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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

११० आनन्द मन्दिर
अर्थात्—कस्तूरी केशर चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों का
शरीर में लेप किये हो और अगर धूप आदि की सुगन्धि से
सुगन्धिन वस्त्र धारण किये हो ऐसी अपनी सुन्दर भार्या को इस
शिशिर मे स्नेह पूर्वक प्यार न किया उस पुरुष का जीवन व्यर्थ गया ।
मन्दं मन्दं दिनान्ते ज्वलति हुतवहः,
पृष्ठतः पार्श्वतो वा ।
धन्यो लोकस्तरुण्याः स्तनजघनपरी-
रंभसंभोगसंगी ॥
अर्थात्—सांयकाल मे मन्द मन्द अग्नि जल रही हो जिससे
आगे पीछे गरमाहट हो रही हो। ऐसे समय मे इस शिशिर मे जो
पुरुष अपनी प्यारी युवती पत्नी के साथ प्रेम और स्नेह से ऊंचे
ऊंचे रूई के गद्दो पर विलास और शयन करते हैं। वे पुरुष धन्य
हैं। उन्ही का दाम्पत्य जीवन प्रेम आनन्द और सुख से व्यतीत
होता है।
क्वापि तैलं सुगन्ध्यं ताम्बूलं तत्तभोज्यं ।
तरुणिविरचितं वासरे शैशिरेऽस्मिन् ॥
कभी तैल की मालिस कराना, कभी सुगन्धियो से शरीर को
तर बतर करना, पानो का चवाना और अपनी प्यारी स्त्री का प्रेम
पूर्वक स्नेह सहित बनाया हुआ गरमागरम भोजन करना इस
शिशिर मे अत्यन्त हितकारी है।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्रः १११
किमिहि बहुभिरुक्तैर्युक्तिशून्यै प्रलापै-
र्द्वयमिह पुरुषाणां सर्वदा सेवनीयम् ।
अभिनवमदलीलालसत्सुन्दरीणां-
स्तनभरपरिखिन्नं यौवनं व वनं वा ॥
अर्थात्—कहते हैं कि व्यर्थ की बकवाद करने से क्या मत-
लव है। इसके विषय में 'अधिक कहना ही व्यर्थ है। इस ससार मे
आकर पुरुष के लिये दो ही वस्तुए सेवन करने योग्य हैं। सुन्दर
हावभाव युक्त अपनी प्यारी स्त्री का प्रेम पूर्वक सेवन करना और
यदि स्त्री न हो तो वनो मे जाकर ईश्वर भजन करके जीवन को
आनन्द पूर्वक व्यीत करना ।
इन शास्त्रकारो के कहे हुए वचनो का जो पालन करते हैं
उन्ही का जीवन सार्थक होता है। जो अपनी प्यारी स्त्री के न
होने पर अथवा होते हुए भी परस्त्री अथवा वेश्याओं से प्रेम करते
हैं उनका जीवन व्यर्थ है इसीलिये महाराजा भर्तृ हरि जी ने कहा है
कि यदि स्त्री से प्रेम न हो तो ईश्वर से प्रेम लगाकर जीवन को
आनन्द पूर्वक वन में रहकर व्यतीत करना चाहिये ।
यदि स्त्री से प्रेम न हो तो ईश्वर भजन मे आनन्द और
सुख ग्राम होता है क्योंकि वन मे रहने वाले ईश्वर भक्तों की भूमि
ही सुन्दर शैय्या है भुजाही सिरहाना तकिया है और विरक्तता
रूपी स्त्री के सग आनन्द से जोवन व्यतीत होता है ।

११२ आनन्द मन्दिर
जो मूर्ख कहते हैं कि—
अभी तो चैन से गुजरती है, आकबत की खुदा जाने।
उन अज्ञानियो को न इस जन्म का ही आनन्द मिलता हैं
न अगले जन्म का। क्योकि इस जन्म से व्यभिचार आदि से
उनके शरीर को आगे चल कर वडा कष्ट मिलता है। बड़े बड़े
राजा महाराजाओ तक को देखा गया है कि व्यभिचार के कारण
तबाह हो गये। सर्वस्व खो बैठे, मान मर्यादा धन सम्पत्ति सब नष्ट
होगई। शरीर का सत्यानाश हो गया। तात्पर्य यह् कि सब प्रकार
से यह् अमूल्य मनुष्य जीवन नष्ट हुआ। इसीप्रकार अगले जन्म
मे भी उन्हे कष्ट भोगना पड़ता है।
वसन्तऋतु का आहार विहार
(चैत और वैशाख वसन्त ऋतु)
कफश्चितोहि शिशिरे वसन्तेऽर्कांशुतापित ।
हत्वाग्निं कुरुते रोगानतस्तं त्वरया जयेत् ॥
अर्थात् शिशिर ऋतु मे संचित हुआ कफ वसन्त ऋतु मे
सूर्य की किरणो से तापित हो पानी के समान पतला होकर जठ-

