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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

५० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इन्दव छन्द
जौ दस बीस पचास भये शत,
होहि हजारनि लाख मगैगी ।
कोटि अरब्ब खरब्ब असखि,
पृथीपति होने की चाह जगैगी ॥
स्वर्ग पताल कौ राज करौ,
तृष्णा अधिकी अति आग लगैगी ।
सुन्दर एक सन्तोष बिना शठ,
तेरी तौ भूख न क्यौ ही भगैगी ॥३॥
लाख करोरि अरब्ब खरब्बनि,
नीलि पदम्म तहा लग खाटी ।
जोरि हि जोरि भण्डार भरे सब,
और रही सु जिमी तर दाटी ॥
तोहु न तोहि सतोष भयौ शठ,
सुन्दर तै तृष्णा नही काटी ।
सुझत नाहि न काल सदा सिर,
मारि कै थाप मिलाइ है माटी ॥४॥
(४) जमी तरदाटी -जमीन में गाड दी ।

॥ तृष्णा को अग ॥ [ ५१
भूख लिये दसहू दिस दौरत,
ताहि तैं तूं कबहू न अघै है ।
भूख भण्डार भरै नहि कैसै हु,
जो, धन मेरु कुबेर लौ पै है ॥
तू अब आगै ही हाथ पसारत,
ताहि तै हाथ कछू नहिं ऐहै ।
सुन्दर क्यों नहिं तोष करै नर,
खाइ हि खाइ केतौइक खैहै ॥५॥
भूख नचावत रक हि राज हि,
भूख नचाइकै विश्व विगोई ।
भूख नचावत इन्द्र सुरासुर,
और अनेक जहा लग जोई ॥
भूख नचावत है अध ऊरध,
तीनहू लोक गनै कहा कोई ।
सुन्दर जाइ तहा दुख ही दुख,
ज्ञान बिना न कहू सुख होई ॥६॥
(६) विगोई-विगाड देती है। अध-नीचे के लोक।
ऊरध-ऊपर के लोक ।

५२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
पेट पसार दियौ जितही तित,
तै यह भूख कितीयक थापी ।
ओर न छोर कछू नहि आवत,
मैं बहु भाति भली बिधि मापी ॥
देखत देह भयौ सब जीरन,
तू नित नौतन आहि अद्यापी ।
सुन्दर तोहि सदा समझावत,
हे तृष्णा ! अजहू नही घापी ॥७॥
तीनहू लोक अहार कियौ फिर,
सात समुद्र पियौ सब पानी ।
और जहा तहा ताकत डोलत,
काढत आँखि डरावत प्रानी ॥
दात दिखावत जीभ हलावत,
याहि तें मै यह डाइनि जानी ।
सुन्दर खात भये कितने दिन,
हे तृष्णा ! अजहू न अघानी ॥८॥
(७) जीरन-जीर्ण, जर्जर । नौतन-नूतन, नया ।
अद्यापी-अभी भी ।

॥ तृष्णा को अंग ॥ [ ५३
पांव पताल परै गये नीकसि,
सीस गयौ असमान अघेरौ ।
हाथ दसो दिसि कौं पसरै पुनि,
पेट भरै न समुद्र सुमेरौ ॥
तीनहु लोक लिये मुख भीतरि,
आंखिहु कान बधे चहु फेरौ ।
सुन्दर देह धर्यो अति दीरघ,
हे तृष्णा ! कहुं छेह न तेरौ ॥६॥
बादि वृथा भटकै निस बासर,
दूरि कियौ कबहूं नहि घोषा ।
तूं हथियारीन पापिनि कोठनि,
साच कहू मति मानहि रोषा ॥
तोहि मिल्यौ तबतें भयौ बधन,
तूं मरि है तबही होइ मोषा ।
सुन्दर और कहा कहिये तोहि,
हे तृष्णा ! अब तौ करि तोषा ॥१०॥
(९) अघेरो-आगे । सुमेरौ-सुमेरु पर्वत । (१०) हति-
यारिन-हत्यारी । मोषा-मोक्ष, मुक्ति, छुटकारा ।

