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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 248 में से

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पृष्ठ 102

७६ वात्स्यायन-कामसूत्र
आलिङ्गन, चुम्बन आदि करने से तथा इसी प्रकार भावसंयुक्त अन्य विश्वसनीय कथाओं के
कहने से युवक युवतियों का प्रेम बढ़ता रहता है ॥ १३ ॥
रागवदाहार्यरागं कृत्रिमरागं व्यवहितरागं पोटारतं खलरतमयन्त्रितरतमिति
रतविशेषाः ॥ १४ ॥
रतविशेष प्रकरण : रागवत् (स्वाभाविक राग), आहार्य राग, कृत्रिम राग, व्यवहित राग,
पोटारत, खलरत और अनियन्त्रित—ये रतविशेष हैं ॥ १४ ॥
सन्दर्शनात्प्रभृत्युभयोरपि प्रवृद्धरागयोः प्रयत्नकृते समागमे प्रवासप्रत्यागमने
वा कलहवियोगयोगे तद्रागवत् ॥ १५ ॥
रागवत्—प्रथम दर्शन से लेकर दोनों के राग का निरन्तर बढ़ते जाना, फलतः शारीरिक
एवं मानसिक विकलता, मिलन की बलवती लालसा और अनेक प्रयत्नों के पश्चात् येन केन
प्रकारेण मिलन या प्रवास से लौटने पर प्रिया से मिलन अथवा प्रणय-कलह के पश्चात् दोनों का
मिलन—यह रागवत् या स्वाभाविक राग कहलाता है ॥ १५ ॥
तत्रात्माभिप्रायाद् यावदर्थं च प्रवृत्तिः ॥ १६ ॥
इसके कार्य—यह रागवत् राग स्वतः बढ़ता है, इसलिए नायक-नायिका स्खलन-सुख
तक इसमें प्रवृत्त रहते हैं ॥ १६ ॥
मध्यस्थरागयोरारब्धं यदनुरज्यते तदाहार्यरागम् ॥ १७ ॥
आहार्य राग—जब नायक-नायिका में एक-दूसरे को देखकर इच्छामात्र उत्पन्न हो, तीव्र
कामासक्ति न हो, तो उसे मध्यस्थ राग कहते हैं। जब मध्यस्थ राग ही उपायों द्वारा सञ्चालित
होकर राग उत्पन्न कर दे तो ऐसे मिलन को आहार्य राग कहते हैं ॥ १७ ॥
तत्र चातुःषष्टिकैर्योगैः सात्यानुविद्धैः सन्धुक्ष्य सन्धुक्ष्य रागं प्रवर्तेत ॥
प्रवृत्ति की रीति—ऐसी स्थिति में पाञ्चालिकी चतुःषष्टि के आलिङ्गन आदि योगों से जो
भी देश और प्रकृति के अनुकूल पड़ें, वासना को प्रदीप्त कर समागम में प्रवृत्त होना
चाहिये ॥ १८ ॥
तत्कार्यहेतोरन्यत्र सक्तयोर्वा कृत्रिमरागम् ॥ १९ ॥
कृत्रिम राग—यदि स्त्री किसी अन्य पर आसक्त हो और पुरुष किसी अन्य पर और
दोनों किसी प्रयोजनवश रमण करें, तो इसे 'कृत्रिम राग' कहते हैं ॥ १९ ॥
तत्र समुच्चयेन योगाञ्शास्त्रतः पश्येत् ॥ २० ॥
प्रवृत्ति की रीति—कृत्रिम राग वाले समागमों में कामशास्त्र में बताये गये सभी योगों
(उपायों) का एक साथ प्रयोग करना चाहिये ॥ २० ॥
पुरुषस्तु हृदयप्रियामन्यां मनसि निधाय व्यवहरेत्। सम्प्रयोगात् प्रभृति रतिं
यावत्। अतस्तद्व्यवहितरागम् ॥ २१ ॥
व्यवहित राग—पुरुष अपने हृदय में अपनी वास्तविक प्रिया का ध्यान करके आलिङ्गन
से लेकर स्खलित होने तक सभी व्यवहार करे और स्त्री अपने वास्तविक प्रिय को ध्यान में
रखकर, तो यह रत व्यवहित राग कहलाता है ॥ २१ ॥