सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ विश्वास को अग ॥७॥
इन्दव छंद
होहि निचित करै मत चिंत हि,
चच दई सोई चित करैगौ ।
पाव पसारि पर्यौ किन सोवत,
पेट दियौ सोइ पेट भरैगौ ॥
जीव जिते जल के थल के पुनि,
पाहन मै पहुचाइ धरैगौ ।
भूख ही भूख पुकारत है नर,
सुन्दर तू कहा भूख मरैगौ ॥१॥
धीरज धारि बिचार निरतर,
तोहि रच्यौ सु तौ आपुहि अ्रै है ।
जेतिक भूख लगी घट प्रान ही,
तेतिक तू श्रनयासहि पै है ॥
जौ मन मैं तृषणा करि धावत,
तौ तिहु लोक न खात अधै है ।
सुन्दर तू मति सोच करै कछु,
चच दई सोई चूनिहु दै है ॥२॥
- (१) चिंत-चिंता । चच-चोंच, मुह । (२) चूनि-
भोजन । अनयास-अनायास, बिना परिश्रम के ।