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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

५८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
पाजी पेट काज कोतवाल कौ अधीन होत,
कोतवाल सु तौ सिकदार आगै लीन है ।
सिकदार दीवान कै पीछै लग्यौ डोलै पुनि,
दीवान हू जाइ पातिसाह आगै दीन है ॥
पातिसाह कहै या खुदाइ मुझै और देइ,
पेट हो पसारै, नहि पेट बसि कौन है ।
सुन्दर कहत प्रभु क्यौ ही नहि भरै पेट,
एक पेट काज एक एक कौ अधीन है ॥५॥
तै तो प्रभु दीयौ पेट जगत नचायौ जिन,
पेट ही के लिये घर घर द्वार फिर्यौ है ।
पेट ही के लिये हाथ जोरि आगै ठाडौ होइ,
जोइ जोइ कह्यौ सोइ सोइ उनि कर्यौ है ॥
पेट ही कै लिये पुनि मेघ सीत घाम सहै,
पेट ही कै लिये जाइ रनु मांहि मर्यौ है ।
सुन्दर कहत इन पेट सब किये भाड,
और गैल छूटी परि पेट गैल पर्यौ है ।॥६॥
(५) सिकदार-फौजदार, सेनापति । दीवान-मन्त्री ।
पातिसाह, राजा, बादशाह ।
(६) रनु-रण, युद्ध । भाड-नाच नाचने वाला ।