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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

११८ आनन्द मन्दिर
संवाहितो रणत्कणत्करहस्ततालै-
र्धन्यःस्वहर्म्य समये विचिनोति निद्राम् ॥
बसन्त में जो पहिले गान सुनते। गान सुनने के पश्चात् विधि
पूर्वक अर्थात् आयुर्वेद के कहे अनुसार स्त्री संभोग करते, तथा
स्त्री के साथ प्रेम पूर्वक बडे स्नेह से झूला झूलते और फिर
शयन कर वसन्त की राते व्यतीत करते हैं वे धन्य हैं।
भाग्यवान पुरुष ही वसन्त के इस आनन्द का सुख भोग
करते हैं।
स्निग्धश्चन्दन कुंकुम प्रभृतिभिः कर्पूर संमिश्रितैः ।
शय्यां धूपितधौतवस्त्र रचितामास्थाय रम्ये गृहे ॥
गाढालिङ्गनचुम्बनादिरचितैः संवर्द्धयन्मन्मथं ।
सेवेत्तां प्रमदां वसन्त समयेश्लेष्मक्ष्यार्थं पुमान् ॥
कपूर मिश्रित चन्दन और कुंकुम आदि से स्निग्ध, अगर
की धूनी से धूपित और उज्ज्वल दूध के झाग की समान सफेद
वस्त्रों से सजे हुए बिछे पलग पर जो अपनी प्यारी पत्नी से
प्रेम पूर्वक कामोद्दीपन करते हुए वसन्त मे बढ़े हुए कफ
को शान्त करने के लिये दाम्पत्य सुख का आनन्द भोग
करते हैं वे आरोग्यता से सुख सहित वसन्त को व्यतीत
करते हैं।"इस ऋतु मे स्त्री के साथ जल विहार भी करना चाहिये।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ११६
ग्रीष्म ऋतु का आहार विहार
( ज्येष्ठ और आषाढ ग्रीष्मऋतु )
तीक्ष्णांशुरतितीक्ष्णां ग्रीष्मे स छिपनीच यत् ।
प्रत्यहं चीयते श्लेष्मा तेन वायुश्च वर्द्धते ॥
ग्रीष्म मे सूर्य तीक्ष्ण किरण वाला होकर जगन की
चिकनाई को दूर कर देता है अतएव नित्य प्रति कफ क्षीण होता
जाता है और वात की वृद्धि होती है अर्थात् वात चढता है ।
वात को शात करने के लिये इस ऋतु मे मीठे चिकने हलके
और शीतल पतले पदार्थों का सेवन करना, कुएं का ताजा जल
पीना और ताजे जल से स्नान करना, मिश्री मिले जौ के सत्तू,
पुराने चावलो का भात, अनार, खस, गुलाब आदि का शर्बत
अंगूर अनार आदि फल का सेवन, आंवला, सेव, आदि के
मुरब्बे का सेवन करना फूलो की माला धारण करना शरीर मे
चन्दन लगाना अत्यन्त हितकारी है।
गुड़ के साथ हड़ों का चूर्ण प्रतिदिन सेवन करना चाहिये,
मिश्री और गाय का घी मिले ठंडे जल सहित सत्तू पीना हित-
कारी है महीन कोमल सफेद वस्त्रों का पहिनना हितकर है।
शालि चावलों का भात तथा सांठी चावलों का भात, पुराने
जौ और गेहूँ की रोटी, मूंग, मटर, अरहर, मसूर की दाल, कच्चा
तरबूज, कच्ची ककड़ी, कच्चा खीरा, पेठा, करेला बथुआ, पालक,
परवल, चौलाई चूका का शाक ये सब सेवन करना हितकारी है।