B.K. Mitra
३—तृतीया को घुटनों मे ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ११३
कफ नाशक उपाय
वैद्यक शास्त्र बतलाता है कि वसन्त में जुलाव लेकर तथा
वमन करके कफ को ठीक करे। भोजन व्यायाम और परिश्रम करे,
वायु सेवन करे। कपूर, केशर और अगर मिले चन्दन को शरीर
में लगावे, सोंठ डालकर औटाया हुआ जल का सेवन करे। खैर
सार चन्दन आदि डालकर औटाया जल तथा पानी मे शहद
मिला कर पीना अत्यन्त हितकारी है और नागर मोथा डालकर
औटाया हुआ पानी ये सब वसन्त में अत्यन्त हितकारी तथा
आरोग्यता को देने वाले हैं।
पुराने जौ गेहूं की रोटी, मूंग की दाल अथवा साबित मूग,
परवल की तरकारी, पुराने चावल का भात, बथुआ कचनार की
कली, चौलाई का शाक, भरभा करेला, घिया तोरई वसन्त मे
सेवन करना हितकारी है।
शहद मिलाकर चार से छै मासे तक बड़ी हर्ड का चूर्ण
प्रतिदिन प्रातःकाल और सोते समय सेवन करना अत्यन्त
हितकारी है। सरसों, चना, मटर सांठी के चावल, कोदो, अरहर,
मसूर की दाल, चूका का शाक, सहजन, बैंगन, सहजन के फूल
का शाक इनका सेवन वसन्त में आरोग्यता को देने वाला अत्यन्त
लाभदायक है।
बावडी या कुएं का पानी, गाय का गरम दूध मिश्री मिला
कर सेवन करना, परिश्रम करना, प्रातःकाल का वायु सेवन,
८

११४ आनन्द मन्दिर
धानों का लावा, सेंधा नमक पड़ा हुआ गाय का मट्ठा, कढ़ी
आदि खाना हितकारी है।
वसन्त ऋतु में हानिकारक पदार्थ
उड़द, दही, आलू, गत्रा, सिंघाडे, बड़ी, मुगौड़ी, पोई का
शाक, खिचडी, तिल, चिउरा, भैंस का दूध, दिन में सोना, खट्टे
पदार्थों का सेवन करना, चिकने गरिष्ठ और घी में पकाए हुए
देरी में पचनेवाले पदार्थों का सेवन करना बसन्त में हानि-
कारक हैं इनका सेवन न करे।
रूक्षं कषायं कटुकं च तिक्तं,
ताम्बूलकर्पूर मनोज्ञवेषम् ।
क्षौद्रेण पथ्या सह सेवनीया,
स्नेहेन तिष्ठेद्दयितासहायः ॥
रूखे, कपैले और कडुए रस और पान कपूर तथा शहद
मिला हर्ड का चूर्ण सेवन करना अत्यन्त हितकारी है। उज्ज्वल
वेष रखना और प्रेम सहित अपनी प्रिय पत्नी के साथ रहना
ये वसन्त में आरोग्यता को देने वाले हैं।
अच्छाच्छचन्दनरसार्द्रकरा मृगाक्ष्यो-
धारागृहाणि कुसुमानि च कौमुदी च ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ११५
मन्दो मरुत्सुमनसः शुचि हर्म्यपृष्ठं,
ग्रीष्मे मदं च मदनं च विवर्द्धयन्ति ॥
अर्थात्—अति स्वच्छ चन्दन के रस से जिन स्त्रियों का
हाथ भीगा है। फुहारे वाले घर में धीमी धीमी सुगन्धित
पुष्पों की वायु और चांदनी रात में मकानों की श्वेत छत, ये
सब सामग्री कामदेव को बढ़ाने वाली है अर्थात् दाम्पत्य प्रेम
को विशेष बढाने वाली हैं। वसन्त में जिन भाग्यवान पुरुषों
को ये सब प्राप्त हैं वे धन्य हैं, पूर्व जन्म के संचित किये हुए
शुभकर्मों से ही पुरुष को ये सब सुख भोगने के पदार्थ इस जन्म
में अपनी प्रिय पत्नी सहित मिलते है। जो इनका सेवन नहीं
करते वे इस अमूल्य मनुष्य जन्म को व्यर्थ खोते हैं। जो इन
पदार्थों को छोड़ व्यभिचार आदि मे फंसकर अपनी प्रिय पत्नी
का निरादर करते हैं वे मनुष्य जन्म का कुछ भी आनन्द नही
पाते। क्योकि कहा है:—
स्रजोह्रद्यामोदा व्यजन पवनश्चन्द्र किरणाः ।
परागः कासारो मलयजरजः सीधु विशदम् ॥
शुचिः सौधोत्सङ्गः प्रतनु वसनं पङ्कजदृशो ।
निदाघे तूर्णं तत्सुखमुपलभन्ते सुकृतिनः ॥
अर्थ—अच्छी सुगन्धित माला, पंखे की वायु, चाँदनी रात,
पुष्पों का पराग, तड़ाग, चन्दन, श्वेत धाम की अच्छी ऊंची छत,

