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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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दाम्पत्य प्रेम और स्वर्ग ३६
दाम्पत्य प्रेम और स्वर्ग
दाम्पत्य प्रेम संसार का वह दुर्लभ पदार्थ है जिसकी चाहना
साधारण पुरुषों से लगाकर देवता तक करते हैं। दाम्पत्य प्रेम के
सुख से अधिक सुख स्वर्ग में भी नहीं है। शास्त्रकारों ने बतलाया है।
स्वर्गेऽपि दुर्लभं ह्येतदनुरागः परस्परम् ।
रक्त एको विरक्तोऽन्यस्तस्मात्कष्टतरं नु किम् ॥
अर्थात् पति पत्नी का पारस्परिक प्रेम स्वर्ग का भी दुर्लभ
पदार्थ है किन्तु एक के अनुरक्त और दूसरे के विरक्त होने पर
इसकी अपेक्षा कष्टकर और क्या होसकता है। भाव यह है कि
पति पत्नी से प्रेम न हो, एक दूसरे के विरुद्ध इच्छा वाला हो तो
इसकी बराबर इस जन्म मे दूसरा कोई दुःख और कष्ट भी नहीं है।
शास्त्रो के इन वाक्यों का प्रत्यक्ष उदाहरण घर घर देखा
जाता है। पति पत्नी से कलह बनी रहती है इसका कारण आगे
इसी पुस्तक में विस्तार पूर्वक बतलाया जावेगा। पति पत्नी मे अन-
बन रहने से मनुष्य को जीवन भर दुःख और कष्ट भोगने
पड़ते हैं। महर्षि मनुजी कहते हैं:-
सन्तुष्टो भार्य्यया भर्त्ता, भर्त्ता भार्य्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं, कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥
जिस घर में पति पत्नी परस्पर एक दूसरे से संतुष्ट रहते हैं उस
घर मे आनन्द और सुख निस्सन्देह अचल भाव से स्थित रहता है।