१३० आनन्द मन्दिर
मिश्री मिला हुआ गाय का दूध, गाय का मीठा दही, मलाई
सहित, मिश्री मिला हुआ गाय का मट्ठा इस ऋतु में अत्यन्त
हितकारी है।
सिंघाड़ा, कसेरू, लौकी, गन्ना, पतली खीर, सेमई, माल पुआ,
दुधलपसी, दूध और मिश्री मिली हुई फेनी का सेवन करना और
दूध भात मिश्री का प्रति दिन सेवन करना हितकारी है। कसरत
करना परिश्रम करना प्रात. और सायकाल का वायु सेवन
हितकारी है।
चन्द्रपादा दिवास्वप्नं चन्दनं तरणं जले ।
लघु स्निग्धं द्रवं पथ्यं कायस्था सगुडा हिता ॥
उशीरैश्छादितं गेहं सिक्तैर्नीरैः सुगन्धिभिः ।
शीतलं च तरुच्छाया द्राक्षा चोशीरवीजनम् ॥
दुग्धांश्च प्रसूननि बालाया अधरामृतम् ।
हितान्याहुरयेबाले ग्रीष्मे वेद्या इमानिहि ॥
चन्द्रमा की चांदनी का सेवन, दिन में सोना, चन्दन लगाना,
जल विहार करना, हलके चिकने और पतले पदार्थों का सेवन
करना, गुड मिलाकर हडौं का चूर्ण सेवन करना ।
सुगन्धित जल से छिड़के खस के परदों से आच्छादित घर मे
रहना, शीतल पदार्थ, घने वृक्षों की छाया, खस के पखे, दूध भात,
फूलों की माला और बाला स्त्री का अधरामृत पानकर दाम्पत्य प्रेम

५—पचमी को गुप्तस्थान मे ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
५१६

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---) स (UU-) ज (U-U) स (UU-) त (--U) त (--U) गुरु (-)
Let's check:
1-3: के की कू (---) -> म-गण! PERFECT!
4-6: ज ति का (UU-) -> स-गण! PERFECT!
7-9: न ने च (U-U) -> ज-गण! PERFECT!
10-12: स र सी (UU-) -> स-गण! PERFECT!
13-15: म्ला ना म्बु (--U) -> त-गण! (म्ला is heavy, ना is heavy, म्बु is light! PERFECT!)
16-18: पू र्णा त (--U) -> त-गण! (पू is heavy, र्णा is heavy, त is light! PERFECT!)
19: था (-) -> गुरु! PERFECT!

IT IS 100% SHARDULAVIKRIDITA!
Now let's check Line 2 with Shardulavikridita:
1-3: हं सा मा (---) -> म-गण! (हं heavy, सा heavy, मा heavy)
4-6: न स मा (UU-) -> wait: न (U), स (U), मा (-)! स-गण!
7-9: श्र यं ति (U-U) -> श्र (light U), यं (heavy -), ति (light U)! ज-गण!
IT IS "श्र यं

': the top line is flat. Then 'घ'. There is no e-matra! It looks like "गर्जन्मघमहीध्रकन्दरदरी" or maybe the e-matra didn't print. Wait, could it be "गर्जन्मेघ"? In Hindi translation: "मेघों की गर्जना से". So it definitely translates "मेघ". Let's write "गर्जन्मेघमहीध्रकन्दरदरी" because in OCR/human transcription, missing light strokes in old letterpress are usually restored, or let's write "गर्जन्मघमहीध्रकन्दरदरी"? Actually, wait, let's look at "शस्यावृता":
Wait, under 'व', there is a 'ृ'.
And in line 6:
"भात्येवं पवनस्य कोपनकरी वर्षारृतुः श्रेयसी ॥" or "वर्षाऋतुः"?
Wait, look at that character in line 6:
It is:
'व' 'र्षा'
Then: 'र्ऋ'? Wait, does it have a reph on top of 'ऋ'?
Wait, look at the shape of that letter:
Could it be 'र्ऋतुः'?
Wait, in Sanskrit, "वर्षा" + "ऋतुः" -> if sandhi isn't applied, it's "वर्षाऋतुः".
Why would someone write 'र्ऋतुः'?
Because in Hindi, many people pronounce 'ऋ' as 'ri',

