वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ वात्स्यायन-कामसूत्र
कन्या पक्ष की तैयारी—अतएव कन्या के युंवा होने पर अभिभावक उसे उज्ज्वल और
सुन्दर वस्त्र ही पहनायें। सन्ध्याकाल के समय भी वह अपनी सखियों के मध्य सुसज्जित होकर
ही क्रीड़ा करे। यज्ञ, विवाह, उत्सव आदि में, जहाँ अनेक व्यक्ति एकत्र होते हैं, उसे सुसज्जित
रूप में ही ले जाना चाहिये, क्योंकि वह तो बिक्री की वस्तु जैसी है। तात्पर्य यह है कि जिस
प्रकार बिक्री की वस्तु को सुन्दर और भव्य रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है, जिससे वह ग्राहकों
को आकर्षित कर सके, उसी प्रकार कन्या को भी उत्सव आदि में सुसज्जित रूप में ही ले जाना
चाहिये जिससे लोग उसकी ओर आकर्षित हों और उससे विवाह की बात चलायें॥ १४॥
वरणार्थमुपगताँश्च भद्रदर्शनान् प्रदक्षिणवाचश्च तत्सम्बन्धिसङ्गतान् पुरुषान्
मङ्गलैः प्रतिगृह्णीयुः ॥ १५ ॥
वरपक्ष का स्वागत-सत्कार—जब सुन्दर और मधुरभाषी व्यक्ति अपने मित्रों एवं
सम्बन्धियों के साथ कन्यावरण हेतु आयें तो कन्यापक्ष वालों को मांगलिक और स्वादिष्ट पदार्थों
से उनका स्वागत करना चाहिये ॥ १५ ॥
कन्यां चैषामलंकृतामन्यापदेशेन दर्शयेयुः ॥ १६ ॥
कन्या दिखाने की रीति—किसी बहाने से ही वस्त्राभूषणों से सज्जित कन्या को वरपक्ष
को दिखाना चाहिये ॥ १६ ॥
दैवं परीक्षणं चावधिं स्थापयेयुः। आ प्रदाननिश्चयात् ॥ १७ ॥
जब तक लेन-देन (दहेज) का निश्चित न हो जाये, तब तक वरपक्ष वालों से यह कह दें
कि वर-कन्या की जन्मकुण्डली मिलवाने और अपने मित्रों एवं सम्बन्धियों से परामर्श करने के
पश्चात् आपको उत्तर देंगे ॥ १७ ॥
स्नानादिषु नियुज्यमाना वरयितारः सर्वं भविष्यतीत्युक्त्वा न तदहरेवाभ्यु-
पगच्छेयुः ॥ १८ ॥
विशेष बात—यदि कन्या पक्ष वाले वरपक्ष वालों से स्नानादिक के लिए कहें, तो वर
पक्ष को चाहिये कि 'समय आने पर सब हो जायेगा' ऐसा कहकर उस दिन स्वीकार न
करें ॥ १८ ॥
देशप्रवृत्तिसात्म्याद्वा ब्राह्मप्राजापत्यार्षदैवानामन्यतमेन विवाहेन शास्त्रतः
परिणयेत्। इति वरणविधानम्॥ १९ ॥
विवाह-भेद—अपने देशाचार या अपनी अनुकूलता से ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और
दैव—इन चार प्रशस्त विवाह-प्रकारों में से किसी एक के द्वारा शास्त्र-विधि से कन्या से विवाह
करना चाहिये। वरणविधान पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥
समस्याद्याः सहक्रीडा विवाहाः सङ्गतानि च।
समानैरेव कार्याणि नोत्तमैर्नापि वाधमैः ॥ २० ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक प्राप्त होते हैं—किसी समस्या आदि को लेकर एक
साथ क्रीड़ा करना, विवाह और मित्रता—ये तीनों कार्य समान शील और समान स्थिति वाले
पुरुषों के साथ ही करने चाहिये। ये कार्य न तो अपने से ऊँचे के साथ करे और न नीचे के
ही ॥ २० ॥