वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६७
प्रेङ्खोलिखितक—झूले के समान हिलती हुई जांघों को चारों ओर घुमाना
'प्रेङ्खोलिखितक' कहलाता है।
युक्तयन्त्रैव ललाटे ललाटं निधाय विश्राम्येत ॥ ३७ ॥
विश्रामविधि—थक जाने पर स्त्री यन्त्रयोग किये हुए ही पुरुष के मस्तक पर अपना
मस्तक रखकर विश्राम कर ले ॥ ३७ ॥
विश्रान्तायां च पुरुषस्य पुनरावर्तनम् । इति पुरुषायितानि ॥ ३८ ॥
पुरुष के ऊपर आने का समय—यदि स्त्री की तृप्ति न हुई हो, तो थक जाने पर स्त्री
नीचे आ जाये और पुरुष ऊपर आकर समागम करे। विपरीत रति का प्रकरण पूर्ण
हुआ ॥ ३८ ॥
भवन्ति चात्र श्लोका:—
प्रच्छादितस्वभावापि गूढाकारापि कामिनी।
विवृणोत्येव भावं स्वं रागादुपरिवर्तिनी ॥ ३९ ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक हैं—जो कामिनी शील और सङ्कोच के कारण अपने
भावों को छिपाये रखती है, वह भी कामातुरा होकर विपरीत रति में अपने वास्तविक स्वरूप को
प्रकट कर देती है ॥ ३९ ॥
यथाशीला भवेन्नारी यथा च रतिलालसा।
तस्या एव विचेष्टाभिस्तत्सर्वमुपलक्षयेत् ॥ ४० ॥
जिस स्त्री का जैसा शील और जैसी रतिलालसा—कामवासना—हो, विपरीत रति की
चेष्टाओं से पति को वह सब जान लेना चाहिये, जिससे बाद में तदनुकूल व्यवहार किया जा
सके ॥ ४० ॥
न त्वेवतौं न प्रसूतां न मृगीं न च गर्भिणीम्।
न चातिव्यायतां नारीं योजयेत् पुरुषायिते ॥ ४१ ॥
विपरीत रति के अनुपयुक्त पात्र—रजस्वला, प्रसूता, मृगी, गर्भवती और मोटी स्त्री को
विपरीत रति में नियुक्त नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥
पुरुषायितप्रकरण नामक अष्टम अध्याय सम्पन्न ॥
नवम अध्याय
औपरिष्टकप्रकरण
द्विविधा तृतीया प्रकृतिः स्त्रीरूपिणी पुरुषरूपिणी च ॥ १ ॥
नपुंसक के भेद—नपुंसक दो प्रकार के होते हैं—एक स्त्रीरूपधारी, और दूसरा
पुरुषरूपधारी ॥ १ ॥
६८ वात्स्यायन-कामसूत्र
तत्र स्त्रीरूपिणी स्त्रिया वेषमालापं लीलां भावं मृदुत्वं भीरुत्वं
मुग्धतामसहिष्णुतां व्रीडां चानुकुर्वीत ॥ २ ॥
स्त्रीरूपधारी नपुंसक—इनमें जो स्त्रीरूपधारी नपुंसक (हिजड़ी) है, उसे स्त्रियों की
वेषभूषा, बोलचाल, लीला, भाव, मृदुता, भीरुता, मुग्धता, असहिष्णुता और सलज्जता का
अनुकरण करना चाहिये ॥ २ ॥
तस्या वदने जघनकर्म। तदौपरिष्टकमाचक्षते ॥ ३ ॥
नपुंसक के मुख में जो मैथुनकर्म किया जाता है, उसे ही औपरिष्टक कहते हैं ॥ ३ ॥
सा ततो रतिमाभिमानिकीं वृत्तिं च लिप्सेत् ॥ ४ ॥
औपरिष्टक का फल—ऐसी हिजड़ी आलिङ्गन, चुम्बन, कुचमर्दन आदि उपक्रियाओं
से आभिमानिकी (सङ्कल्पमात्र से होने वाली) रति का सुख प्राप्त करें, और औपरिष्टक कर्म द्वारा
अपनी जीविका भी चलाये, अर्थात् आलिङ्गन आदि उसकी सुखानुभूति के साधन हैं और
औपरिष्टक कर्म जीविका का साधन है ॥ ४ ॥
वेश्यावच्चरितं प्रकाशयेत्। इति स्त्रीरूपिणी ॥ ५ ॥
चरित—इसे वेश्या के समान ही आचरण करना चाहिये। स्त्रीरूपधारी नपुंसक
(हिजड़ी) का प्रसङ्ग पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
पुरुषरूपिणी तु प्रच्छन्नकामा पुरुषं लिप्समाना संवाहकभावमुपजीवेत् ॥ ६ ॥
पुरुषरूपधारी नपुंसक—पुरुषरूपधारी (हिजड़ा) पुरुष जैसी आकृति होने के कारण
अपनी कामनाओं को छिपाये रखता है, किन्तु रति के लिये चाहता पुरुष को ही है, अतएव उसे
मर्दन और संवाहन (मालिश और हाथ-पैर दबाना) का कार्य करना चाहिये ॥ ६ ॥
संवाहने परिष्वजमानेव गात्रैरूरू नायकस्य मृद्नीयात् ॥ ७ ॥
संवाहन कर्म में अपने शरीर से लगाते हुए ही नायक की जाँघें दबानी चाहिये ॥ ७ ॥
प्रसृतपरिचया चोरुमूलं सजघनमिति संस्पृशेत् ॥ ८ ॥
धीरे धीरे जब परिचय बढ़ जाये, तो नायक की जाँघों और उसकी सन्धियों को भी दबाना
और मसलना चाहिये ॥ ८ ॥
तत्र स्थिरलिङ्गतामुपलभ्य चास्य पाणिमन्थेन परिघट्टयेत्। चापलमस्य
कुत्सयन्तीव हसेत् ॥ ९ ॥
इस प्रकार मर्दन और संवाहन से यदि नायक का शिश्न दृढ़ एवं स्थिर हो जाये, तो उसे
हस्तक्रिया द्वारा इधर उधर करे और उसकी चपलता का उपालम्भ देता (निन्दा करता) हुआ
हँसे ॥ ९ ॥
कृतलक्षणेनाप्युपलब्धवैकृतेनापि न चोद्यत इति चेत् स्वयमुपक्रमेत् ॥ १० ॥
जिसे इस प्रकार कामोद्रिक्त कर दिया गया है, और जो नपुंसक (हिजड़ा) के विषय में
यह जान गया है कि यह मुखमैथुन कराता है, यदि तब भी वह शिश्न को मुख में लेने की बात
न कहे, तो नपुंसक को स्वयं ही अग्रसर होना चाहिये, अर्थात् उसका शिश्न मुख में लेकर
औपरिष्टक कर्म प्रारम्भ कर देना चाहिये ॥ १० ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६९
पुरुषेण च चोद्यमाना विवदेत्। कृच्छ्रेण चाभ्युपगच्छेत्॥ ११॥
यदि नायक पहले ही नपुंसक से मुखमैथुन के लिए कहे, तो नपुंसक को उससे विवाद
करना चाहिये और बहुत कठिनाई से मुखमैथुन कराये॥ ११॥
तत्र कर्माष्टविधं समुच्चयप्रयोज्यम्॥ १२॥
औपरिष्टक के भेद—क्रिया के भेद से औपरिष्टक के भी कई भेद हो जाते हैं। उन्हें
बताते हैं—यह औपरिष्टक कर्म आठ प्रकार का है। इनका क्रमशः प्रयोग करना चाहिये॥ १२॥
निमितं पार्श्वतोदष्टं बहिःसंदंशोऽन्तःसंदंशश्चुम्बितकं परिमृष्टकमाग्रचूषितकं
सङ्गर इति॥ १३॥
निमित, पार्श्वतोदष्ट, बहिसन्दंश, अन्तःसन्दंश, चुम्बितक, परिमृष्टक, चूषितक और
सङ्गर—औपरिष्टक की ये आठ क्रियाएँ हैं॥ १३॥
तेष्वेकैकमभ्युपगम्य विरामाभीप्सां दर्शयेत्॥ १४॥
नपुंसक इन आठ क्रियाओं में से क्रमशः एक एक को करता हुआ निवृत्त होने की इच्छा
करे, जिससे नायक चकित होकर अनुनय विनय करे॥ १४॥
इतरश्च पूर्वस्मिन्नभ्युपगते तदुत्तरमेवापरं निर्दिशेत्। तस्मिन्नपि सिद्धे
तदुत्तरमिति॥ १५॥
नायक को चाहिये कि एक क्रिया के पूर्ण होने पर दूसरी को करने के लिये कहे, और
उसके पूर्ण होने पर तीसरी को करने के लिए कहे॥ १५॥
करावलम्बितमोष्ठयोरुपरि विन्यस्तमपविध्य मुखं विधुनुयात्। तन्निमि-
तम्॥ १६॥
निमित—ओष्ठों को गोल-गोल बनाकर, हाथ में लिये हुए शिश्न को उस पर रख ले,
और मुख हिलाये—इसे निमित कहते हैं॥ १६॥
हस्तेनाग्रमवच्छाद्य पार्श्वतो निर्दशनमोष्ठाभ्यामवपीड्य भवत्वेतावदिति
सान्त्वयेत्। तत्पार्श्वतोदष्टम्॥ १७॥
पार्श्वतोदष्ट—शिश्न के अग्रभाग को हाथ से ढककर, पार्श्व में दाँत न लगाकर, केवल
