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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

॥ विश्वास को अंग ॥ [ ६५
मनहर छंद
काहे कौं बघूरा भयौ फिरत अज्ञानी नर,
तेरं तौ रिजक तेरै घर बैठे आइ है ।
भावै तू सुमेर जाहि भावै जाहि मारू देश,
जितनैक भाग लिख्यौ तितनैक पाइ है ।
कूप माझ भरि भावै सागर कै तीर भरि,
जितनोंक भाडौ, नीर तितनौ समाइ है ।
ताहि ते सतोष करि सुन्दर बेसास धरि,
जिनतौ रच्यौ है घट सोई जू भराई है ॥८॥
काहे को करत नर उद्यम अनेक भाति,
जीवन है थोरो तातै कल्पना निवारिये ।
साढे तीन हाथ देह छिनक मे छूटि जाय,
ताके लिए ऊचे ऊचे मन्दिर सवारिये ।
माल हू मुलक भये तृपति न क्यो ही होय,
आगे ही को पसरत इन्द्रिय क्यो न मारिये ।
सुन्दर कहत तोहि बावरे समझि देख,
जितनीक सोर पाँव तितने पसारिये ॥६॥
काहे कौं फिरत नर दीन भयौ घर घर,
देखियत तेरौ तौ अहार एक सेर है ।
जाको देह सागर मैं सुनी शत ज जन की,
ताहू कौ तौ देत प्रभु यामैं नहि फेर है ॥