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १२३
सेंधा नमक, काली मिर्च, पडा हुआ गाय का मट्ठा प्रति दिन
सेवन करना चाहिये। पोई का शाक, सहजन की तरकारी,
सहजन के फूल का शाक, लौकी, मूली की तरकारी, खीर और
कुए का पानी पीना हितकारी है।
गुड़ मिलाकर गायका दही, घी मे बनाई गई गाय के दूध
की खीर खाना हितकारी है। ईख का सेवन चीनी का सेवन
लपसी, फेनी, मालपुआ, लड्डू, सेमई, सेवन हितकारी है।
मानं विधाय परिहृत्य पराङ्मुखीभिः,
कादम्बिनी समयगर्जित कातराभिः ।
आलिङ्गितोऽतिरभसातुर कामिनीभि-
र्धन्यः स्वहर्म्य समये विचिनोति निद्राम् ॥
अर्थात्—मान करके विमुख माननी स्त्री अपने प्यारे पति
से अलग होकर अर्थात् रूठकर मुह फेर कर बैठ गई उसी समय
मेघो के उमड घुमड़ कर गर्जने से और बिजली के भयानक शब्द
से भयभीत होकर अर्थात् बिजली की कड़कडाहट से डरकर
दौड़कर पति के लिपट गई इस प्रकार इस वर्षा मे जो पुरुष
अपने घर में दाम्पत्यप्रेम का आनन्द लेते हैं वे धन्य हैं।
अये बाले भजेन्नारीं प्रौढां मेघे सुगर्जति ।
वर्षा मे जिस समय बादल गर्ज रहा हो उस समय प्रौढा
स्त्री जिसकी हो वह दाम्पत्य प्रेम का आनन्द भोग करे।

१२४ आनन्द मन्दिर
भजेच्छिवाँ गुडेन सैंधवं यथेष्ट भोजनम् ।
पटोलमौद्भिदं जलं कपित्थ दाडिमीफले ॥
उपोदिकापलांडुनारिकेल तैल सट्टकान् ।
सितोपलामये शरत्सरोजलोचने प्रिये ॥
वर्षा मे हडों का चूर्ण गुड़ में मिलाकर प्रति दिन सोते
समय सेवन करे, सेंधानोन, हलका भोजन, औटाया हुआ पानी
या कुए का ताजा पानी, कैथा, अनार, पोई का शाक, प्याज
(जो खाते हो) नारियल का तेल और मिश्री का सेवन
हितकारी है ।
गरम किया हुआ गाय का दूध मिश्री मिलाकर सेवन करना,
अग्नि के पास बैठ कर अग्नि का सेवन करना, बथुए का शाक
कमलगट्टा, खजूर, बिजौरा, नीबू, मरसा का शाक, तरोई, चूका का
शाक, पके हुए करौंदा, सहतूत, अंजीर कच्चा आम व पका आम,
नारियल, गाय के दूध की खीर, लपसी, पुआ, सांठी चावल,
लाल चावल, जलेबी, पूरी, फेनी, लड्डू इन सब पदार्थों का सेवन
करना वर्षा में हितकारी है ।
वर्षा ऋतु में हानि कारक पदार्थ
नदी या तालाय का पानी पीना, दिन में सोना, गोभी, देढस,
पकी ककड़ी, चिउरा, मोठ, फूट, धूप में बैठना, धूप में चलना,
अधिक परिश्रम करना, रक्खा हुआ ठंडा भोजन करना, नाड़ी

६—छठ को कमर में ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १२५
का शाक, करेले, पालक, सिंघाड़े कसेरू का शाक और भैंस का
दूध हानि कारक है ।
कुसमय भोजन करना, दौड़कर चलना, आगके सामने बैठना,
भारी बोझा उठाना, रात को जगना, डकार, छींक और मल, मूत्र,
उलटी, आंसू आदि रोकना हानि कारक है, इन कारणों से वायु
विकार को प्राप्त होता है जिससे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं । इस-
लिये हानिकर पदार्थों से बचना चाहिए ।
इसलिये आरोग्यता चाहने वालों को वर्षा मे बड़ी सावधानी
से रहना चाहिये ।
शरद् ऋतु का आहार विहार
( आश्विन और कार्तिक शरद ऋतु )
पित्तेन सान्द्रं रुधिरं शरत्सु,
वृद्धिं समागच्छति सूर्यरश्मिभिः ।
तदाशु रक्तं परिमोक्षणीयं,
पानेजलं सारसमुद्दिशन्ति ॥
अर्थात्—पित्त से गाढ़ा हुआ रक्त, शरद मे सूर्य की किरणो
से पिघलकर बढ़ता है इसलिये रुधिर को शान्त करने के लिये
फस्त खोलाना चाहिये ऐसा वैद्यकशास्त्र मे ऋषियों का मत है ।
इस मे नदीं या तालाब का पानी चाहिये ।

