विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७ भूमिका
श्रीकृष्ण जी का दाम्पत्य प्रेम
श्रीकृष्ण को देखिये राधा के प्रेम मे किस प्रकार बंधे हुये थे
एकबार जब राधा मानकर के श्रीकृष्ण जी से रूठ गईं तब
श्रीकृष्ण जी कहते हैं:—
जब मान किया राधा ने, दे रसिक श्याम को झटका ।
तब प्रभु ने उनके पद पर, था मोर मुकुट को पटका ॥
मैं महा रक हू प्यारी ! तुम विश्व सम्पदा सारी ।
मैं रस लोभी मधुकर हू, तुम हो नन्दन की क्यारी ॥
है नारी सुख जीवन का, है यही स्वर्ग इस तन का ।
जो मूर्ख नारि को तजकर, लेते है रास्ता बन का ॥
नहिं स्वर्ग दूसरा बढ़कर, कहते है कृष्ण सुन राधे !
जो नारि बिना जीते हैं, वे हैं नर बड़े अभागे ॥
श्रीकृष्णचन्द्र और राधिकाजी का प्रेम प्रसिद्ध है। श्रीकृष्ण
चन्द्र जितने स्त्री-प्रेमी थे उतने ही ज्ञानी भी थे इस बात को
सभी जानते है। श्रीकृष्णजी योगिराज भी थे। राधा कृष्ण
तथा सती और शिवजी के चित्र और चरित्र से शिक्षा मिलती है
कि पत्नी के प्रेम से बढ़कर स्वर्ग भी नही है।
प्राचीन काल के आदर्श पुरुषो या महान व्यक्तियों के चरित्रो
पर आप ध्यान देगे तो आपको मालूम होगा कि उनका जीवन
दाम्पत्य प्रेम से कैसा आनन्दमय था। वे स्त्री के साथ अपने सांसारिक
जीवन को स्वर्गीय बना लेते थे और स्त्री के साथ ही आध्यात्मिक
जीवन का भी आनन्द लाभ करते थे। इसीलिये सभी ने दाम्पत्य
प्रेम को स्वर्गीय सुख बतलाया है और उसकी प्रशसा की है।