५४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
क्यों जग माहि फिरै भख मारत,
स्वारथ कौन पर्यौ जिहि जोलै ।
ज्यौ हरिहाइ गऊ नहि मानत,
दूध दुह्यौ कछु सो पुनि ढोलै ॥
तू अति चंचल हाथ न आवत,
नीकसि जाइ नही मुख बोलै ।
सुन्दर तौहि कह्यो बेरि केतक,
है तृष्णा ! अब तू मति डोलै ॥११॥
तैं कोऊ कान धरी नहि एकहु,
बोलत बोलत पेट ही पाक्यो ।
हौ कोऊ बात बनाइ कहू जब,
त तब पीसत ही सब फाक्यौ ॥
केतक द्यौस भये परमोघत,
तैं अब आगै हि ' को रथ हाक्यौ ।
सुन्दर सीख गई सबही चलि,
हे तृष्णा ' कहि के तोहि थाक्यौ ॥१२॥
(११) हरिहाई-हरा चारा खाने को उतावली ।
(१२) द्यौस-दिवस, दिन । परमोघत-समझाते-समझाते ।
पीसत ही-पीसते पीसते ही ।

॥ तृष्णा को अंग ॥ [ ५५
तूं हि भ्रमाइ प्रदेस पठावत,
बूडत जाइ समुद्र जिहाजा ।
तूं हि भ्रमाइ पहार चढावत,
बादि'वृथा मरि जाइ अकाजा ॥
तै सब लोक नचाइ भली बिधि,
भांड किये सब रंक रु राजा ।
सुन्दर तोहि दुखाइ कहूं अब,
हे तृषणा ! तोहि नैकु न लाजा ॥१३॥
॥ इति तृष्णा को अंग सम्पूर्ण ॥

५६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
॥ अथ अधीरज उराहनैं
को अंग ॥६॥
इन्दव छंद
पाव दिये चलनै फिरनै कोड,
हाथ दिये हरि कृत्त करायौ ।
कान दिये सुनिये हरि को जस,
नैन दीये तिनि माग दिखायौ ॥
नाक दीयौ मुख शोभत ता करि,
जीभ दई हरि को गुन गायौ ।
सुन्दर साज दियौ परमेश्वर,
पेट दियौ परि पाप लगायौ ॥१॥
कूप भरै अरु वापि भरै पुनि,
ताल भरै बरखा रितु तीनौ ।
कोठि भरै घट माट भरै,
घर हाट भरै सब ही भरि लीनौ ॥
खदक खास बुखार भरै परि,
पेट भरै न बडौ दर दीनौ ।
सुन्दर रीतौ ही रीतौ रहै यह,
कौन खडा परमेश्वर कीनौ ॥२॥
(१) अधीरज-अधीरता । उराहना-उलाहना, उपालभ
देना । (२) वापि-बावडी । माट-बडा मटका । खदक-बडा
गढ्ढा । खास-खाई । बुखार-भखारी । दर-गढ्ढा ।

॥ अधीरज उराहने को अग ॥ [ ५७
मनहर छन्द
किधौ पेट चूल्हा किधौ भाठी किधौं भार आइ,
जोई कछु झौंकिये सु सब जरि जातु है ।
किधौं पेट थल किधौ वावी किधौ सागर है,
जितौ जल परै तितौ सकल समातु है ॥
किधौ पेट दैत्य किधौ भूत प्रेत राक्षस है,
खाउ खाउ करै कहू नैकु न अघांतु है ।
सुन्दर कहत प्रभु कौन पाप लायौ पेट,
जबतै जनम भयौ तब ही को खातु है ॥३॥
बिग्रह तौ बिग्रह करत अति बार बार,
तनु पुनि तनुक न कबहू अधायौ है ।
घट न भरत क्यौ ही घट्योई रहत नित,
शरीर रिराइ मैं तौ कछुक न खायौ है ॥
देह देह कहत ही कहत जनम बीत्यौ,
पिंड पिंड काजै निसि दिन ललचायौ है ।
पुदगल गिलत गिलत न तृपत होइ,
सुन्दर कहत बपु कौन पाप लायौ है ॥४॥
(३) किधो-क्या अथवा बनाग । भाटी-भट्टी ।
(४) विग्रह-शरीर या झगडा । तनु-शरीर । तनुक-
थोडा सा भी । रिगइ-रोता ही रहता है । पुदगल-शरीर ।