११६ आनन्द मन्दिर
अच्छे मल मल के महीन वस्त्र और कमल नयनी सुन्दर
पत्नी इत्यादि पदार्थों से ग्रीष्म में पुएयवान पुरुष ही सुख
उठाते है ।
सुधाशुभ्रं धाम स्फुरदमलरश्मिः शशिधरः ।
प्रियावक्त्राम्भोजं मलयजरजश्चातिसुरभिः ॥
स्रजो हृद्यासोदस्तदिदमखिलं रागिणिजने ।
करोत्यन्तः क्षोभं न तु विषयसंसर्ग विमुखे ॥
सफेद् अच्छा उज्ज्वल घर और निर्मल चाँदनी का
चन्द्रमा, प्यारी पत्नी का मुखकमल, सुगन्धित चन्दन, अच्छे
सुगन्धित पुष्पों की माला, ये सब वस्तुएं मनुष्य के जीवन सुख
और दाम्पत्य प्रेम की बढ़ाने वाली हैं पुरुषों के हृदय में उत्साह
और प्रेम उत्पन्न करने वाली हैं परन्तु जो पुरुष विषय के संसर्ग
से विमुख हैं उनके हृदय मे नही ।
तात्पर्य यह है कि जो पुरुष ऊपर लिखे सुख दायक पदार्थों
की कदर नही जानते और जिनका अपनी प्यारी भार्या से प्रेम
नहीं है अथवा जो कर्महीन हैं या जो नपुसंकता आदि रोगों में
ग्रसित हैं अथवा जो भाग्य हीन हैं, भार्या को छोड़कर व्यभिचार
आदि मे लिप्त हैं अथवा जो कायर पुरुष गृहस्थी का भार न
उठासकने के कारण मूंड मुड़ाकर गेरुये वस्त्र धारण कर भस्म
रमाकर त्यागी बन गृहस्थी से निकल भागे हैं उनके हृदय में इन
अमूल्य पदार्थों का कुछ भी प्रभाव नही पड़ताः-

४—चौथ की जांच में ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ११७
महात्मा भर्तृहरिजी ने ठीक कहा है:—
स्त्री मुद्रां झषकेतनस्य जननीं,
सर्वार्थ सम्पत्करीं ।
ये मूढाः प्रविहाय यांति कुधियो-
मिथ्याफलान्वेषिणः ।
अर्थात्—स्त्रियां कामदेव की मुद्रा हैं सब अर्थ और सम्पत्ति
की करने वाली हैं अर्थात् सब सुखो की देनेवाली हैं। जो मूढ
कुबुद्धि उन्हें छोड़ कर स्वर्ग पाने की इच्छा से निकल भागते
हैं उन्हें विरक्त के वेष में न समझो ।
ते तेनैव निहत्य निर्दयतरं,
नग्नीकृता मुण्डिताः ।
केचित्पञ्चशिखीकृताश्च जटिलाः,
कापालिकाश्चापरे ॥
किन्तु कामदेव ने दया त्याग कर दंड देकर उन्हें नङ्गा किया
सिर मुड़वाकर किसी के पांच चोटी रखवाई किसी के हाथ में
ठीकरा देकर भीख मगवाई । ऐसे पुरुषों के लिये बसंत ही क्या
कोई ऋतु सुखकारक नहीं है ।
गीतान्त

