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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 248 में से

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पृष्ठ 104

७८ वात्स्यायन-कामसूत्र
पादेन बाहौ शिरसि वक्षसि पृष्ठे वा सकृद्द्विस्त्रिर्वाहन्यात्। द्वारदेशं गच्छेत्। तत्रोप-
विश्याश्रुकरणमिति ॥ ३० ॥
मान की विधि—नायक के वचनों पर उत्तर मारती हुई बढ़े हुए क्रोध वाली नायिका,
नायक के बालों को पकड़कर, उसके मुख को ऊपर उठाकर, पैर से उसकी बाँहों, सिर, वक्ष या
पीठ पर एक या दो बार ठोकर मार दे; द्वार तक चली जाये और वहाँ बैठकर अश्रुधारा
बहाये ॥ ३० ॥
अतिक्रुद्धापि तु न द्वारदेशाद् भूयो गच्छेत्। दोषवत्त्वात्। इति दत्तकः। तत्र
युक्तितोऽनुनीयमाना प्रसादमाकांक्षेत्। प्रसन्नापि तु सकषायैरेव वाक्यैरैनं तुदतीव
प्रसन्नरतिकांक्षिणी नायकेन परिरभ्येत ॥ ३१ ॥
आचार्य दत्तक का मत है कि अत्यन्त क्रुद्ध हुई नायिका भी न तो द्वार के बाहर पैर रखे
और न अन्दर आये, क्योंकि बाहर जाकर पुनः लौटना अनेक शङ्काओं को जन्म देता है और
अन्दर लौटना अपमानजनक है। उसे द्वार पर बैठकर युक्तिपूर्वक मनाने पर प्रसन्न हो जाने की
आकांक्षा करनी चाहिये। प्रसन्न हो जाने पर भी व्यंग्य बाणों से नायक का हृदय छेदती हुई वह
प्रसन्न रति की लालसा से नायक से परिरम्भण (आलिङ्गन) आरम्भ करे ॥ ३१ ॥
स्वभवनस्था तु निमित्तात् कलहिता तथाविधचेष्टैव नायकम-
भिगच्छेत् ॥ ३२ ॥
वेश्या और परकीया के मान की रीति—अपने घर रहने वाली वेश्या और परकीया तो
पूर्वोक्त कलह के कारणों से कलह जैसी चेष्टाएँ करती हुई नायक के घर पहुँच जायें ॥ ३२ ॥
तत्र पीठमर्दविटविदूषकैर्नायकप्रयुक्तैरुपशमितरोषा तैरेवानुनीता तैः सहैव
तद्भवनमधिगच्छेत्। तत्र स वसेत्। इति प्रणयकलहः ॥ ३३ ॥
इस प्रणय-कलह के अवसर पर नायक द्वारा प्रेषित पीठमर्द और विदूषकों द्वारा मनाने पर
नायिका को चाहिये कि वह क्रोध त्यागकर उनके साथ चली जाये और नायक के साथ ही रात
बिताये। इस प्रकार प्रणयकलह नामक प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
एवमेतां चतुःषष्टिं बाभ्रव्येण प्रकीर्तिताम्।
प्रयुञ्जानो वरस्त्रीषु सिद्धिं गच्छति नायकः ॥ ३४ ॥
अधिकरण का उपसंहार—इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक देते हैं—आचार्य
बाभ्रव्य द्वारा कथित पांचालिकी चतुःषष्टि (चौंसठ कामकलाओं) का प्रयोग श्रेष्ठ स्त्रियों
(स्वकीया या कुलाङ्गनाओं) में करके नायक अनुपम सिद्धि को प्राप्त करता है ॥ ३४ ॥
ब्रुवन्नप्यन्यशास्त्राणि चतुःषष्टिविवर्जितः।
विद्वत्संसदि नात्यर्थं कथासु परिपूज्यते ॥ ३५ ॥
जो नायक अन्य शास्त्रों का विशेषज्ञ होते हुए भी चौंसठ कामकलाओं को नहीं जानता
वह विद्वानों की धर्म, अर्थ और कामविषयक गोष्ठियों में सम्मान नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ३५ ॥
वर्जितोऽप्यन्यविज्ञानैरतया यस्त्वलंकृतः।