा । जो
इस ओर ध्यान नहीं देते वे सुखी कैसे रह सकते हैं ।
याज्ञवल्क्य ऋषि कहते है.—
यत्रानुकूल्यं दम्पत्योस्त्रिवर्गस्तत्र वर्द्धते ।
जिस घर मे स्वामी और स्त्री की परस्पर अनुकूलता है उस
घर मे धर्म, अर्थ, काम इन तीनो की वृद्धि होती है। अर्थात् पार-
स्परिक धर्म पालन मे धर्म्म कार्यों की वृद्धि होती है। उस घरमे धर्म्म का
वास होता है और धन सम्पत्ति की उन्नति होती है । उत्तम सन्तान
उत्पन्न होती है । जिस घर मे पति पत्नी एक दूसरे को सन्तुष्ट
नहीं कर सकते उस घर मे कलह रहती है । धन सम्पत्ति और
सन्तान से वह घर दुखी रहता है अर्थात् वे पति पत्नी धन से
दुखी और सन्तान से दुखी रहते हैं तात्पर्य यह है कि उस घर
में बालक रोगी निर्बल दुर्बल और कम आयु वाले होते हैं । उस
घर के मनुष्य धन हीन होते हैं। क्योकिशास्त्रकारो ने बतलाया है:-
पत्नी मूलं गृहं पुसां यदिच्छन्दोऽनुवर्तिनी ।
गृहाश्रमसमं नास्ति यदि भार्या वशानुगा ॥

दाम्पत्य प्रेम और स्वर्ग १५

तथा धर्म्मार्थ कामानां त्रिवर्ग फलमश्नुते ।
पत्नी ही गृहस्थाश्रम की जड है। यदि स्त्री पति की इच्छा-
नुगामिनी हो तो गृहस्थाश्रम की तुलना ( बराबरी ) किसी से
भी नहीं हो सकती और स्त्री के सहित पति धर्म, अर्थ, काम, इन
तीनों फलों को भोगता है ।
धर्म से शुभ कर्म, अर्थ से धन सम्पत्ति और काम से उत्तम
सन्तान की प्राप्ति होती है ।
अनुकूल कलत्रोयस्तस्य स्वर्ग इहैव हि ।
प्रतिकूल कलत्रस्य नरको नात्रसंशयः ॥
स्त्री के अनुकूल होने पर अर्थात् पति से पत्नी का सच्चा प्रेम
और सन्तुष्टता होने पर इसी लोक में स्वर्ग का भोग होता है
अर्थात् आनन्द और सुख मिलता है। यदि स्त्री प्रतिकूल हुई अर्थात्
स्त्री पति में प्रेम न हुआ सन्तुष्टता न हुई तो इस लोक में ही
नरक भोग होता है इसमे कुछ भी सन्देह नहीं है। इन दोनों बातों
का अनुभव बहुतेरे पति पत्नियों को होगा । वे ही दाम्पत्य प्रेम
और परस्पर की सन्तुष्टता का तथा असन्तुष्टता का सुख दुःख
समझते होंगे ।
शास्त्रकारों ने बतलाया है किः-
न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्य्ये न सुखे तथा ।
स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्म्म भागिनी ॥

१६ भूमिका
जो स्त्री काम, भोग ऐश्वर्य और सुख किसी की भी अभि-
लाषा नहीं करती केवल स्वामी के प्रेम मे ही सन्तुष्ट है वही स्त्री
धर्मलाभ करती है।
यहां देखा जाता है कि शास्त्रकारो के इन वाक्यो से बिलकुल
विरुद्ध व्यवहार हो रहा है। सैकड़ा पीछे निन्यानवे पुरुष
अधिक विषय, अनियम रतिक्रिया के कारण प्रमेह सुस्ती स्वप्रदोष
शीघ्रपात और नपुसकता आदि रोगों मे घिर जाते है जिस के
कारण पत्नी को किसी प्रकार भी सन्तुष्ट नही कर सकते। वे पत्नी
को भी रोगी बना देते है इसलिये पति पत्नी रोगी सन्तान उत्पन्न
कर घर भर की चिकित्सा में धन की वरबादी करते हैं और सुख-
मय जीवन नष्ट कर देते हैं।
बहुतेरे पुरुष विवाह होने के पहिले ही अनेक प्रकार से वीर्य
का सत्यानाश मार बैठते है। जो विवाह होने के पहिले बचे भी रहे वे
विवाह होते ही अधिक और अनियम रतिक्रिया करके शक्ति हीन
रोगी निर्बल और दुर्बल होजाते हैं तथा स्त्रियो को भी रोगी बना
देते हैं इस प्रकार पति पत्नी रोगी हो दुःखमय जीवन व्यतीत
करते हैं।
आमदनी कम, खर्च ज्यादा होने के कारण ऐश्वर्य और सुख
भोग से भी स्त्रियों की अभिलाषा पूरी नही होती इसलिये सैकडा
पीछे निन्यानवे दम्पति ऐसे मिलेगे जिनमें उपयुक्त प्रेम नहीं होता
उसी कारण गृहस्थी का सुख जैसा चाहिये नहीं मिलता। बल्कि
दाम्पत्य जीवन दुखमय हो जाता है।

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श्री रामचन्द्रजी का आदर्श प्रेम १७
श्री रामचन्द्रजी का आदर्श प्रेम
पति पत्नी का प्रेम ही स्वर्ग है इस को सभी मनुष्यो ऋषि
मुनियो और देवताओं तक ने माना है। सीता और रामचन्द्रजी
का दाम्पत्य प्रेम विख्यात है। सीता का प्रेम तो सभी जानते हैं।
यहां हम रामचन्द्रजी का प्रेम सचित्र दिखलाते हैं। जब सीता जी
को रावण हर कर लंका को ले गया और रामचन्द्र जी मृग का
बध करके लौटे तो सीता को कुटी में नहीं पाया। वे व्याकुल हो
वहीं बैठकर इसभांति विलाप करने लगे ।
ऐ मेरे दिल व जानकी प्यारी कहां है तू ।
राजा जनक की राजकुमारी कहा है तू ॥
तेरे लिये हूं वन में दुखारी कहा है तू ।
दुख मुझपै है वियोग का भारी कहा है तू ॥
हैं तेरे देखने की जो आशा लगी हुई ।
आंखों में जानेजार है प्यारी रुकी हुई ॥
जङ्गल मुझे उजाड है रौनक थी वन की तू ।
कांटों में बनके भी थी कली या चमन की तू ॥
हरदेश में रफ़ीक थी मुझ