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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

सती और शिव का दाम्पत्य प्रेम ५
है, परन्तु हमारा तुम्हारा नाम भी नहीं लिया। यो साधारण समय
में तुम जाना चाहती तो मुझे कोई इनकार न था परन्तु ऐसे समय
में न बुलाना हमलोगों का अपमान करना है, इस समय यदि तुम
बिना बुलाये जाओगी तो तुम्हारा बड़ा अपमान होगा।
तुम्हारे पिता ने हम लोगों का अपमान करने के लिये ही यह यज्ञ
किया है ऐसा मेरा ख्याल है। इस कारण बिना बुलाये तुम जाओगी
तो तुम्हारा अपमान होगा, तुम्हे पछताना पड़ेगा, तुम्हारा अपमान
होने से मेरा अपमान होगा।
सती ने प्रार्थना की कि हे स्वामिन ! पुत्री यदि पिता के यहां
बिना बुलाये भी चली जांय तो अपमान नहीं होता क्योंकि पिता
का घर भी तो अपना ही घर है। पुत्री के लिये पिता निमन्त्रण भेजे
या न भेजे पुत्री को जाने में मेरे विचार से तो कुछ अपमान की
बात नहीं होनी चाहिये ।
इस पर शिवजी ने कहा—इस विषय में अधिक कहने सुनने
की कोई बात नहीं है यदि तुम्हारी इच्छा जाने की ही है तो मैं
मना भी नहीं कर सकता चली जाओ। शिवजी की आज्ञा पाकर
सती ने पिता के घर जाने की तैयारी की। जब चलने लगी तब
शिवजी ने फिर समझाया कि देखो वहां जाकर जो कुछ भी कार्य
करना वह बड़े विचार से करना और समय का हर समय ध्यान
रखना सब कार्य समय का विचार करके करना ।
शिवजी ने सती को समझाया तो खूब परन्तु सती को माता
का स्नेह खींच ले गया क्योकि नारद जी सती से कहगये थे कि