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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ११५
मन्दो मरुत्सुमनसः शुचि हर्म्यपृष्ठं,
ग्रीष्मे मदं च मदनं च विवर्द्धयन्ति ॥
अर्थात्—अति स्वच्छ चन्दन के रस से जिन स्त्रियों का
हाथ भीगा है। फुहारे वाले घर में धीमी धीमी सुगन्धित
पुष्पों की वायु और चांदनी रात में मकानों की श्वेत छत, ये
सब सामग्री कामदेव को बढ़ाने वाली है अर्थात् दाम्पत्य प्रेम
को विशेष बढाने वाली हैं। वसन्त में जिन भाग्यवान पुरुषों
को ये सब प्राप्त हैं वे धन्य हैं, पूर्व जन्म के संचित किये हुए
शुभकर्मों से ही पुरुष को ये सब सुख भोगने के पदार्थ इस जन्म
में अपनी प्रिय पत्नी सहित मिलते है। जो इनका सेवन नहीं
करते वे इस अमूल्य मनुष्य जन्म को व्यर्थ खोते हैं। जो इन
पदार्थों को छोड़ व्यभिचार आदि मे फंसकर अपनी प्रिय पत्नी
का निरादर करते हैं वे मनुष्य जन्म का कुछ भी आनन्द नही
पाते। क्योकि कहा है:—
स्रजोह्रद्यामोदा व्यजन पवनश्चन्द्र किरणाः ।
परागः कासारो मलयजरजः सीधु विशदम् ॥
शुचिः सौधोत्सङ्गः प्रतनु वसनं पङ्कजदृशो ।
निदाघे तूर्णं तत्सुखमुपलभन्ते सुकृतिनः ॥
अर्थ—अच्छी सुगन्धित माला, पंखे की वायु, चाँदनी रात,
पुष्पों का पराग, तड़ाग, चन्दन, श्वेत धाम की अच्छी ऊंची छत,