५८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
पाजी पेट काज कोतवाल कौ अधीन होत,
कोतवाल सु तौ सिकदार आगै लीन है ।
सिकदार दीवान कै पीछै लग्यौ डोलै पुनि,
दीवान हू जाइ पातिसाह आगै दीन है ॥
पातिसाह कहै या खुदाइ मुझै और देइ,
पेट हो पसारै, नहि पेट बसि कौन है ।
सुन्दर कहत प्रभु क्यौ ही नहि भरै पेट,
एक पेट काज एक एक कौ अधीन है ॥५॥
तै तो प्रभु दीयौ पेट जगत नचायौ जिन,
पेट ही के लिये घर घर द्वार फिर्यौ है ।
पेट ही के लिये हाथ जोरि आगै ठाडौ होइ,
जोइ जोइ कह्यौ सोइ सोइ उनि कर्यौ है ॥
पेट ही कै लिये पुनि मेघ सीत घाम सहै,
पेट ही कै लिये जाइ रनु मांहि मर्यौ है ।
सुन्दर कहत इन पेट सब किये भाड,
और गैल छूटी परि पेट गैल पर्यौ है ।॥६॥
(५) सिकदार-फौजदार, सेनापति । दीवान-मन्त्री ।
पातिसाह, राजा, बादशाह ।
(६) रनु-रण, युद्ध । भाड-नाच नाचने वाला ।

इस पृष्ठ/छवि पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है (पृष्ठ रिक्त है)।

६० ] ।। सुन्दर विलास ।।
इन्दव छंद
पेट ही कारन जीव हतैं बहु,
पेट ही माँस भखै रु सुरापी ।
पेट ही लै करि चोरी करावत,
पेट ही कौ गठरी गहि कापी ॥
पेट ही पासि गरे महिं डारत,
पेटहि डारत कूप हु बापी ।
सुन्दर काहे कौ पेट दियौ प्रभु,
पेट सौ और नही कोउ पापी ॥६॥
औरन कौ प्रभु पेट दिये तुम,
तेरैं तौ पेट कहू नहि दीसै ।
ये भटकाइ दिये जित ही तित,
कोऊक राधत कोऊक पीसै ॥
पेट ही कारन नाचत है सब,
ज्यौ घरही घर नाचत कीसै ।
सुन्दर आपु न खाहु न पीयहु,
कौन करी इन ऊपर रीसै ॥१०॥
(६) सुरापी-शराब पीने वाला । कापी-काटता है ।
बापी-बावडी ।
(१०) कीसे-बंदर । रीसे-क्रोध, नाराजी । (११) इकत-
एकांत स्थान ।

॥ अधीरज उराहने को अग ॥ [ ६१
मनहर छंद
काहे कौ काहू कै आगै जाइ कै अधीन होइ,
दीन दीन बचन उचार मुख कहते ।
जिनकै तौ मद अरु गरब गुमान अति,
तिनकै कठोर बैन कबहु न सहते ॥
तुम्हारे ही भजन सौं अधिक लै लीन श्रति,
सकल कौ त्यागि कै इकंत जाइ गहते ।
सुन्दर कहत यह तुमही लगायौ पाप,
पेट न हुतौ तौ प्रभु बैठे हम रहते ॥११॥
पेट ही कै बसि रक पेट ही कै बसि राव,
पेट ही कै बसि और खान सुलतान है ।
पेट ही कै बसि योगी जगम सन्यासी सेख,
पेट ही कै बसि बनवासी खात पान है ॥
पेट ही कै बसि रिषि मुनि तपधारी सब,
पेट ही कै बसि सिद्ध साधक सुजान है ।
सुन्दर कहत नही काहू कौ गुमाँन रहै,
पेट ही कै बसि प्रभु सकल जिहान है ॥१२॥
॥ इति अधीरज उराहने को अंग सम्पूर्ण ॥
(१२) जिहान-ससार ।

६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ विश्वास को अग ॥७॥
इन्दव छंद
होहि निचित करै मत चिंत हि,
चच दई सोई चित करैगौ ।
पाव पसारि पर्यौ किन सोवत,
पेट दियौ सोइ पेट भरैगौ ॥
जीव जिते जल के थल के पुनि,
पाहन मै पहुचाइ धरैगौ ।
भूख ही भूख पुकारत है नर,
सुन्दर तू कहा भूख मरैगौ ॥१॥
धीरज धारि बिचार निरतर,
तोहि रच्यौ सु तौ आपुहि अ्रै है ।
जेतिक भूख लगी घट प्रान ही,
तेतिक तू श्रनयासहि पै है ॥
जौ मन मैं तृषणा करि धावत,
तौ तिहु लोक न खात अधै है ।
सुन्दर तू मति सोच करै कछु,
चच दई सोई चूनिहु दै है ॥२॥


  • (१) चिंत-चिंता । चच-चोंच, मुह । (२) चूनि-
    भोजन । अनयास-अनायास, बिना परिश्रम के ।