ओष्ठों से दबाकर यह कह दे कि अब इतना ही करना है, तो उसे पार्श्वतोदष्ट कहते हैं॥ १७॥
भूयश्चोदिता सम्मीलितौष्ठी तस्याग्रं निष्पीड्य कर्षयन्तीव चुम्बेत्। इति
बहिःसंदंशः॥ १८॥
बहिःसन्दंश—यदि नायक फिर भी करने का आग्रह करे, तो उसके शिश्न के अग्रभाग
को मुख में लेकर, दोनों ओष्ठों से दबाकर खींचता हुआ सा चूमे—इसे बहिःसन्दंश कहते
हैं॥ १८॥
तस्मिन्नेवाभ्यर्थनया किञ्चिदधिकं प्रवेशयेत्। सापि चाग्रमोष्ठाभ्यां निष्पीड्य
निष्ठीवेत्। इत्यन्तःसंदंशः॥ १९॥
अन्तःसन्दंश—नायक के पुनः आग्रह करने पर शिश्न का कुछ अधिक भाग मुख में ले
७० वात्स्यायन-कामसूत्र
ले, और उसके अग्रभाग को ओष्ठों से कुछ दबाकर उगल दे—यह 'अन्तःसंदंश' कहलाता
है॥ १९॥
करावलम्बितस्यौष्ठवद् ग्रहणं चुम्बितकम्॥ २०॥
चुम्बितक—हाथ में लिये हुए शिश्न को अधरपान के समान, ओष्ठों से चूमना चुम्बितक
कहलाता है॥ २०॥
तत्कृत्वा जिह्वाग्रेण सर्वतो घट्टनमग्रे च व्यधनमिति परिमृष्टकम्॥ २१॥
परिमृष्टक—चुम्बितक की क्रिया करके, शिश्न पर जिह्वा को रगड़ना और शिश्न के
छिद्र पर जिह्वा के अग्रभाग को बार बार मारना या दबाना परिमृष्टक कहलाता है॥ २१॥
तथाभूतमेव रागवशादर्धप्रविष्टं निर्दयमवपीड्यावपीड्य मुञ्चेत्। इत्याप्र-
चूषितकम्॥ २२॥
आम्रचूषितक—यदि राग बढ़ जाने के कारण नायक शिश्न को यों ही नपुंसक के मुख
में आधा डाल दे, और वह ओष्ठों से बार बार दबाकर छोड़ दे, तो यह आप्रचूषितक कहलाता
है॥ २२॥
पुरुषाभिप्रायादेव गिरेत् पीडयेच्चापरिसमाप्तेः। इति सङ्गरः॥ २३॥
सङ्गर—नायक की इच्छानुसार शिश्न को मुख में लेकर स्खलनपर्यन्त दबाने को सङ्गर
कहते हैं॥ २३॥
यथार्थं चात्र स्तननप्रहणनयोः प्रयोगः। इत्यौपरिष्टकम्॥ २४॥
औपरिष्टक के सीत्कार और प्रहणन—औपरिष्टक की क्रियाओं में नपुंसक को राग के
अनुरूप ही सीत्कार और प्रहणन का प्रयोग भी करना चाहिये। औपरिष्टक का विधान पूर्ण
हुआ॥ २४॥
कुलटाः स्वैरिण्यः परिचारिकाः संवाहिकाश्चाप्येतत् प्रयोजयन्ति॥ २५॥
नपुंसक के अतिरिक्त औपरिष्टक के विषय—कुलटा, स्वैरिणी (व्यभिचारिणी),
परिचारिका और संवाहिका स्त्रियाँ भी औपरिष्टक कर्म कराती हैं॥ २५॥
तदेतत्तु न कार्यम्; समयविरोधादसभ्यत्वाच्च। पुनरपि ह्यासां वदनसंसर्गे
स्वयमेवार्तिं प्रपद्येत। इत्याचार्याः॥ २६॥
आचार्यों का अभिमत—इस औपरिष्टक कर्म को कदापि नहीं करना चाहिये, क्योंकि
शास्त्र भी इसका निषेध करता है और यह कर्म शिष्टजन-सम्मत भी नहीं है। कुलटा आदि
नायिकाओं के साथ मुखमैथुन कर, पुनः रागवश मुखचुम्बन करने पर स्वयं भी दुःख होता है—
ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है॥ २६॥
वेश्याकामिनोऽयमदोषः। अन्यतोऽपि परिहार्यः स्यात्। इति
वात्स्यायनः॥ २७॥
वात्स्यायन की व्यवस्था—वेश्यागामियों के लिये यह दोषपूर्ण नहीं है, इसके अतिरिक्त
जो अन्य दोष कहे गये हैं, उनका भी परिहार सम्भव है—यह महर्षि वात्स्यायन का मत
है॥ २७॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ७१
तस्माद्यास्त्वौपरिष्टकमाचरन्ति न ताभिः सह संसृज्यन्ते प्राच्याः ॥ २८ ॥
देशाचार के रूप में प्रवृत्ति—इसी कारण प्राच्य देशवासी उन वेश्याओं (कुलटा आदि
भी) के साथ समागम नहीं करते, जो मुखमैथुन कराती हैं ॥ २८ ॥
वेश्याभिरेव न संसृज्यन्ते आहिच्छत्रिकाः संसृष्टा अपि मुखकर्म तासां
परिहरन्ति ॥ २९ ॥
अहिच्छत्र देशवासी वेश्यागमन ही नहीं करते, और यदि कोई करता भी है, तो वह वेश्या
के मुख का चुम्बन नहीं करता ॥ २९ ॥
निरपेक्षाः साकेताः संसृज्यन्ते ॥ ३० ॥
अवध (साकेत) वासी पवित्रता, अपवित्रता का ध्यान रखे बिना स्वच्छन्द वेश्यागमन
करते हैं ॥ ३० ॥
न तु स्वयमौपरिष्टकमाचरन्ति नागरकाः ॥ ३१ ॥
पाटलिपुत्र (पटना) के निवासी स्वेच्छा से मुखमैथुन नहीं करते ॥ ३१ ॥
सर्वमविशङ्कया प्रयोजयन्ति सौरसेनाः ॥ ३२ ॥
सूरसेन (कौशाम्बी के दक्षिण तट) के निवासी समागम, मुखमैथुन और मुखचुम्बन—
सभी काम निःशङ्क भाव से करते हैं ॥ ३२ ॥
एवं ह्याहुः—को हि योषितां शीलं शौचमाचारं चरित्रं प्रत्ययं वचनं वा
श्रद्धातुमर्हति! निसर्गादेव हि मलिनदृष्टयो भवन्त्येता न परित्याज्याः। तस्मादासां
स्मृतित एव शौचमन्वेष्टव्यम्। एवं ह्याहुः—
'वत्सः प्रस्त्रवणे मेध्यः श्वा मृगग्रहणे शुचिः ।
शकुनिः फलपाते तु स्त्रीमुखं रतिसङ्गमे॥' इति ॥ ३३ ॥
स्त्रियों की अपवित्रता—इसी कारण कहा गया है कि ऐसा कौन है जो स्त्रियों के शील,
शौच (पवित्रता), आचार, चरित्र, विश्वास और वचन पर श्रद्धा करेगा, क्योंकि ये स्वभाव से ही
मलिन बुद्धि वाली होती हैं, तथापि ये त्याज्य (छोड़ने योग्य) नहीं हैं। अतएव इनकी पवित्रता
लोक और शास्त्र के अतिरिक्त खोजनी चाहिये! स्मृतिकारों ने कहा है—
'दूध निकालते समय बछड़े का मुख पवित्र होता है, मृगों को पकड़ते समय कुत्ते का मुख
पवित्र होता है, फल गिराते समय पक्षी का मुख पवित्र होता है और समागमकाल में स्त्री का
मुख पवित्र होता है।' इस प्रकार समागमकाल में स्त्री का मुख पवित्र माना जाता है ॥ ३३ ॥
शिष्टविप्रतिपत्तेः स्मृतिवाक्यस्य च सावकाशत्वाद्देशस्थितेरात्मनश्च वृत्तिप्रत्य-
यानुरूपं प्रवर्तेत—इति वात्स्यायनः ॥ ३४ ॥
वात्स्यायन की व्यवस्था—शिष्टजन स्त्रियों के मुखचुम्बन के विरुद्ध हैं और स्मृतिवाक्य
समागमकाल में मुखचुम्बन की अनुमति देते हैं। अतएव जहाँ जैसा देशाचार ही और जैसी
अपनी प्रवृत्ति और आस्था हो, उसके अनुरूप ही व्यवहार करना चाहिये—यह महर्षि
वात्स्यायन का मत है ॥ ३४ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
७२ वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रमृष्टकुण्डलाश्रापि युवानः परिचारकाः ।
केषाञ्चिदेव कुर्वन्ति नराणामौपरिष्टकम् ॥ ३५ ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
विशिष्ट औपरिष्टक—कानों में कुण्डल धारणकर और साज-सज्जा से रहने वाले कुछ
युवक और परिचारक भी औपरिष्टक कर्म करते हैं ॥ ३५ ॥
तथा नागरकाः केचिदन्योन्यस्य हितैषिणः ।
कुर्वन्ति रूढविश्वासाः परस्परपरिग्रहम् ॥ ३६ ॥
इसी प्रकार कुछ कामुक नागरक भी परस्पर हितैषी एवं विश्वस्त सहचर बनकर एक-
