विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाह विज्ञान-कामशास्त्र ११६
ग्रीष्म ऋतु का आहार विहार
( ज्येष्ठ और आषाढ ग्रीष्मऋतु )
तीक्ष्णांशुरतितीक्ष्णां ग्रीष्मे स छिपनीच यत् ।
प्रत्यहं चीयते श्लेष्मा तेन वायुश्च वर्द्धते ॥
ग्रीष्म मे सूर्य तीक्ष्ण किरण वाला होकर जगन की
चिकनाई को दूर कर देता है अतएव नित्य प्रति कफ क्षीण होता
जाता है और वात की वृद्धि होती है अर्थात् वात चढता है ।
वात को शात करने के लिये इस ऋतु मे मीठे चिकने हलके
और शीतल पतले पदार्थों का सेवन करना, कुएं का ताजा जल
पीना और ताजे जल से स्नान करना, मिश्री मिले जौ के सत्तू,
पुराने चावलो का भात, अनार, खस, गुलाब आदि का शर्बत
अंगूर अनार आदि फल का सेवन, आंवला, सेव, आदि के
मुरब्बे का सेवन करना फूलो की माला धारण करना शरीर मे
चन्दन लगाना अत्यन्त हितकारी है।
गुड़ के साथ हड़ों का चूर्ण प्रतिदिन सेवन करना चाहिये,
मिश्री और गाय का घी मिले ठंडे जल सहित सत्तू पीना हित-
कारी है महीन कोमल सफेद वस्त्रों का पहिनना हितकर है।
शालि चावलों का भात तथा सांठी चावलों का भात, पुराने
जौ और गेहूँ की रोटी, मूंग, मटर, अरहर, मसूर की दाल, कच्चा
तरबूज, कच्ची ककड़ी, कच्चा खीरा, पेठा, करेला बथुआ, पालक,
परवल, चौलाई चूका का शाक ये सब सेवन करना हितकारी है।