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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

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पृष्ठ 188

विवाह विज्ञान-कामशास्त्रः १११
किमिहि बहुभिरुक्तैर्युक्तिशून्यै प्रलापै-
र्द्वयमिह पुरुषाणां सर्वदा सेवनीयम् ।
अभिनवमदलीलालसत्सुन्दरीणां-
स्तनभरपरिखिन्नं यौवनं व वनं वा ॥
अर्थात्—कहते हैं कि व्यर्थ की बकवाद करने से क्या मत-
लव है। इसके विषय में 'अधिक कहना ही व्यर्थ है। इस ससार मे
आकर पुरुष के लिये दो ही वस्तुए सेवन करने योग्य हैं। सुन्दर
हावभाव युक्त अपनी प्यारी स्त्री का प्रेम पूर्वक सेवन करना और
यदि स्त्री न हो तो वनो मे जाकर ईश्वर भजन करके जीवन को
आनन्द पूर्वक व्यीत करना ।
इन शास्त्रकारो के कहे हुए वचनो का जो पालन करते हैं
उन्ही का जीवन सार्थक होता है। जो अपनी प्यारी स्त्री के न
होने पर अथवा होते हुए भी परस्त्री अथवा वेश्याओं से प्रेम करते
हैं उनका जीवन व्यर्थ है इसीलिये महाराजा भर्तृ हरि जी ने कहा है
कि यदि स्त्री से प्रेम न हो तो ईश्वर से प्रेम लगाकर जीवन को
आनन्द पूर्वक वन में रहकर व्यतीत करना चाहिये ।
यदि स्त्री से प्रेम न हो तो ईश्वर भजन मे आनन्द और
सुख ग्राम होता है क्योंकि वन मे रहने वाले ईश्वर भक्तों की भूमि
ही सुन्दर शैय्या है भुजाही सिरहाना तकिया है और विरक्तता
रूपी स्त्री के सग आनन्द से जोवन व्यतीत होता है ।