दूसरे के साथ औपरिष्टक कर्म करते हैं ॥ ३६ ॥
पुरुषाश्च तथा स्त्रीसु कर्मैतत्किल कुर्वते ।
व्यासस्तस्य च विज्ञेयो मुखचुम्बनवद्विधिः ॥ ३७ ॥
कोई-कोई पुरुष भी स्त्री के साथ औपरिष्टक कर्म करते हैं। स्त्री के साथ पुरुष की
औपरिष्टक की विधि तो यही हो सकती है कि पुरुष मुख से स्त्री की योनि का चुम्बन
करे ॥ ३७ ॥
परिवर्तितदेहौ तु स्त्रीपुंसौ यत् परस्परम् ।
युगपत् सम्प्रयुज्येते स कामः काकिलः स्मृतः ॥ ३८ ॥
स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं में मुख करके लेट जायें, और स्त्री, पुरुष
के शिश्न का मुख से चुम्बन करे और पुरुष उसके मदनमन्दिर का। एक साथ सम्पन्न होने वाले
इस औपरिष्टक को काकिल कहते हैं ॥ ३८ ॥
तस्माद् गुणर्बतस्त्यक्त्वा चतुराँस्त्यागिनो नरान् ।
वेश्याः खलेषु रज्यन्ते दासहस्तिपकादिषु ॥ ३९ ॥
इसी कारण वेश्याएँ गुणवान् चतुर और त्यागी पुरुषों को छोड़कर दास, महावत आदि
खल पुरुषों में अधिक अनुरक्त होती हैं ॥ ३९ ॥
न त्वेतद् ब्राह्मणो विद्वान्मन्त्री वा राजधूर्धरः ।
गृहीतप्रत्ययो वापि कारयेदौपरिष्टकम् ॥ ४० ॥
इस औपरिष्टक कर्म को विद्वान् ब्राह्मण या राज्यकार्य के निर्वाहक मन्त्री (राजम-त्री)
अथवा लोक में सम्मान्य व्यक्ति को कदापि नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥
न शास्त्रमस्तीत्येतावत् प्रयोगे कारणं भवेत् ।
शास्त्रार्थान् व्यापिनो विद्यात् प्रयोगाँस्त्वेकदेशिकान् ॥ ४१ ॥
शास्त्र की व्यापकता और प्रयोगों की एकदेशीयता—'इस बात को शास्त्र कहता
है'—यही प्रयोगों का कारण नहीं होना चाहिये; क्योंकि शास्त्र का विषय तो व्यापक हुआ करता
है, उसमें शुभ अशुभ सभी विषय वर्णित होते हैं, लेकिन प्रयोग सीमित और एकदेशीय ही हुआ
करते हैं ॥ ४१ ॥
रसवीर्यविपाका हि श्वमांसस्यापि वैद्यके ।
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ७३
कीर्तिता इति तत्किं स्याद् भक्षणीयं विचक्षणैः ॥ ४२ ॥
आयुर्वेद में कुत्ते के मांस को सरस और वीर्यवर्धक बताया गया है, किन्तु क्या इससे
विचारशील व्यक्ति को कुत्ते का मांस खा लेना चाहिये ! ॥ ४२ ॥
सन्त्येव पुरुषाः केचित् सन्ति देशास्तथाविधाः ।
सन्ति कालाश्च येष्वेते योगा न स्युर्निरर्थकाः ॥ ४३ ॥
विवेचन की सार्थकता—कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, कुछ ऐसे भी देश होते हैं, और
कुछ ऐसा समय भी होता है जिनके लिये ये लोग निरर्थक नहीं, बल्कि उपयोगी हो हैं ॥ ४३ ॥
तस्माद्देशं च कालं च प्रयोगं शास्त्रमेव च ।
आत्मानं चापि संप्रेक्ष्य योगान्युञ्जीत वा न वा ॥ ४४ ॥
प्रयोक्ता के विचारणीय विषय—अतएव देश, काल, व्यवहार, शास्त्र और अपने को
देखकर जो विधि एवं योग शिष्ट एवं ग्राह्य हों, उन्हें ही प्रयोग करें अर्थात् जो विधि एवं प्रयोग
अशिष्ट एवं अग्राह्य हैं, उन्हें त्याग दे ॥ ४४ ॥
अर्थस्यास्य रहस्यत्वाच्चलत्वान्मनसस्तथा ।
कः कदा किं कुतः कुर्यादिति को ज्ञातुमर्हति ॥ ४५ ॥
यह औपरिष्टक कर्म नितान्त एकान्त में किया जाता है, और गुप्त ही रखा जाता है। मन
अत्यन्त चंचल है। अतएव कौन व्यक्ति, किस कारण से, कब, क्या कर डाले—इसे कौन जान
सकता है ! ॥ ४५ ॥
औपरिष्टक प्रकरण नामक नवम अध्याय सम्पन्न ॥
●
दशम अध्याय
रतारम्भावसानिकप्रकरण
नागरकः सह मित्रजनेनं परिचारकैश्च कृतपुष्पोपहारे सञ्चारितसुरभिधूपे
रत्यावासे प्रसाधिते वासगृहे कृतस्नानप्रसाधनां युक्त्यापीतां स्त्रियं सान्त्वनैः पुनः
पानेन चोपक्रमेत् ॥ १ ॥
१. सुरत के प्रारम्भ के कृत्य—नागरक अपने पीठमर्द, विट एवं विदूषक आदि मित्रों
और सेवकों द्वारा पुष्पमालाओं से सज्जित एवं सुगन्धित धूप से धूपित रतिकक्ष में स्त्री के साथ
बैठे, जो स्नान एवं शृङ्गार किये हुए हो, वस्त्राभूषणों से सज्जित हो, और हल्का मद्यपान भी
किये हो। नागरक पहले स्त्री से कुशलक्षेम पूछे, और फिर विनयपूर्वक उससे मद्यपान के लिये
कहे ॥ १ ॥
दक्षिणतश्चास्या उपवेशनम्। केशहस्ते वस्त्रान्ते नीव्यामित्यवलम्बनम्। रत्यर्थं
सव्येन बाहुनानुद्धतः परिष्वङ्गः ॥ २ ॥
७४ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायिका की दाहिनी ओर बैठे। उसके केशपाश को सहलाये, उसके वस्त्रों पर हाथ फेरे,
बाद में उसके (नीवी नाड़े) पर हाथ लगाये। अनुरागवर्धन हेतु बायें हाथ से स्निग्ध-सौम्य
आलिङ्गन करे॥ २ ॥
पूर्वप्रकरणसंबद्धैः परिहासानुरागैर्वचोभिरनुवृत्तिः। गूढाश्लीलानां च वस्तूनां
समस्या परिभाषणम्॥ ३॥
हास-परिहास और अनुराग-कथाओं से सम्बद्ध पुरातन बातों को कहे, और फिर वैसा ही
प्रेमालाप प्रारम्भ कर दे। गूढ़ और अश्लील बातों को संक्षेप में कहे॥ ३॥
सनृत्तमनृत्तं वा गीतं वादित्रम्। कलासु सङ्कथाः। पुनः पानेनोपच्छन्दनम्॥ ४॥
नृत्य के साथ या नृत्य के बिना गाना-बजाना हो, ललित कलाओं पर चर्चा हो, और फिर
मद्यपान कर उसे प्रोत्साहित करना चाहिये॥ ४॥
जातानुरागायां कुसुमानुलेपनताम्बूलदानेन च शेषजनविसृष्टिः। विजने च
यथोक्तैरालिङ्गनादिभिरेनामुद्धर्षयेत्। ततो नीवीविश्लेषणादि यथोक्तमुपक्रमेत्।
इत्ययं रतारम्भः॥ ५॥
नायिका में अनुराग उत्पन्न हो जाने पर पुष्पमाला, सुगन्धित द्रव्य (इत्र) और ताम्बूल
देकर शेष व्यक्तियों—मित्रों एवं सेवकों—को विदा कर दे, और निर्जन रतिकक्ष में पूर्वोक्त
आलिङ्गन, चुम्बन आदि करता हुआ, उसे कामोत्तेजित करे, तदुपरान्त नीवीबन्धन को खोले—
यह सुरत से पूर्व की विधि है॥ ५॥
रतावसानिकं रागमतिबाह्यासंस्तुतयोरिव सव्रीडयोः परस्परमपश्यतोः
पृथक्पृथगाचारभूमिगमनम्। प्रतिनिवृत्य चाव्रीडायमानयोरुचितदेशोपविष्टयो-
स्ताम्बूलग्रहणमच्छीकृतं चन्दनमन्यद्वानुलेपनं तस्या गात्रे स्वयमेव निवेशयेत्॥ ६॥
२. सुरत के समापन के कार्य—समागम कर चुकने के बाद, रतिसुख का अनुभव
करके, दोनों अपरिचितों के समान पृथक्-पृथक् संकुचित होते हुए, एक-दूसरे को न देखते हुए
शौचालयों को जायें, और वहाँ मूत्रत्याग और गुह्याङ्गों की शुद्धि करें। वहाँ से लौटकर,
लज्जाभाव को त्यागकर, शय्या के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर बैठकर दोनों ताम्बूल का
सेवन करें। चन्दन या किसी अन्य वस्तु का अनुलेपन एक दूसरे के शरीर पर लगायें॥ ६॥