॥ विश्वास को अंग ॥ [ ६३
नैकु न धीरज धारत है नर,
आतुर होइ दसौ दिस धावै ।
ज्यौ पसु खेचि तुडावत बंधन,
जौ लग नीर न आवै ही आवै ॥
जानत नाहि महामति मूरख,
जा घर द्वार धनी पहुचावै ।
सुन्दर आपु कियौ घडि भाजन,
सो भरि है मति सोच उपावै ॥३॥
भाजन आपु घड्यौ जिनि तौ,
भरि है भरि है भरि है भरि हैं जू ।
गावत है तिनकें गुन कौ,
ढरि है ढरि हैं ढरि है ढरि है जू ॥
सुन्दर दास सहाइ सही,
करि है करि है करि है करि है जू ।
आदि हू अंत हू मध्य सदा,
हरि है हरि है हरि हैं हरि है जू ॥४॥
काहे कौ दौरत है दशहू दिश,
तू नर देखि कियौ हरि जू कौ ।
बैठि रहै दुरिकै मुख मूंदि,
उघारिकै दात खवाइ है टूकौ ॥
(३) नीर-चारा । भाजन-शरीर रूपी वर्तन । धनी-
स्वामी । (४) ढरि है-दया करेगे । दुरिके-दुबक कर ।

६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
गर्भ थकै प्रतिपाल करी जब,
होइ रह्यौ तब तू जड मूकौ ।
सुन्दर क्यो बिललात फिरै अब,
राखि हृदै बिसवास प्रभू कौ ॥५॥
जा दिनतै गर्भवास तज्यौ नर,
आइ अहार लियौ तबही कौ ।
खात हि खात भये इतने दिन,
जानत नाहि न भूछ कही कौ ॥
दौरत धावत पेट दिखावत,
तू शठ कीट सदा अन ही कौ ।
सुन्दर क्यौ बिसवास न राखत,
सो प्रभु विश्व भरै कबही कौ ॥६॥
खेचर भूचर जे जल के चर,
देत अहार चराचर पोखै ।
वे हरि जू सब कौ प्रतिपालत,
जो जिहि भाति तिसी बिधि तोखै ॥
तू अब क्यौ बिसवास न राखत,
भूलत है कत धोखै ही धोखै ।
तोहि तहा पहुचाइ रहै प्रभु,
सुन्दर बैठि रहै किन ओखै ॥७॥
(६) भूछ-मुख ।
(७) ओखै-गुप्त स्थान ।

॥ विश्वास को अंग ॥ [ ६५
मनहर छंद
काहे कौं बघूरा भयौ फिरत अज्ञानी नर,
तेरं तौ रिजक तेरै घर बैठे आइ है ।
भावै तू सुमेर जाहि भावै जाहि मारू देश,
जितनैक भाग लिख्यौ तितनैक पाइ है ।
कूप माझ भरि भावै सागर कै तीर भरि,
जितनोंक भाडौ, नीर तितनौ समाइ है ।
ताहि ते सतोष करि सुन्दर बेसास धरि,
जिनतौ रच्यौ है घट सोई जू भराई है ॥८॥
काहे को करत नर उद्यम अनेक भाति,
जीवन है थोरो तातै कल्पना निवारिये ।
साढे तीन हाथ देह छिनक मे छूटि जाय,
ताके लिए ऊचे ऊचे मन्दिर सवारिये ।
माल हू मुलक भये तृपति न क्यो ही होय,
आगे ही को पसरत इन्द्रिय क्यो न मारिये ।
सुन्दर कहत तोहि बावरे समझि देख,
जितनीक सोर पाँव तितने पसारिये ॥६॥
काहे कौं फिरत नर दीन भयौ घर घर,
देखियत तेरौ तौ अहार एक सेर है ।
जाको देह सागर मैं सुनी शत ज जन की,
ताहू कौ तौ देत प्रभु यामैं नहि फेर है ॥

६६ ] ।। सुन्दर विलास ।।
भूखौ कोऊ रहत न जानिये जगत माहि,
कीरी अरु कुजर सबनि ही कौ देत है ।
सुन्दर कहत तूं बेसास क्यौ न राखै शठ,
बार बार समुझाइ कह्यौ केती बेर है ॥१०॥
तेरे तौ अधीरज तू आगिली ही चित करे,
आज तौ भर्यौ है पेट काल्हि कैसी होइ है ।
भूखौ ही पुकारै अरु दिन उठि खातौ जाइ,
श्रुति ही अज्ञानी जाकी मति गई खोइ है ॥
ताकौं नहिं जानै शठ जाकौ नाम विश्वभर,
जहा तहा प्रगट सबनि देत सोइ है ।
सुन्दर कहत तोहि वाकौ तौ भरौसौ नाहि,
एक बिसवास बिन याही भांति रोइ है ॥११॥
देखि धौं सकल विश्व भरत भरनहार,
चूंच कै समान चूनि सबही कौ देत है ।
कीट पशु पखि मच्छ कच्छ अजगर पुनि,
उनकै न सौदा कोऊ न तौ कछु खेत है ॥
पेट ही कै काज रात दिवस भ्रमत शठ,
मैं तौ जान्यौ नीकै करि तू तौ कोऊ प्रेत है ।
मानुष सरीर पाइ करत है हाइ हाइ,
सुन्दर कहत नर तेरै सिर रेत है ॥१२॥
(१०) जोजन-योजन, चार कोस । शत-सौ ।

