वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ८३
कन्यां गृहीत्वा वर्तेत प्रेष्यवद्यत्र नायकः।
तं विद्यादुच्चसम्बन्धं परित्यक्तं मनस्विभिः॥ २१ ॥
(क) उच्च सम्बन्ध सम्बन्ध-भेद—समानता को आधार बनाकर सम्बन्ध तीन प्रकार
के होते हैं—सम सम्बन्ध, उच्च सम्बन्ध और हीन सम्बन्ध। यहाँ दोनों ही पक्ष अपने को बराबरी
का समझें, वहाँ सम सम्बन्ध होता है। जहाँ दूसरे पक्ष के समक्ष नौकरों के समान रहना पड़े, उसे
उच्च सम्बन्ध कहते हैं और इसके विपरीत को हीन सम्बन्ध। अब इनके स्वरूप को स्पष्ट करते
हैं—जिस सम्बन्ध में कन्या को लेकर नायक (वर) को नौकर के समान रहना पड़ता है, उसे
उच्च सम्बन्ध कहते हैं। बुद्धिमान् और मनस्वी व्यक्ति ऐसे सम्बन्धों को कदापि नहीं
करते ॥ २१ ॥
स्वामिवद्विचरेद् यत्र बान्धवैः स्वैः पुरस्कृतः।
अश्लाघ्यो हीनसम्बन्धः सोऽपि सद्भिर्विनिन्द्यते ॥ २२ ॥
(ख) हीन सम्बन्ध—जिस सम्बन्ध में वर, कन्या के बन्धु-बान्धवों के समक्ष स्वामी के
समान विचरण करे, और कन्या दासी के समान बनी रहे, उसे हीन सम्बन्ध कहते हैं। ऐसा
सम्बन्ध भी प्रशंसनीय नहीं है, क्योंकि सज्जन व्यक्ति ऐसे सम्बन्ध की निन्दा करते हैं॥ २२ ॥
परस्परसुखास्वादा क्रीडा यत्र प्रयुज्यते।
विशेषयन्ती चान्योन्यं सम्बन्धः स विधीयते ॥ २३ ॥
(ग) समान सम्बन्ध—जिस सम्बन्ध में वरपक्ष और कन्यापक्ष—दोनों समान सुख का
अनुभव करें, दोनों एक दूसरे के पूरक और शोभावर्धक हों, वह समान या उचित सम्बन्ध होता
है ॥ २३ ॥
कृत्वापि चोच्चसम्बन्धं पश्चाज्ज्ञातिषु सन्नमेत्।
न त्वेव हीनसम्बन्धं कुर्यात् सद्भिर्विनिन्दितम्॥ २४ ॥
उच्च और हीन सम्बन्धों में उच्च श्रेष्ठ—उच्च कुल की कन्या से विवाह करके, उसे
अपने बन्धु-बान्धों में ले आये, श्वसुर के घर ही न पड़ा रहे, किन्तु सज्जनों द्वारा निन्दित हीन
सम्बन्ध को तो कदापि न करे ॥ २४ ॥
वरणसंविधान प्रकरण नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥
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द्वितीय अध्याय
कन्याविस्त्रम्भणप्रकरण
सङ्गतयोस्त्रिरात्रमधःशय्या ब्रह्मचर्यं क्षारलवणवर्जमाहारस्तथा सप्ताहं
सतूर्यमङ्गलस्नानं प्रसाधनं सहभोजनं च प्रेक्षासम्बन्धिनां च पूजनम्। इति
सार्ववर्णिकम् ॥ १ ॥