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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

६६ ] ।। सुन्दर विलास ।।
भूखौ कोऊ रहत न जानिये जगत माहि,
कीरी अरु कुजर सबनि ही कौ देत है ।
सुन्दर कहत तूं बेसास क्यौ न राखै शठ,
बार बार समुझाइ कह्यौ केती बेर है ॥१०॥
तेरे तौ अधीरज तू आगिली ही चित करे,
आज तौ भर्यौ है पेट काल्हि कैसी होइ है ।
भूखौ ही पुकारै अरु दिन उठि खातौ जाइ,
श्रुति ही अज्ञानी जाकी मति गई खोइ है ॥
ताकौं नहिं जानै शठ जाकौ नाम विश्वभर,
जहा तहा प्रगट सबनि देत सोइ है ।
सुन्दर कहत तोहि वाकौ तौ भरौसौ नाहि,
एक बिसवास बिन याही भांति रोइ है ॥११॥
देखि धौं सकल विश्व भरत भरनहार,
चूंच कै समान चूनि सबही कौ देत है ।
कीट पशु पखि मच्छ कच्छ अजगर पुनि,
उनकै न सौदा कोऊ न तौ कछु खेत है ॥
पेट ही कै काज रात दिवस भ्रमत शठ,
मैं तौ जान्यौ नीकै करि तू तौ कोऊ प्रेत है ।
मानुष सरीर पाइ करत है हाइ हाइ,
सुन्दर कहत नर तेरै सिर रेत है ॥१२॥
(१०) जोजन-योजन, चार कोस । शत-सौ ।