सव्येन बाहुना चैनां परिरभ्य चषकहस्तः सान्त्वयन् पाययेत्। जलानुपानं वा
खण्डखाद्यकमन्यद्वा प्रकृतिसात्म्ययुक्तमुभावप्युपयुञ्जीयाताम्॥ ७॥
और फिर दाहिने हाथ में मद्य लेकर, बायें हाथ से नायिका का आलिङ्गन करे, और उसे
सान्त्वना देकर पिलाये अथवा खाँड़ से निर्मित जलपान या प्रकृति के अनुरूप जो भी उचित हो,
उसका दोनों जलपान करें॥ ७॥
अच्छरसकयूषमम्लयवागूं भृष्टमांसोपदंशानि पानकानि चूतफलानि शुष्क-
मांसं मातुलुङ्गचुक्रकाणि सशर्कराणि च यथादेशसात्म्यं च। तत्र मधुरमिदं मृदु
विशदमिति च विदश्य विदश्य तत्तदुपाहरेत्॥ ८॥
अच्छ, रसक, यूष, अम्ल यवागू, वे पेय पदार्थ जिनके साथ भुना हुआ मांस खाया जाता
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ७५
हैं, पका आम, सूखा मांस, चीनी बुरके हुए बिजौरे नीबू के टुकड़े—इनमें जो भी देश और
अपनी प्रकृति के अनुकूल पड़े, उन्हें सेवन करे। नायक यह कह कहकर खाद्य पदार्थ नायिका
को देता जाये कि यह बहुत मीठा है, यह बहुत सुन्दर और बड़ा है, इसे खाओ ॥ ८ ॥
हर्म्यतलस्थितयोर्वा चन्द्रिकासेवनार्थमासनम्। तत्रानुकूलाभिः
कथाभिरनुवर्तेत। तदङ्कसंलीनायाश्चन्द्रमसं पश्यन्त्या नक्षत्रपंक्तिव्यक्तीकरणम्।
अरुन्धती-ध्रुव-सप्तर्षि-मालादर्शनं च। इति रतावसानिकम् ॥ ९ ॥
यदि ऋतु अनुकूल हो, तो भवन की छत पर चाँदनी का आनन्द लेने हेतु दोनों बैठें, और
वहाँ रसस्निग्ध कथावार्ता करें। नायिका, नायक की गोद में लेट जाये। नायक को चाहिये कि
चाँदनी को देखती हुई नायिका को विभिन्न नक्षत्रों को बताये और ध्रुव, अरुन्धती एवं
सप्तर्षिमण्डल के दर्शन कराये। इस प्रकार सुरत के अन्त में कृत्य पूर्ण हुए ॥ ९ ॥
तत्रैतद्भवति—
अवसानेऽपि च प्रीतिरूपचारैरुपस्कृता।
सविस्त्रम्भकथायोगै रतिं जनयते पराम् ॥ १० ॥
इस विषय में यह लोकख्याति है—
आलिङ्गन, चुम्बन आदि से प्रारम्भ की गयी और अन्त में माला, गन्ध (इत्र), पान आदि
उपचारों से संस्कृत प्रीति, प्रेम-प्रसङ्गों और आलिङ्गन आदि के योग से उत्कृष्ट रति को प्राप्त
होती है ॥ १० ॥
परस्परप्रीतिकरैरात्मभावानुवर्तनैः ।
क्षणात् क्रोधपरावृत्तैः क्षणात् प्रीतिविलोकितैः ॥ ११ ॥
प्रीतिवर्धक योग—परस्पर प्रेमोत्पादक भावों के प्रदर्शन से, क्षणभर में कुपित होकर
मुख घुमाने, और दूसरे ही क्षण प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखने से युवक-युवतियों की प्रीति बढ़ती
है ॥ ११ ॥
हल्लीसकक्रीडनकैर्गायनैर्लाटरासकैः ।
रागलोलार्द्रनयनैश्चन्द्रमण्डलवीक्षणैः ॥ १२ ॥
हल्लीसक क्रीड़ा से, परस्पर गायन से, लाट रासक से, राग से चंचल एवं नेत्रों को
अश्रुसिक्त कर देने वाले श्रुतिमधुर गीतों के सुनने से और चन्द्रमण्डल के दर्शन से युवक-
युवतियों की प्रीति बढ़ती है ॥ १२ ॥
आद्ये सन्दर्शने जाते पूर्वं ये स्युर्मनोरथाः ।
पुनर्वियोगे दुःखं च तस्य सर्वस्य कीर्तनैः ॥
कीर्तनान्ते च रागेण परिष्वङ्गैः सचुम्बनैः ।
तैस्तैश्च भावैः संयुक्तो यूनो रागो विवर्धते ॥ १३ ॥
प्रथम दर्शन के समय मन में कैसी इच्छाएँ जागृत हुईं और प्रथम बार वियोग होने पर मन
को कितना दुःख हुआ—इस सब के विस्तारपूर्वक कहने से और इसके पश्चात् प्रेमपूर्वक
काम० ७
७६ वात्स्यायन-कामसूत्र
आलिङ्गन, चुम्बन आदि करने से तथा इसी प्रकार भावसंयुक्त अन्य विश्वसनीय कथाओं के
कहने से युवक युवतियों का प्रेम बढ़ता रहता है ॥ १३ ॥
रागवदाहार्यरागं कृत्रिमरागं व्यवहितरागं पोटारतं खलरतमयन्त्रितरतमिति
रतविशेषाः ॥ १४ ॥
रतविशेष प्रकरण : रागवत् (स्वाभाविक राग), आहार्य राग, कृत्रिम राग, व्यवहित राग,
पोटारत, खलरत और अनियन्त्रित—ये रतविशेष हैं ॥ १४ ॥
सन्दर्शनात्प्रभृत्युभयोरपि प्रवृद्धरागयोः प्रयत्नकृते समागमे प्रवासप्रत्यागमने
वा कलहवियोगयोगे तद्रागवत् ॥ १५ ॥
रागवत्—प्रथम दर्शन से लेकर दोनों के राग का निरन्तर बढ़ते जाना, फलतः शारीरिक
एवं मानसिक विकलता, मिलन की बलवती लालसा और अनेक प्रयत्नों के पश्चात् येन केन
प्रकारेण मिलन या प्रवास से लौटने पर प्रिया से मिलन अथवा प्रणय-कलह के पश्चात् दोनों का
मिलन—यह रागवत् या स्वाभाविक राग कहलाता है ॥ १५ ॥
तत्रात्माभिप्रायाद् यावदर्थं च प्रवृत्तिः ॥ १६ ॥
इसके कार्य—यह रागवत् राग स्वतः बढ़ता है, इसलिए नायक-नायिका स्खलन-सुख
तक इसमें प्रवृत्त रहते हैं ॥ १६ ॥
मध्यस्थरागयोरारब्धं यदनुरज्यते तदाहार्यरागम् ॥ १७ ॥
आहार्य राग—जब नायक-नायिका में एक-दूसरे को देखकर इच्छामात्र उत्पन्न हो, तीव्र
कामासक्ति न हो, तो उसे मध्यस्थ राग कहते हैं। जब मध्यस्थ राग ही उपायों द्वारा सञ्चालित
होकर राग उत्पन्न कर दे तो ऐसे मिलन को आहार्य राग कहते हैं ॥ १७ ॥
तत्र चातुःषष्टिकैर्योगैः सात्यानुविद्धैः सन्धुक्ष्य सन्धुक्ष्य रागं प्रवर्तेत ॥
प्रवृत्ति की रीति—ऐसी स्थिति में पाञ्चालिकी चतुःषष्टि के आलिङ्गन आदि योगों से जो
भी देश और प्रकृति के अनुकूल पड़ें, वासना को प्रदीप्त कर समागम में प्रवृत्त होना
चाहिये ॥ १८ ॥
तत्कार्यहेतोरन्यत्र सक्तयोर्वा कृत्रिमरागम् ॥ १९ ॥
कृत्रिम राग—यदि स्त्री किसी अन्य पर आसक्त हो और पुरुष किसी अन्य पर और
दोनों किसी प्रयोजनवश रमण करें, तो इसे 'कृत्रिम राग' कहते हैं ॥ १९ ॥
तत्र समुच्चयेन योगाञ्शास्त्रतः पश्येत् ॥ २० ॥
प्रवृत्ति की रीति—कृत्रिम राग वाले समागमों में कामशास्त्र में बताये गये सभी योगों
(उपायों) का एक साथ प्रयोग करना चाहिये ॥ २० ॥
पुरुषस्तु हृदयप्रियामन्यां मनसि निधाय व्यवहरेत्। सम्प्रयोगात् प्रभृति रतिं
यावत्। अतस्तद्व्यवहितरागम् ॥ २१ ॥
व्यवहित राग—पुरुष अपने हृदय में अपनी वास्तविक प्रिया का ध्यान करके आलिङ्गन
से लेकर स्खलित होने तक सभी व्यवहार करे और स्त्री अपने वास्तविक प्रिय को ध्यान में
रखकर, तो यह रत व्यवहित राग कहलाता है ॥ २१ ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ७७
न्यूनायां कुम्भदास्यां परिचारिकायां वा यावदर्थं सम्प्रयोगस्तत्
पोटारतम् ॥ २२ ॥
पोटारत—निम्न कोटि की कुम्भदासी या परिचारिका के साथ स्खलित होने तक जो
समागम होता है, वह पोटारत कहलाता है ॥ २२ ॥ (पोटा=नपुंसक या नौकरानी)
तत्रोपचारान्नाद्रियेत ॥ २३ ॥
