सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 704 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 41

८
भूमिका


मेरे सामने न चलेगा। ऐसा बहाना मैं नही सुन सकता यह उसी
निर्लज्ज को सुनाना जिसके साथ तेरा सम्बन्ध हुआ है।
सती ने कहा—पिताजी ! आप मुझे जो इच्छा हो कहिये
परन्तु आप उन्हे कुछ न कहिये आपके मुह से यह बात शोभा
नहीं देती आप मेरे स्वामी को निर्लज्ज बना रहे हैं ऐसे कटु-
वाक्य मै सुन नहीं सकती ।
राजा दक्ष ने कहा—मै इसमे असत्य क्या कहता हू, तेरा
पति निर्लज्ज तो है ही क्योकि पागल की समान वाघम्बर धारी
अमृत और विष को एक समान समझने वाले को मैंने निर्लज्ज
कहा तो इसमे बुराई क्या है।
सती बोली—पिताजी ! आप उन्हे चाहे जो समझे मेरे तो वे
जीवन सर्वस्व और पूज्य देव है। आप उन्हे ऐसे कटु वाक्य न कहे ।
राजा दक्ष को सती की बात सुनकर बड़ा क्रोध आगया और
वे अपने क्रोध को न संभाल सके। फिर विशेष क्रोध में आकर
वे सती के पति शिवजी को अनेक कटुवाक्य कहने लगे ।
सती ने कहा—पिताजी ! आप को इतना क्रोध मेरे ऊपर क्यों
आरहा है यदि मुझसे जाने अथवा बिना जाने कोई अपराध हो
गया हो तो उसके लिये मैं क्षमा चाहती हू, यदि आप मुझे मेरा
वह अपराध जिसपर आप इतने अप्रसन्न है बतला कर उसका
प्रायश्चित भी बतलादे तो मै उसे करने को अभी तैयार हूं।
राजा दक्ष के होठ क्रोध से कांपने लगे और नेत्र लाल होगये
वे बोले—तेरे अपराध का प्रायश्चित तेरी मृत्यु के सिवाय और