११८ आनन्द मन्दिर
संवाहितो रणत्कणत्करहस्ततालै-
र्धन्यःस्वहर्म्य समये विचिनोति निद्राम् ॥
बसन्त में जो पहिले गान सुनते। गान सुनने के पश्चात् विधि
पूर्वक अर्थात् आयुर्वेद के कहे अनुसार स्त्री संभोग करते, तथा
स्त्री के साथ प्रेम पूर्वक बडे स्नेह से झूला झूलते और फिर
शयन कर वसन्त की राते व्यतीत करते हैं वे धन्य हैं।
भाग्यवान पुरुष ही वसन्त के इस आनन्द का सुख भोग
करते हैं।
स्निग्धश्चन्दन कुंकुम प्रभृतिभिः कर्पूर संमिश्रितैः ।
शय्यां धूपितधौतवस्त्र रचितामास्थाय रम्ये गृहे ॥
गाढालिङ्गनचुम्बनादिरचितैः संवर्द्धयन्मन्मथं ।
सेवेत्तां प्रमदां वसन्त समयेश्लेष्मक्ष्यार्थं पुमान् ॥
कपूर मिश्रित चन्दन और कुंकुम आदि से स्निग्ध, अगर
की धूनी से धूपित और उज्ज्वल दूध के झाग की समान सफेद
वस्त्रों से सजे हुए बिछे पलग पर जो अपनी प्यारी पत्नी से
प्रेम पूर्वक कामोद्दीपन करते हुए वसन्त मे बढ़े हुए कफ
को शान्त करने के लिये दाम्पत्य सुख का आनन्द भोग
करते हैं वे आरोग्यता से सुख सहित वसन्त को व्यतीत
करते हैं।"इस ऋतु मे स्त्री के साथ जल विहार भी करना चाहिये।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ११६
ग्रीष्म ऋतु का आहार विहार
( ज्येष्ठ और आषाढ ग्रीष्मऋतु )
तीक्ष्णांशुरतितीक्ष्णां ग्रीष्मे स छिपनीच यत् ।
प्रत्यहं चीयते श्लेष्मा तेन वायुश्च वर्द्धते ॥
ग्रीष्म मे सूर्य तीक्ष्ण किरण वाला होकर जगन की
चिकनाई को दूर कर देता है अतएव नित्य प्रति कफ क्षीण होता
जाता है और वात की वृद्धि होती है अर्थात् वात चढता है ।
वात को शात करने के लिये इस ऋतु मे मीठे चिकने हलके
और शीतल पतले पदार्थों का सेवन करना, कुएं का ताजा जल
पीना और ताजे जल से स्नान करना, मिश्री मिले जौ के सत्तू,
पुराने चावलो का भात, अनार, खस, गुलाब आदि का शर्बत
अंगूर अनार आदि फल का सेवन, आंवला, सेव, आदि के
मुरब्बे का सेवन करना फूलो की माला धारण करना शरीर मे
चन्दन लगाना अत्यन्त हितकारी है।
गुड़ के साथ हड़ों का चूर्ण प्रतिदिन सेवन करना चाहिये,
मिश्री और गाय का घी मिले ठंडे जल सहित सत्तू पीना हित-
कारी है महीन कोमल सफेद वस्त्रों का पहिनना हितकर है।
शालि चावलों का भात तथा सांठी चावलों का भात, पुराने
जौ और गेहूँ की रोटी, मूंग, मटर, अरहर, मसूर की दाल, कच्चा
तरबूज, कच्ची ककड़ी, कच्चा खीरा, पेठा, करेला बथुआ, पालक,
परवल, चौलाई चूका का शाक ये सब सेवन करना हितकारी है।

१३० आनन्द मन्दिर
मिश्री मिला हुआ गाय का दूध, गाय का मीठा दही, मलाई
सहित, मिश्री मिला हुआ गाय का मट्ठा इस ऋतु में अत्यन्त
हितकारी है।
सिंघाड़ा, कसेरू, लौकी, गन्ना, पतली खीर, सेमई, माल पुआ,
दुधलपसी, दूध और मिश्री मिली हुई फेनी का सेवन करना और
दूध भात मिश्री का प्रति दिन सेवन करना हितकारी है। कसरत
करना परिश्रम करना प्रात. और सायकाल का वायु सेवन
हितकारी है।
चन्द्रपादा दिवास्वप्नं चन्दनं तरणं जले ।
लघु स्निग्धं द्रवं पथ्यं कायस्था सगुडा हिता ॥
उशीरैश्छादितं गेहं सिक्तैर्नीरैः सुगन्धिभिः ।
शीतलं च तरुच्छाया द्राक्षा चोशीरवीजनम् ॥
दुग्धांश्च प्रसूननि बालाया अधरामृतम् ।
हितान्याहुरयेबाले ग्रीष्मे वेद्या इमानिहि ॥
चन्द्रमा की चांदनी का सेवन, दिन में सोना, चन्दन लगाना,
जल विहार करना, हलके चिकने और पतले पदार्थों का सेवन
करना, गुड मिलाकर हडौं का चूर्ण सेवन करना ।
सुगन्धित जल से छिड़के खस के परदों से आच्छादित घर मे
रहना, शीतल पदार्थ, घने वृक्षों की छाया, खस के पखे, दूध भात,
फूलों की माला और बाला स्त्री का अधरामृत पानकर दाम्पत्य प्रेम