१३६ आनन्द मन्दिर
भोज्याः लदा लोहितशालमुद्गा,
गव्यंघृतं चन्द्रकराश्च सेव्याः ।
इक्षोर्विकारा मरिचैश्च भक्ष्याः,
पथ्या सिताढ्या किल सेवनीया ॥
भोजन मे प्रति दिन लाल चावल का भात, मूंग, गायका'
घी, गुड़, मिश्री वतासे आदि और काली मिर्च मिले पदायौँ का
सेवन करना चाहिये और हर्ड का चूर्ण मिश्री मिलाकर सेवन
करना हितकारी है ।
स्थितिः प्रवत्ते रजनीषु कार्या,
घर्मश्च नित्यं परिवर्जनीयः ।
छाया च सेव्या हरितद्रुमाणां,
श्रमं न कुर्यात्प्रयतो मनुष्यः ॥
चन्द्रमा की चांदनी का सेवन हितकारी है । छाये हुए स्थान
में रहना, और धूप से बचते रहना चाहिये हरे हरे वृक्षों
की छाया का सेवन करना चाहिये और इस ऋतु में परिश्रम नहीं
करना चाहिये ।
भूयान्नरः शरदि चन्दनलिप्तगात्रः,
स्त्री शर्कराकथित दुग्धयुता च सेव्या ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १२७
कर्पूर पूगपरिपूर्ण मुखी च कान्ता-
माचुंब्यशीतल कुचां परिरम्य शेते ॥
अर्थात्—शरद में चन्दन लगाकर मिश्री मिला हुआ औटाया
दूध पीकर तथा कपूर सुपारी युक्त बीडा मुख में चबाकर जो
अपनी प्यारी पत्नी का प्रेम सहित आलिंगन चुम्बन कर शयन
करते हैं वे पुरुष धन्य हैं ।
खांड के साथ हर्ड का चूर्ण अथवा आमलों का चूर्ण तथा
गुड के साथ हर्ड का चूर्ण, धनिया सेधा नमक आमले, गोभी
कमलगट्टे, भसीड़े, मुनका, घी, नरियल ये पदार्थ शरद मे
हितकारी हैं ।
कैथा की चटनी, चौलाई का शाक, परवल, खांड, वकरी का
दूध, बथुआ, पोई का शाक, नाड़ी का शाक, मरसा का शाक,
दूध की खीर, शाली और साठी चावल, जलेबी, फेनी, जामुन,
केला की गहर ये सब पदार्थ शरद् में हितकारी हैं । चूके
का शाक, तोरई, सिंघाड़ा, अनार, बिजौरा नीबू, कसेरू, वर्षा
का पानी, नदी का पानी हितकारी हैं ।
गेहूं की रोटी, पूडी, नमकीन पकवानों का सेवन हितकारी
है । शरद् के आरम्भ में जुलाब लेना हितकरी है ।
शरद् पित्त को बढाने वाली है इस कारण पित्तकर पदार्थों
का सेवन न करे इसका ध्यान रक्खे । पीपल, मिरच, भांग,