पोटारत में उपचार अनावश्यक—निम्न कोटि की स्त्रियों के साथ समागम करते समय
आलिङ्गन, चुम्बन आदि उपक्रियाएँ नहीं करनी चाहिये ॥ २३ ॥
तथा वेश्याया ग्रामीणेन सह यावदर्थं खलरतम् ॥ २४ ॥
खलरत—इसी प्रकार वेश्या का ग्रामीण व्यक्ति के साथ स्खलनपर्यन्त समागम करना
खलरत कहलाता है ॥ २४ ॥
ग्रामव्रजप्रत्यन्तयोषिद्भिश्च नागरकस्य ॥ २५ ॥
कामकलानिपुण पुरुष का ग्राम्य स्त्री (ग्वालिन, भीलनी आदि) के साथ समागम भी
खलरत ही है ॥ २५ ॥
उत्पन्नविश्रम्भयोश्च परस्परानुकूल्यादयन्त्रितरतम्। इति रतानि ॥ २६ ॥
अनियन्त्रित रत—जहाँ निरन्तर समागम करने से स्त्री-पुरुष दोनों में परस्पर विश्वास
उत्पन्न हो गया हो, और दोनों एक दूसरे की अनुकूलता का ध्यान रखते हों, वहाँ अनियन्त्रितरत
होता है। इस प्रकार रतविशेष पूर्ण हुए ॥ २६ ॥
वर्धमानप्रणया तु नायिकासपत्नीनामग्रहणं तदाश्रयमालापं वा गोत्रस्खलितं
वा न मर्षयेत्। नायकव्यलीकं च ॥ २७ ॥
प्रणयकलह के कारण—जिस नायिका का नायक पर प्रेम बढ़ चुका हो, वह सपत्नियों
(सौतों) का नाम लेना, उनसे सम्बद्ध वार्तालाप अथवा उनके नाम से अपने को बुलाया जाना
आदि विरुद्ध आचरणों को कदापि सहन न करे ॥ २७ ॥
तत्र सुभृशः कलहो रुदितमायासः शिरोरुहाणामवक्षोदनं प्रहणनमास-
नाच्छयनाद्वा मह्यां पतनं माल्यभूषणावमोक्षो भूमौ शय्या च ॥ २८ ॥
असहिष्णुता के कार्य—जोरदार वाग्युक्त कलह, रुदन, पीड़ा, बालों को बिखेरना, शिर
पीटना, आसन या शैय्या से उतर कर भूमि पर लेट जाना, आभूषण उतार देना और भूमि पर
सोना—ये कलह के कार्य हैं ॥ २८ ॥
तत्र युक्तरूपेण साम्ना पादपतनेन वा प्रसन्नमनास्तामनुनयन्नुपक्रम्य
शयनमारोहयेत् ॥ २९ ॥
नायक के कार्य—नायिका के इस प्रकार मचल जाने पर नायक को चाहिये कि
आवश्यकता के अनुसार प्रिय वाक्यों से अथवा चरणस्पर्श से उसे मनाकर अनुनय-विनयपूर्वक
शैय्या पर सुला दे ॥ २९ ॥
तस्य च वचनमुत्तरेण योजयन्ती विवृद्धक्रोधा सकचग्रहमास्यास्यमुन्नमय्य
७८ वात्स्यायन-कामसूत्र
पादेन बाहौ शिरसि वक्षसि पृष्ठे वा सकृद्द्विस्त्रिर्वाहन्यात्। द्वारदेशं गच्छेत्। तत्रोप-
विश्याश्रुकरणमिति ॥ ३० ॥
मान की विधि—नायक के वचनों पर उत्तर मारती हुई बढ़े हुए क्रोध वाली नायिका,
नायक के बालों को पकड़कर, उसके मुख को ऊपर उठाकर, पैर से उसकी बाँहों, सिर, वक्ष या
पीठ पर एक या दो बार ठोकर मार दे; द्वार तक चली जाये और वहाँ बैठकर अश्रुधारा
बहाये ॥ ३० ॥
अतिक्रुद्धापि तु न द्वारदेशाद् भूयो गच्छेत्। दोषवत्त्वात्। इति दत्तकः। तत्र
युक्तितोऽनुनीयमाना प्रसादमाकांक्षेत्। प्रसन्नापि तु सकषायैरेव वाक्यैरैनं तुदतीव
प्रसन्नरतिकांक्षिणी नायकेन परिरभ्येत ॥ ३१ ॥
आचार्य दत्तक का मत है कि अत्यन्त क्रुद्ध हुई नायिका भी न तो द्वार के बाहर पैर रखे
और न अन्दर आये, क्योंकि बाहर जाकर पुनः लौटना अनेक शङ्काओं को जन्म देता है और
अन्दर लौटना अपमानजनक है। उसे द्वार पर बैठकर युक्तिपूर्वक मनाने पर प्रसन्न हो जाने की
आकांक्षा करनी चाहिये। प्रसन्न हो जाने पर भी व्यंग्य बाणों से नायक का हृदय छेदती हुई वह
प्रसन्न रति की लालसा से नायक से परिरम्भण (आलिङ्गन) आरम्भ करे ॥ ३१ ॥
स्वभवनस्था तु निमित्तात् कलहिता तथाविधचेष्टैव नायकम-
भिगच्छेत् ॥ ३२ ॥
वेश्या और परकीया के मान की रीति—अपने घर रहने वाली वेश्या और परकीया तो
पूर्वोक्त कलह के कारणों से कलह जैसी चेष्टाएँ करती हुई नायक के घर पहुँच जायें ॥ ३२ ॥
तत्र पीठमर्दविटविदूषकैर्नायकप्रयुक्तैरुपशमितरोषा तैरेवानुनीता तैः सहैव
तद्भवनमधिगच्छेत्। तत्र स वसेत्। इति प्रणयकलहः ॥ ३३ ॥
इस प्रणय-कलह के अवसर पर नायक द्वारा प्रेषित पीठमर्द और विदूषकों द्वारा मनाने पर
नायिका को चाहिये कि वह क्रोध त्यागकर उनके साथ चली जाये और नायक के साथ ही रात
बिताये। इस प्रकार प्रणयकलह नामक प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
एवमेतां चतुःषष्टिं बाभ्रव्येण प्रकीर्तिताम्।
प्रयुञ्जानो वरस्त्रीषु सिद्धिं गच्छति नायकः ॥ ३४ ॥
अधिकरण का उपसंहार—इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक देते हैं—आचार्य
बाभ्रव्य द्वारा कथित पांचालिकी चतुःषष्टि (चौंसठ कामकलाओं) का प्रयोग श्रेष्ठ स्त्रियों
(स्वकीया या कुलाङ्गनाओं) में करके नायक अनुपम सिद्धि को प्राप्त करता है ॥ ३४ ॥
ब्रुवन्नप्यन्यशास्त्राणि चतुःषष्टिविवर्जितः।
विद्वत्संसदि नात्यर्थं कथासु परिपूज्यते ॥ ३५ ॥
जो नायक अन्य शास्त्रों का विशेषज्ञ होते हुए भी चौंसठ कामकलाओं को नहीं जानता
वह विद्वानों की धर्म, अर्थ और कामविषयक गोष्ठियों में सम्मान नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ३५ ॥
वर्जितोऽप्यन्यविज्ञानैरतया यस्त्वलंकृतः।
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ७९
स गोष्ठ्यां नरनारीणां कथास्वग्रं विगाहते ॥ ३६ ॥
जो व्यक्ति अन्य शास्त्रों के ज्ञान से शून्य होकर भी कामशास्त्र का सम्यक् ज्ञान रखता है,
वह नर-नारियों की कामविषयक गोष्ठियों में अग्रणी मानकर सम्मानित होता है ॥ ३६ ॥
विद्वद्भिः पूजितामेनां खलैरपि सुपूजिताम्।
पूजितां गणिकासङ्घैर्नन्दिनीं को न पूजयेत्! ॥ ३७॥
त्रिवर्ग के ज्ञाता विद्वान् इन चौंसठ कामकलाओं को स्त्री की रक्षा का उपाय मानकर
सम्मान देते हैं, तो दुष्ट लोग इनकी उपयोगिता के कारण और गणिकाएँ इन्हें जीविका का साधन
मानकर पूजती हैं, तो फिर इन पूजनीय कलाओं को कौन नहीं पूजेगा ! ॥ ३७ ॥
नन्दिनी सुभगा सिद्धा सुभगङ्करणीति च।
नारीप्रियेति चाचार्यैः शास्त्रेष्वेषा निरूच्यते ॥ ३८ ॥
ये चौंसठ कलाएँ नन्दिनी (आनन्दित करने वाली) हैं, सुभगा (मनोहर) हैं, सिद्धा
(वशीभूत करने वाली) हैं, सुभगङ्करण (सौभाग्यकारिणी) हैं और स्त्रियों की अत्यन्त प्रिय
हैं—आचार्यों ने शास्त्रों में इनकी ऐसी ही विवेचना की है ॥ ३८ ॥
कन्याभिः परयोषिद्भिर्गणिकाभिश्च भावतः।
वीक्ष्यते बहुमानेन चतुःषष्टिविचक्षणः ॥ ३९ ॥
जो नायक चौंसठ कामकलाओं का जानने वाला होता है उसे कन्याएँ, परकीया नायिकाएँ
और गणिकाएँ गौरव और सम्मान की दृष्टि से देखती हैं ॥ ३९ ॥
रतारम्भावसानिक प्रकरण नामक दशम अध्याय सम्पन्न ॥
३.