५—पचमी को गुप्तस्थान मे ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
५१६

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---) स (UU-) ज (U-U) स (UU-) त (--U) त (--U) गुरु (-)
Let's check:
1-3: के की कू (---) -> म-गण! PERFECT!
4-6: ज ति का (UU-) -> स-गण! PERFECT!
7-9: न ने च (U-U) -> ज-गण! PERFECT!
10-12: स र सी (UU-) -> स-गण! PERFECT!
13-15: म्ला ना म्बु (--U) -> त-गण! (म्ला is heavy, ना is heavy, म्बु is light! PERFECT!)
16-18: पू र्णा त (--U) -> त-गण! (पू is heavy, र्णा is heavy, त is light! PERFECT!)
19: था (-) -> गुरु! PERFECT!

IT IS 100% SHARDULAVIKRIDITA!
Now let's check Line 2 with Shardulavikridita:
1-3: हं सा मा (---) -> म-गण! (हं heavy, सा heavy, मा heavy)
4-6: न स मा (UU-) -> wait: न (U), स (U), मा (-)! स-गण!
7-9: श्र यं ति (U-U) -> श्र (light U), यं (heavy -), ति (light U)! ज-गण!
IT IS "श्र यं

': the top line is flat. Then 'घ'. There is no e-matra! It looks like "गर्जन्मघमहीध्रकन्दरदरी" or maybe the e-matra didn't print. Wait, could it be "गर्जन्मेघ"? In Hindi translation: "मेघों की गर्जना से". So it definitely translates "मेघ". Let's write "गर्जन्मेघमहीध्रकन्दरदरी" because in OCR/human transcription, missing light strokes in old letterpress are usually restored, or let's write "गर्जन्मघमहीध्रकन्दरदरी"? Actually, wait, let's look at "शस्यावृता":
Wait, under 'व', there is a 'ृ'.
And in line 6:
"भात्येवं पवनस्य कोपनकरी वर्षारृतुः श्रेयसी ॥" or "वर्षाऋतुः"?
Wait, look at that character in line 6:
It is:
'व' 'र्षा'
Then: 'र्ऋ'? Wait, does it have a reph on top of 'ऋ'?
Wait, look at the shape of that letter:
Could it be 'र्ऋतुः'?
Wait, in Sanskrit, "वर्षा" + "ऋतुः" -> if sandhi isn't applied, it's "वर्षाऋतुः".
Why would someone write 'र्ऋतुः'?
Because in Hindi, many people pronounce 'ऋ' as 'ri',

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १२३
सेंधा नमक, काली मिर्च, पडा हुआ गाय का मट्ठा प्रति दिन
सेवन करना चाहिये। पोई का शाक, सहजन की तरकारी,
सहजन के फूल का शाक, लौकी, मूली की तरकारी, खीर और
कुए का पानी पीना हितकारी है।
गुड़ मिलाकर गायका दही, घी मे बनाई गई गाय के दूध
की खीर खाना हितकारी है। ईख का सेवन चीनी का सेवन
लपसी, फेनी, मालपुआ, लड्डू, सेमई, सेवन हितकारी है।
मानं विधाय परिहृत्य पराङ्मुखीभिः,
कादम्बिनी समयगर्जित कातराभिः ।
आलिङ्गितोऽतिरभसातुर कामिनीभि-
र्धन्यः स्वहर्म्य समये विचिनोति निद्राम् ॥
अर्थात्—मान करके विमुख माननी स्त्री अपने प्यारे पति
से अलग होकर अर्थात् रूठकर मुह फेर कर बैठ गई उसी समय
मेघो के उमड घुमड़ कर गर्जने से और बिजली के भयानक शब्द
से भयभीत होकर अर्थात् बिजली की कड़कडाहट से डरकर
दौड़कर पति के लिपट गई इस प्रकार इस वर्षा मे जो पुरुष
अपने घर में दाम्पत्यप्रेम का आनन्द लेते हैं वे धन्य हैं।
अये बाले भजेन्नारीं प्रौढां मेघे सुगर्जति ।
वर्षा मे जिस समय बादल गर्ज रहा हो उस समय प्रौढा
स्त्री जिसकी हो वह दाम्पत्य प्रेम का आनन्द भोग करे।