१२८ आनन्द मन्दिर
लहसुन, हींग, मट्ठा, वैंगन, खिचड़ी, दही, कढ़ी, सरसों का
तैल, सौंफ, खट्टा, चरपरा, कडुवा, गरम, धूप में फिरना, कसरत
करना, गुड़ का सेवन, दिन में सोना, अनियम संभोग करना,
उरद के पदार्थ, रात्रि में जागना, क्रोध और चिन्ता करना ये
शरद में सेवन करने से अनेक रोगों को उत्पन्न करते हैं इसलिये
आरोग्य रहने की इच्छा रखने वालो को ये पदार्थ शरद् में अवश्य
छोड़ देने चाहिये।
आवश्यक सूचना
हेमन्त, शिशिर, वर्षा
इन तीनों ऋतुओ मे मीठा, खट्टा और नमकीन इन तीनों
प्रकार के रसो का प्रति दिन भोजन के साथ कुछ आहार अवश्य
होना चाहिये।
वसन्त ऋतु
वसन्त ऋतु में चरपरे कडुए और कसैले रसों के पदार्थ
प्रति दिन के भोजनों में अवश्य होने चाहिये।
ग्रीष्म ऋतु
ग्रीष्म मे मीठे और पतले पदार्थों का सेवन प्रति दिन के
भोजनो में अवश्य होना चाहिये। इन ऋतुओं मे ये पदार्थ
जठराग्नि को ठीक रखते हैं।

७—सप्तमी को नाभि मे (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १२६
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शरद् ऋतु

शरद् ऋतु में चरपरे स्वादिष्ट और कसैले रसो के पदार्थ
प्रति दिन के भोजनो मे अवश्य खाने चाहिये ।

ऋतुओं के अनुसार
आहार विहार का संक्षिप्त वर्णन

जो मनुष्य सदैव आरोग्य रहना चाहे उनकी आरोग्यता के
लिये हमारे प्राचीन ऋषियो ने आहार विहार के नियम बना दिये
हैं। जब से इस बातका लोगो को ध्यान नही रहा तब से देश में
अनेक रोगों ने डेरा जमालिया, लोग देश का आहार विहार छोडकर
विदेशी आहार विहार का अभ्यास करने लगे। आहार विहार सदैव
अपनी ही जन्म भूमि का आरोग्यता के लिये हितकर होता है उस
के विरुद्ध चलने से अनेक रोगो की उत्पत्ति होती है यही ऋषियों
ने बतलाया है ।

वात पित्त कफ का कोप और शान्ति

जब एक ऋतु समाप्त होकर दूसरी आरम्भ हो तब पहिली
ऋतु के अहार विहार में धीरे धीरे हेर फेर करदेवे और पहला
क्रमशः छोड़ता जावे फिर नई ऋतु का आहार विहार करने लगे ।
इस प्रकार नियस से चलने से प्रति दिन के आहार विहार की
भूल से जो रोग उत्पन्न होते हैं वे नही होने पाते ।

९

१३० आनन्द मन्दिर
जब एक ऋतु समाप्त होकर दूसरी आरम्भ होती है तब वात पित्त
कफ इन तीनो दोषो का क्रमशः धीरे धीरे कोप और शान्ति
होती है इसलिये धीरे धीरे आहार विहार का पहिला नियम छोड़
कर दूसरे का आरम्भ करना चाहिये ।
यदि ऋतुओ का आरम्भ देरी से हो तो देरी से ही आहार
विहार का नियम बदलना चाहिये । मान लीजिये जाड़े की ऋतु
व्यतीत हो जाने पर भी गरमी नही आई और जाड़ा ही है तो
आहार विहार नही बदलना चाहिये ।
नियमित ऋतु के अनुकूल आहार शास्त्र के सम्बन्ध मे
हमारा "पाकशास्त्र" मगाकर पढ़िये । हमारा पाकशास्त्र ५० हजार
की तादाद मे विक चुका है कितने ही संस्करण हो चुके हैं। सब
से पहले आयुर्वेद के अनुसार हमने ही आहार शास्त्र पाकशास्त्र
लिखा था। हमारे देखा देखी अब कितने ही पाकशास्त्र निकले
है पर हमारे पाकशास्त्र का मुकाबला नही कर सके हैं।
और दूसरो का मूल्य भी अधिक है। प्रत्येक वस्तु के संबन्ध मे
स्वास्थ्यकर जितना जिस प्रकार का ज्ञान आवश्यक है, सब
हमारे पाकशास्त्र मे दिया गया है । हमारे पाकशास्त्र मे साधार-
णतया विहार पर भी अच्छा प्रकाश डाला गया है ।

आनन्द
मन्दिर

चौथा अध्याय
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