कन्यासम्प्रयुक्तक तृतीय अधिकरण
प्रथम अध्याय
वरणसंविधानप्रकरण
सवर्णायामनन्यपूर्वायां शास्त्रतोऽधिगतायां धर्मोऽर्थः पुत्राः सम्बन्धः पक्ष-
वृद्धिरनुपस्कृता रतिश्च ॥ १ ॥
वरण का कारण—अपनी जाति की अक्षतयोनि एवं तन-मन से निर्मल कन्या से
शास्त्रीय रीति से विवाह करने पर धर्म, अर्थ, सन्तान, सामाजिक सम्बन्ध, पक्षवृद्धि और
अकृत्रिम (सहज) रति की प्राप्ति होती है ॥ १ ॥
तस्मात्कन्यामभिजनोपेतां मातापितृमतीं त्रिवर्षात्प्रभृति न्यूनवयसं श्लाघ्याचारे
८० वात्स्यायन-कामसूत्र
धनवति पक्षवति कुले सम्बन्धिप्रिये सम्बन्धिभिराकुले प्रसूतां प्रभूतमातृपितृपक्षां
रूपशीललक्षणसम्पन्नामन्यूनाधिकाविनष्टदन्तनखकर्णकेशाक्षिस्तनीमरोगिप्रकृतिशरीरां
तथाविध एव श्रुतवाञ्छीलयन् ॥ २ ॥
विवाहयोग्य कन्याएँ—अतएव विवाह के लिये ऐसी कन्या का चयन करे जो
सत्कुलोत्पन्न हो, माता और पिता—दोनों से संरक्षित हो, अपने (वर) से कम से कम तीन वर्ष
छोटी हो, प्रशंसनीय आचरण वाले तथा समृद्ध परिवार की हो, विशाल एवं प्रतिष्ठित परिवार की
हो, जिसके परिवार को सम्बन्धी प्रिय लगते हों, जिस परिवार के मातृपक्ष और पितृपक्ष के यथेष्ट
सम्बन्धी हों और वे दूर-दूर तक फैले हुए हों। जो रूप (सौन्दर्य), शील (स्वभाव) और शुभ
लक्षणों से सम्पन्न हो, जिसके दाँत, नख, कान, केश, आँखें और स्तन न बहुत छोटे हों, न बहुत
बड़े हों और न नष्ट ही हों अर्थात् उक्त अङ्ग प्रशंसनीय लगते हों, खटकने वाले न हों, जो नीरोग
शरीर वाली हो अर्थात् कोई सहज रोग न हो ॥ २ ॥
यां गृहीत्वा कृतिनमात्मानं मन्येत न च समानैर्निन्द्येत तस्यां प्रवृत्तिरिति
घोटकमुखः ॥ ३ ॥
आचार्य घोटकमुख का मत है कि जिस कन्या से विवाह करके पुरुष अपने को कृतार्थ
(धन्य) समझे और समान स्तर वाले जातिबन्धु एवं मित्रगण किसी प्रकार की निन्दा न करें,
प्रशंसा ही करें, उसी में मन लगाना चाहिये ॥ ३ ॥
तस्या वरणे मातापितरौ सम्बन्धिनश्च प्रयतेरन्। मित्राणि च गृहीत-
वाक्यान्युभयसम्बद्धानि ॥ ४ ॥
मित्रसम्बन्धियों के प्रयत्नविषयक कार्य—उस चयनित कन्या के वाग्दान के लिये वर
के माता-पिता और सम्बन्धियों को प्रयत्न करना चाहिये। वर के यथोक्तकारी मित्र भी, जो दोनों
पक्षों से सम्बद्ध हों, इस सम्बन्ध के लिये प्रयत्न करें ॥ ४ ॥
तान्यन्येषां वरयितॄणां दोषान् प्रत्यक्षानागमिकांश्च श्रावयेयुः। कौलान्
पौरुषेयानभिप्रायसंवर्धकांश्च नायकगुणान्। विशेषतश्च कन्यामातुरनुकूलांस्त-
दात्वायतियुक्तान् दर्शयेयुः ॥ ५ ॥
मित्रों के प्रयत्न—वर के मित्रों को चाहिये कि वे अन्य उम्मीदवारों के कुरूपता आदि
प्रत्यक्ष दोषों और सामुद्रिक शास्त्र या हस्तरेखाविषयक आगामी दोषों को कहें, और नायक के
इष्टसाधक कुलाभिमान, पौरुष, शील-स्वभाव आदि की प्रशंसा करें। विशेष रूप से कन्या की माँ
को रुचिकर लगने वाले प्रत्यक्ष और आगामी गुणों को नायक में अवश्य दिखा देना
चाहिये ॥ ५ ॥
दैवचिन्तकरूपश्च शकुननिमित्तग्रहलग्नबललक्षणदर्शनेन नायकस्य
भविष्यन्तमर्थसंयोगं कल्याणमनुवर्णयेत् ॥ ६ ॥
दैवज्ञों के प्रयत्नविषयक कार्य—नायक द्वारा प्रेषित ज्योतिषी, शान्त दिशा में कौए के
बोलने आदि शकुन से अभ्युदयसूचक लक्षणों से, जन्मकुण्डली के लग्न और ग्रहों के बलाबल
से नायक को प्राप्त होने वाले अर्थसंयोग और कल्याण का विस्तृत और सतर्क विवेचन
करे ॥ ६ ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ८१
अपरे पुनरस्यान्यतो विशिष्टेन कन्यालाभेन कन्यामातरमुन्मादयेयुः ॥ ७ ॥
कन्या की माता के पास पहुँचने वाले ज्योतिषी को चाहिये कि वह जिसे अपनी कन्या
देना चाहती हो, उस युवक की अपेक्षा अपने नायक को कन्यादान में अधिक लाभ और कल्याण
बताये तथा उसे इतना अनुरक्त बना दे कि वह नायक को कन्या देने के लिये उन्मत्त हो उठे ॥ ७ ॥
दैवनिमित्तशकुनोपश्रुतीनामानुलोम्येन कन्या वरयेद्दद्याच्च ॥ ८ ॥
कन्यापक्ष और वरपक्ष—दोनों को चाहिये कि विवाह सम्बन्ध निश्चित करने से पूर्व वर
और कन्या-दोषों के ग्रहनक्षत्रों को देख लें, निमित्त और शकुन देख लें और अर्धरात्रि की
अनुकूल उपश्रुति ग्रहणकर, दोनों का ग्रन्थि-बन्धन करें ॥ ८ ॥
न यदृच्छया केवलमानुषायेति घोटकमुखः ॥ ९ ॥
घोटकमुख का अभिमत—वैवाहिक सम्बन्ध केवल वर और कन्या अथवा इनके
माता-पिता की ही इच्छा से नहीं होने चाहिये, अपितु इसमें अन्य कौटुम्बिक लोगों की भी
सम्मति ली जानी चाहिये—ऐसा आचार्य घोटकमुख का अभिमत है ॥ ९ ॥
सुप्तां रुदतीं निष्क्रान्तां वरणे परिवर्जयेत् ॥ १० ॥
अवरणीय कन्याएँ—जो कन्या दर्शनकाल में सो रही हो, रो रही हो और घर से बाहर
गयी हुई हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥
अप्रशस्तनामधेयां च गुप्तां दत्तां घोनां पृषतामृषभां विनतां विकटां विमुण्डां
शुचिदूषितां साङ्करिकीं राकां फलिनीं मित्रां स्वनुजां वर्षकरीं च वर्जयेत् ॥ ११ ॥
जो कन्या अप्रशस्त (भद्दे) नाम वाली हो, जिसे छिपाकर रखा गया हो, जो किसी की
वाग्दत्ता हो, जो भूरे बालों वाली हो, जो सफेद दाग वाली हो, जो पुरुष-जैसे शरीर या डीलडौल
वाली हो, जिसके कन्धे झुके रहते हों, जो विकटनितम्बा (चौड़ी जाँघों वाली) हो, जिसके सिर
पर काफी पीछे बाल हों (ऊँचे माथे वाली), जिसने अपने माता-पिता का दाहसंस्कार किया हो,
जिसे किसी पुरुष ने दूषित कर रखा हो, जिसकी योनि रज से क्षत हो गयी हो, जो मूक (गूँगी)
हो, जो बाल्यकाल की साथिन हो, जो अप्राप्तयौवना हो और जिसके हाथ-पैरों में अत्यधिक
पसीना आता हो—ऐसी कन्या से विवाह नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥
नक्षत्राख्यां नदीनाम्नीं वृक्षनाम्नीं च गर्हिताम् ।
लकाररेफोपान्तां च वरणे परिवर्जयेत् ॥ १२ ॥
जिस कन्या का नाम नक्षत्र, नदी और वृक्ष के नाम पर हो, जो निन्दित नाम वाली हो,
जिसके नाम के अन्त से पहले अक्षर में ल और र अक्षर आते हों, उसके साथ कदापि विवाह
नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥
यस्यां मनश्चक्षुषोर्निबन्धस्तस्यामृद्धिः। नेतरामाद्रियेत्। इत्येके ॥ १३ ॥
जिस कन्या को देखकर मन रम जाये और आँखें, लग जायें, उसी से विवाह करने में
सुख-समृद्धि होती है—ऐसा भी कामशास्त्र के कुछ आचार्यों का मत है ॥ १३ ॥
तस्मात् प्रदानसमये कन्यामुदारवेषां स्थापयेयुः। अपराह्निकं च। नित्यं
प्रसाधितायाः सखीभिः सह क्रीडा। यज्ञविवाहादिषु जनसन्द्रावेषु प्रायत्निकं
दर्शनम्। तथोत्सवेषु च। पण्यसधर्मत्वात् ॥ १४ ॥
८२ वात्स्यायन-कामसूत्र