॥ विश्वास को अंग ॥ [ ६७'
तूं तौ भयौ बावरौ उतावरौ फिरत अति,
प्रभु कौ बेसास गहि काहे न रहतु है ।
तेरौ तौ रिजक है सु आइ है सहज माहि,
यौ हि चिंता करि करि देह कौ दहतु है ॥
जिनि यह नख सिख साजिकै सवार्यौ तोहि,
अपने किये की सोइ लाज कौ बहुतु है ।
काहे कौ अज्ञानी कछु सोच मन माहि करै,
भूखौ तू कदै न रहै सुन्दर कहतु है ॥१३॥
जगत मैं आइ तैं बिसार्यौ है जगतपति,
जगत कियौ है सोई जगत भरतु है ।
तेरै चिंता निश दिन और ई परी है आइ,
उद्यम अनेक भांति भांति के करतु है ॥
इत उत जाइकै कमाइ करि ल्याऊ कछु,
नैकु न अज्ञानी नर धीरज धरतु है ।
सुन्दर कहत एक प्रभु के विश्वास बिन,
वादि कै वृथा ही शठ पचिकै मरतु है ॥१४॥
॥ इति विश्वास को अंग सम्पूर्ण ॥

६८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ देहमलिनता व गर्वप्रहार
को अंग ॥८॥
मनहर छंद
देह तौ मलीन अति बहुत विकार भरे,
ताहू माहि जरा व्याधि सब दुख राशी है ।
कबहूक पेट पीर कबहूक सिर वाहि,
कबहूक आंखि कान मुख मै विथासी है ॥
औरऊ अनेक रोग नख सिख पूरि रहे,
कबहूं क श्वास चले कबहूक खासी है ।
ऐसौ या शरीर ताहि आपुनौ के मानत हैं,
सुन्दर कहत यामैं कौन सुखवासी है ॥१॥
जा शरीर माहि तू अनेक सुख मानि रह्यौ,
ताही तू बिचार यामैं कौन बात भली है ।
मेद मज्जा मास रस, रकत रगनि माहि,
पेट हू पिटारी सी मैं ठौर ठौर मली है ॥
हाडनि सौं मुख भर्यौ हाड ही कै नैन नाक,
हाथ पाव' सोऊ सब हाड ही की नली है ।
सुन्दर कहत याहि देखि जनि भूलै कोइ,
भीतरि भगार भरि ऊपरि तैं कली है ॥२॥
(१) बिथा-व्यथा, पीडा, दर्द । (२) मली-मैला, मल-
मूत्र आदि । भगार-रद्दी भद्दी चीजें । कली सुन्दर ।

॥ देहमलिनता व गर्वप्रहार को अंग ॥ [ ६६
इन्दव छन्द
हाड कौ पिंजर चाम मढ्‌यौ सब,
माहि भर्‌यौ मल मूत्र बिकारा ।
थूक रु लार परै मुख ते पुनि,
व्याधि बहै सब और हु द्वारा ॥
मांस को जीभ सों खाइ सबै कछु,
ताहि ते ताकौ है कौन बिचारा ।
ऐसै शरीर मैं पैसि कै सुन्दर,
कैसैक कीजिये शुच्य अचारा ॥३॥
थूक रु लार भर्‌यौ मुख दीसत,
आंखि मैं गीड रु नाक मैं सेंढ़ौ ।
औरऊ द्वार मलीन रहै नित,
हाड के मांस के भीतर भेदौ ॥
ऐसै शरीर मैं बास कियौ तब,
एक से दीसत बामन ढेढौ ।
सुन्दर गर्व कहा इतने पर,
काहेकौ तूं नर चालत टेढौ ॥४॥
(३) शुच्य- शुद्ध ।
(४) भेदौ-चर्बी, मज्जा । बामन-ब्राह्मण ।