सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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६० ] ।। सुन्दर विलास ।।
इन्दव छंद
पेट ही कारन जीव हतैं बहु,
पेट ही माँस भखै रु सुरापी ।
पेट ही लै करि चोरी करावत,
पेट ही कौ गठरी गहि कापी ॥
पेट ही पासि गरे महिं डारत,
पेटहि डारत कूप हु बापी ।
सुन्दर काहे कौ पेट दियौ प्रभु,
पेट सौ और नही कोउ पापी ॥६॥
औरन कौ प्रभु पेट दिये तुम,
तेरैं तौ पेट कहू नहि दीसै ।
ये भटकाइ दिये जित ही तित,
कोऊक राधत कोऊक पीसै ॥
पेट ही कारन नाचत है सब,
ज्यौ घरही घर नाचत कीसै ।
सुन्दर आपु न खाहु न पीयहु,
कौन करी इन ऊपर रीसै ॥१०॥
(६) सुरापी-शराब पीने वाला । कापी-काटता है ।
बापी-बावडी ।
(१०) कीसे-बंदर । रीसे-क्रोध, नाराजी । (११) इकत-
एकांत स्थान ।