कन्या पक्ष की तैयारी—अतएव कन्या के युंवा होने पर अभिभावक उसे उज्ज्वल और
सुन्दर वस्त्र ही पहनायें। सन्ध्याकाल के समय भी वह अपनी सखियों के मध्य सुसज्जित होकर
ही क्रीड़ा करे। यज्ञ, विवाह, उत्सव आदि में, जहाँ अनेक व्यक्ति एकत्र होते हैं, उसे सुसज्जित
रूप में ही ले जाना चाहिये, क्योंकि वह तो बिक्री की वस्तु जैसी है। तात्पर्य यह है कि जिस
प्रकार बिक्री की वस्तु को सुन्दर और भव्य रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है, जिससे वह ग्राहकों
को आकर्षित कर सके, उसी प्रकार कन्या को भी उत्सव आदि में सुसज्जित रूप में ही ले जाना
चाहिये जिससे लोग उसकी ओर आकर्षित हों और उससे विवाह की बात चलायें॥ १४॥
वरणार्थमुपगताँश्च भद्रदर्शनान् प्रदक्षिणवाचश्च तत्सम्बन्धिसङ्गतान् पुरुषान्
मङ्गलैः प्रतिगृह्णीयुः ॥ १५ ॥
वरपक्ष का स्वागत-सत्कार—जब सुन्दर और मधुरभाषी व्यक्ति अपने मित्रों एवं
सम्बन्धियों के साथ कन्यावरण हेतु आयें तो कन्यापक्ष वालों को मांगलिक और स्वादिष्ट पदार्थों
से उनका स्वागत करना चाहिये ॥ १५ ॥
कन्यां चैषामलंकृतामन्यापदेशेन दर्शयेयुः ॥ १६ ॥
कन्या दिखाने की रीति—किसी बहाने से ही वस्त्राभूषणों से सज्जित कन्या को वरपक्ष
को दिखाना चाहिये ॥ १६ ॥
दैवं परीक्षणं चावधिं स्थापयेयुः। आ प्रदाननिश्चयात् ॥ १७ ॥
जब तक लेन-देन (दहेज) का निश्चित न हो जाये, तब तक वरपक्ष वालों से यह कह दें
कि वर-कन्या की जन्मकुण्डली मिलवाने और अपने मित्रों एवं सम्बन्धियों से परामर्श करने के
पश्चात् आपको उत्तर देंगे ॥ १७ ॥
स्नानादिषु नियुज्यमाना वरयितारः सर्वं भविष्यतीत्युक्त्वा न तदहरेवाभ्यु-
पगच्छेयुः ॥ १८ ॥
विशेष बात—यदि कन्या पक्ष वाले वरपक्ष वालों से स्नानादिक के लिए कहें, तो वर
पक्ष को चाहिये कि 'समय आने पर सब हो जायेगा' ऐसा कहकर उस दिन स्वीकार न
करें ॥ १८ ॥
देशप्रवृत्तिसात्म्याद्वा ब्राह्मप्राजापत्यार्षदैवानामन्यतमेन विवाहेन शास्त्रतः
परिणयेत्। इति वरणविधानम्॥ १९ ॥
विवाह-भेद—अपने देशाचार या अपनी अनुकूलता से ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और
दैव—इन चार प्रशस्त विवाह-प्रकारों में से किसी एक के द्वारा शास्त्र-विधि से कन्या से विवाह
करना चाहिये। वरणविधान पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥
समस्याद्याः सहक्रीडा विवाहाः सङ्गतानि च।
समानैरेव कार्याणि नोत्तमैर्नापि वाधमैः ॥ २० ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक प्राप्त होते हैं—किसी समस्या आदि को लेकर एक
साथ क्रीड़ा करना, विवाह और मित्रता—ये तीनों कार्य समान शील और समान स्थिति वाले
पुरुषों के साथ ही करने चाहिये। ये कार्य न तो अपने से ऊँचे के साथ करे और न नीचे के
ही ॥ २० ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ८३
कन्यां गृहीत्वा वर्तेत प्रेष्यवद्यत्र नायकः।
तं विद्यादुच्चसम्बन्धं परित्यक्तं मनस्विभिः॥ २१ ॥
(क) उच्च सम्बन्ध सम्बन्ध-भेद—समानता को आधार बनाकर सम्बन्ध तीन प्रकार
के होते हैं—सम सम्बन्ध, उच्च सम्बन्ध और हीन सम्बन्ध। यहाँ दोनों ही पक्ष अपने को बराबरी
का समझें, वहाँ सम सम्बन्ध होता है। जहाँ दूसरे पक्ष के समक्ष नौकरों के समान रहना पड़े, उसे
उच्च सम्बन्ध कहते हैं और इसके विपरीत को हीन सम्बन्ध। अब इनके स्वरूप को स्पष्ट करते
हैं—जिस सम्बन्ध में कन्या को लेकर नायक (वर) को नौकर के समान रहना पड़ता है, उसे
उच्च सम्बन्ध कहते हैं। बुद्धिमान् और मनस्वी व्यक्ति ऐसे सम्बन्धों को कदापि नहीं
करते ॥ २१ ॥
स्वामिवद्विचरेद् यत्र बान्धवैः स्वैः पुरस्कृतः।
अश्लाघ्यो हीनसम्बन्धः सोऽपि सद्भिर्विनिन्द्यते ॥ २२ ॥
(ख) हीन सम्बन्ध—जिस सम्बन्ध में वर, कन्या के बन्धु-बान्धवों के समक्ष स्वामी के
समान विचरण करे, और कन्या दासी के समान बनी रहे, उसे हीन सम्बन्ध कहते हैं। ऐसा
सम्बन्ध भी प्रशंसनीय नहीं है, क्योंकि सज्जन व्यक्ति ऐसे सम्बन्ध की निन्दा करते हैं॥ २२ ॥
परस्परसुखास्वादा क्रीडा यत्र प्रयुज्यते।
विशेषयन्ती चान्योन्यं सम्बन्धः स विधीयते ॥ २३ ॥
(ग) समान सम्बन्ध—जिस सम्बन्ध में वरपक्ष और कन्यापक्ष—दोनों समान सुख का
अनुभव करें, दोनों एक दूसरे के पूरक और शोभावर्धक हों, वह समान या उचित सम्बन्ध होता
है ॥ २३ ॥
कृत्वापि चोच्चसम्बन्धं पश्चाज्ज्ञातिषु सन्नमेत्।
न त्वेव हीनसम्बन्धं कुर्यात् सद्भिर्विनिन्दितम्॥ २४ ॥
उच्च और हीन सम्बन्धों में उच्च श्रेष्ठ—उच्च कुल की कन्या से विवाह करके, उसे
अपने बन्धु-बान्धों में ले आये, श्वसुर के घर ही न पड़ा रहे, किन्तु सज्जनों द्वारा निन्दित हीन
सम्बन्ध को तो कदापि न करे ॥ २४ ॥
वरणसंविधान प्रकरण नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥
●
द्वितीय अध्याय
कन्याविस्त्रम्भणप्रकरण
सङ्गतयोस्त्रिरात्रमधःशय्या ब्रह्मचर्यं क्षारलवणवर्जमाहारस्तथा सप्ताहं
सतूर्यमङ्गलस्नानं प्रसाधनं सहभोजनं च प्रेक्षासम्बन्धिनां च पूजनम्। इति
सार्ववर्णिकम् ॥ १ ॥
८४ वात्स्यायन-कामसूत्र
दस दिन के कृत्य—विवाह के पश्चात् तीन दिन तक नवपरिणीत पति-पत्नी भूमि पर
शयन करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें, भोजन में क्षार और लवणहीन पदार्थ लें। तत्पश्चात् एक
सप्ताह तक गाजे-बाजे और मङ्गल गीतों के साथ स्नान करें, वर-वधू, दोनों वस्त्राभरणों से
सज्जित हों, दोनों साथ-साथ भोजन करें, काव्य गोष्ठी नाटक आदि देखने में साथ-साथ रहें,
सम्बन्धियों, गुरुओं, अतिथियों आदि का स्वागत-सत्कार करें—ये नियम सभी वर्णों—ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिये हैं॥ १ ॥
तस्मिंस्त्रेतां निशि विजने मृदुभिरुपचारैरुपक्रमेत ॥ २ ॥
नवपरिणीता पत्नी में विश्वास उत्पन्न करने के उपाय—इन रातों में, एकान्त स्थान पर,
कोमल उपचारों द्वारा पत्नी को अनुरक्त करना चाहिये ॥ २ ॥
त्रिरात्रमवचनं हि स्तम्भमिव नायकं पश्यन्ती कन्या निर्विद्येत परिभवेच्च
तृतीयामिव प्रकृतिम्। इति बाभ्रवीयाः ॥ ३ ॥
कोमल उपचारों का कारण—प्रथम तीन रात्रियों में यदि पति स्तम्भ के समान जड़
बना रहे, न तो रससिक्त वार्तालाप ही करे और न मधुर स्पर्श ही, तो नववधू दुःखी होती है, और
उसे ग्राम्य एवं नपुंसक समझकर उसका तिरस्कार कर डालती है—ऐसा आचार्य बाभ्रव्य के
अनुयायियों का मत है॥ ३ ॥
उपक्रमेत विस्रम्भयेच्च, न तु ब्रह्मचर्यमतिवर्तेत। इति वात्स्यायनः ॥ ४ ॥
