सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ देहमलिनता व गर्वप्रहार को अंग ॥ [ ६६
इन्दव छन्द
हाड कौ पिंजर चाम मढ्यौ सब,
माहि भर्यौ मल मूत्र बिकारा ।
थूक रु लार परै मुख ते पुनि,
व्याधि बहै सब और हु द्वारा ॥
मांस को जीभ सों खाइ सबै कछु,
ताहि ते ताकौ है कौन बिचारा ।
ऐसै शरीर मैं पैसि कै सुन्दर,
कैसैक कीजिये शुच्य अचारा ॥३॥
थूक रु लार भर्यौ मुख दीसत,
आंखि मैं गीड रु नाक मैं सेंढ़ौ ।
औरऊ द्वार मलीन रहै नित,
हाड के मांस के भीतर भेदौ ॥
ऐसै शरीर मैं बास कियौ तब,
एक से दीसत बामन ढेढौ ।
सुन्दर गर्व कहा इतने पर,
काहेकौ तूं नर चालत टेढौ ॥४॥
(३) शुच्य- शुद्ध ।
(४) भेदौ-चर्बी, मज्जा । बामन-ब्राह्मण ।