सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ विश्वास को अंग ॥ [ ६३
नैकु न धीरज धारत है नर,
आतुर होइ दसौ दिस धावै ।
ज्यौ पसु खेचि तुडावत बंधन,
जौ लग नीर न आवै ही आवै ॥
जानत नाहि महामति मूरख,
जा घर द्वार धनी पहुचावै ।
सुन्दर आपु कियौ घडि भाजन,
सो भरि है मति सोच उपावै ॥३॥
भाजन आपु घड्यौ जिनि तौ,
भरि है भरि है भरि है भरि हैं जू ।
गावत है तिनकें गुन कौ,
ढरि है ढरि हैं ढरि है ढरि है जू ॥
सुन्दर दास सहाइ सही,
करि है करि है करि है करि है जू ।
आदि हू अंत हू मध्य सदा,
हरि है हरि है हरि हैं हरि है जू ॥४॥
काहे कौ दौरत है दशहू दिश,
तू नर देखि कियौ हरि जू कौ ।
बैठि रहै दुरिकै मुख मूंदि,
उघारिकै दात खवाइ है टूकौ ॥
(३) नीर-चारा । भाजन-शरीर रूपी वर्तन । धनी-
स्वामी । (४) ढरि है-दया करेगे । दुरिके-दुबक कर ।