प्रथम तीन रात्रियों में पति, पत्नी के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करे, उसे अपना विश्वस्त
बनाये, किन्तु ब्रह्मचर्य का त्याग न करे—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है॥ ४ ॥
उपक्रममाणश्च न प्रसहा किञ्चिदाचरेत् ॥ ५ ॥
कोमल उपचार—प्रेम-प्रदर्शन के उपक्रमण में किसी प्रकार की प्रचण्डता न दिखाये
अर्थात् रसस्निग्ध वार्तालाप, आलिङ्गन, चुम्बन आदि उतने ही करे कि जिससे पत्नी उद्विग्न न
हो॥ ५॥
कुसुमसाधर्माणो हि योषितः सुकुमारोपक्रमाः। तास्त्वनधिगतविश्वासैः
प्रसभमुपक्रम्यमाणाः सम्प्रयोगद्वेषिण्यो भवन्ति। तस्मात् साम्नैवोपचरेत् ॥ ६॥
इसका कारण—चूँकि स्त्रियाँ फूल के समान कोमल होती हैं, इसलिये सुकुमार
उपचारों से ही उनको अनुरक्त करना चाहिये। जिस पति के प्रति उनमें विश्वास उत्पन्न नहीं है,
यदि वह व्यवहार में प्रचण्डता दिखाने लगे, तो वे संभोग से घृणा करने लगती हैं। अतएव उनके
साथ सुकुमार व्यवहार ही करना चाहिये ॥ ६ ॥
युक्त्यापि तु यतः प्रसरमुपलभेत्तेनैवानु प्रविशेत् ॥ ७॥
यथासम्भव प्रयास—जिस युक्ति से भी अवसर मिले, पत्नी का अन्तरङ्ग बनने का
प्रयास करे ॥ ७ ॥
तत्प्रियेणालिङ्गनेनाचरितेन नातिकालत्वात् ॥ ८ ॥
सर्वप्रथम आलिङ्गन—इस प्रकार अवसर मिल जाने पर प्रेमपूर्वक स्त्री का आलिङ्गन
करे, किन्तु यह अल्पकालिक ही होना चाहिये ॥ ८ ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ८५
पूर्वकायेण चोपक्रमेत्। विषह्यत्वात् ॥ ९ ॥
प्रथम उपक्रम—प्रारम्भ में पत्नी के नाभि से ऊपर के अङ्गों का ही स्पर्श करना चाहिये,
क्योंकि इसे वह सह लेती है ॥ ९ ॥
दीपालोके विगाढयौवनायाः पूर्वसंस्तुतायाः। बालाया अपूर्वायाश्चान्ध-
कारे ॥ १० ॥
अन्धकार और प्रकाश—यदि पत्नी पूर्वपरिचिता या उन्मत्तयौवना हो, तो उसका
आलिङ्गन प्रकाश में भी किया जा सकता है, लेकिन यदि व्ह अपरिचिता या अप्राप्तयौवना हो तो
उसका आलिङ्गन अन्धकार में ही करना चाहिये ॥ १० ॥
अङ्गीकृतपरिष्वङ्गायाश्च वदनेन ताम्बूलदानम्। तदप्रतिपद्यमानां च सान्त्वनै-
र्वाक्यैः शपथैः प्रतियाचितैः पादपतनैश्च ग्राहयेत्। व्रीडायुक्तापि योषिदत्यन्तक्रुद्धापि
न पादपतनमतिवर्तते इति सार्वत्रिकम् ॥ ११ ॥
मुख से ताम्बूलदान—जब पत्नी आलिङ्गन को सहने लगे, तो पति को अपने मुख में
पान रखकर उसे देना चाहिये। यदि वह उसे अस्वीकार करे, तो प्रीतिपूर्ण मनुहारों से अनुरोध
करे, अपनी शपथ दिलाये, उससे ताम्बूल माँगे आदि। इतने पर भी मुख से पान न ले तो पैरों में
गिरकर उसे मनाना चाहिये। अत्यधिक लज्जाशील या कुपित स्त्री भी पति के पैरों में पड़ने का
अतिक्रमण नहीं कर सकती—यह प्रवृत्ति सभी स्थानों की स्त्रियों में समान रूप से मिलती
है ॥ ११ ॥
तद्दानप्रसङ्गेन मृदु विशदमकाहलमस्याश्चुम्बनम् ॥ १२ ॥
प्रथम चुम्बन—मुख से ताम्बूल देते समय उसका कोमल और निःशब्द चुम्बन कर लेना
चाहिये ॥ १२ ॥
तत्र सिद्धामालापयेत् ॥ १३ ॥
वार्तारस—जब चुम्बन से पत्नी प्रसन्न होने लगे तो उससे रसपूर्ण वार्तालाप प्रारम्भ
कर दे ॥ १३ ॥
तच्छ्रवणार्थं यत्किचिदलपाक्षराभिधेयमजानन्निव पृच्छेत् ॥ १४ ॥
बोलने को विवश करने का उपाय—बातचीत को सुनती हुई पत्नी से थोड़े शब्दों में
कही जाने वाली बात को पति पूर्णतः अनजान बनकर पूछे ॥ १४ ॥
तत्र निष्प्रतिपत्तिमनुद्वेजयन् सान्त्वनायुक्तं बहुश एव पृच्छेत् ॥ १५ ॥
यदि वह तब भी चुप रहे, कोई उत्तर न दे, तो उसे बिना उद्विग्न किये ही चाटुकारिता भरे
वचनों से बार बार पूछे ॥ १५ ॥
यत्राप्यवदन्तीं निर्बध्नीयात् ॥ १६ ॥
यदि इसके पश्चात् भी वह चुप रहे, तो इसी प्रकार की रससिक्त बातों में उसे
फँसा ले ॥ १६ ॥
सर्वा एव हि कन्याः पुरुषेण प्रयुज्यमानं वचनं विषहन्ते। न तु लघुमिश्रामपि
वाचं वदन्ति। इति घोटकमुखः ॥ १७ ॥
८६ वात्स्यायन-कामसूत्र
सभी नवविवाहिता कन्याएँ पति द्वारा कही गयी प्रत्येक बात को सुन लेती हैं, किन्तु पूछी
गयी किसी भी बात का उत्तर नहीं देतीं—यह आचार्य घोटकमुख का अभिमत है ॥ १७ ॥
निर्बध्यमाना तु शिरःकम्पेन प्रतिवचनानि योजयेत्। कलहे तु न शिरः
कम्पयेत् ॥ १८ ॥
नवपरिणीता के उत्तर देने की रीति—पति द्वारा बार बार बोलने के लिये विवश किये
जाने पर, सिर हिलाकर हाँ या ना का उत्तर दे और यदि वह क्रुद्ध हो तो सिर भी न
हिलाये ॥ १८ ॥
इच्छसि मां नेच्छसि वा, किं तेऽहं रुचितो न रुचितो वेति पृष्टा चिरं स्थित्वा
निर्बध्यमाना तदानुकूल्येन शिरः कम्पयेत्। प्रपञ्च्यमाना तु विवदेत् ॥ १९ ॥
प्रेमजिज्ञासा का स्वरूप—'तुम मुझे चाहती हो या नहीं', 'मैं तुम्हें पसन्द आया या
नहीं'—इस प्रकार पति द्वारा पूछे जाने पर, पत्नी कुछ समय ठहरकर, आग्रह करने पर ही
अनुकूलतासूचक सिर हिलाये, और यदि क्रुद्ध हो तो झगड़ पड़े ॥ १९ ॥
संस्तुता चेत् सखीमनुकूलामुभयतोऽपि विस्रब्धां तामन्तरा कृत्वा कथां
योजयेत्। तस्मिन्नधोमुखी विहसेत्। तां चातिवादिनीमधिक्षिपेद्विदेच्च। सा तु परि-
हासार्थमिदमनयोक्तमिति चानुक्तमपि ब्रूयात्। तत्र तामपनुद्य प्रतिवचनार्थ-
मभ्यर्थ्यमाना तूष्णीमासीत। निर्बध्यमाना तु नाहमेवं ब्रवीमीत्यव्यक्ताक्षरमनवसितार्थं
वचनं ब्रूयात्। नायकं च विहसन्ती कदाचित् कटाक्षैः प्रेक्षेत। इत्यालाप-
योजनम् ॥ २० ॥
पूर्वपरिचिता के साथ वार्तालाप की रीति—यदि नवपरिणीता पत्नी पहले से परिचित
है तो अपने अनुकूल और दोनों की विश्वस्त सखी को माध्यम बनाकर इस प्रकार वार्ता प्रारम्भ
करे। इसमें पति की बातें सुनकर कन्या हँसती रहे और सखी के कुछ अधिक बोलने पर उस पर
यह आक्षेप लगाये कि तू बहुत बोलने लगी है और उससे विवाद करने लगे। सखी भी हँसी के
लिए कही और अनकही बातें भी कह डाले कि यह तो यहाँ तक कह रही थी कि जबसे उन्हें
देखा है तब से न दिन में चैन मिलता है और न रात में नींद आती है। यदि सखी को रोककर
उससे उत्तर देने का निवेदन किया जाये, तो 'मैंने ऐसे नहीं कहा' इस प्रकार अस्पष्ट शब्द और
अनिश्चित अर्थों वाले अक्षरों में उत्तर दे। कभी कभी नायक की ओर कटाक्षों से देखे। प्रारम्भ में
यह वार्तालाप की रीति हुई ॥ २० ॥
एवं जातपरिचया चानिर्वदन्ती तत्समीपे याचितं ताम्बूलं विलेपनं स्रजं
निदध्यात्। उत्तरीये वास्य निबध्नीयात् ॥ २१ ॥
प्रिय के पास ताम्बूल आदि रखना—इस प्रकार परिचय हो जाने पर नायिका, माँगने
पर ताम्बूल, चन्दन और माला, विना बोले ही, नायक के पास रख दे अथवा उसके उत्तरीय में
बाँध दे ॥ २१ ॥
तथायुक्तामाच्छुरितकेन स्तनमुकुलयोरुपरि स्पृशेत् ॥ २२ ॥