सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ अधीरज उराहने को अग ॥ [ ६१
मनहर छंद
काहे कौ काहू कै आगै जाइ कै अधीन होइ,
दीन दीन बचन उचार मुख कहते ।
जिनकै तौ मद अरु गरब गुमान अति,
तिनकै कठोर बैन कबहु न सहते ॥
तुम्हारे ही भजन सौं अधिक लै लीन श्रति,
सकल कौ त्यागि कै इकंत जाइ गहते ।
सुन्दर कहत यह तुमही लगायौ पाप,
पेट न हुतौ तौ प्रभु बैठे हम रहते ॥११॥
पेट ही कै बसि रक पेट ही कै बसि राव,
पेट ही कै बसि और खान सुलतान है ।
पेट ही कै बसि योगी जगम सन्यासी सेख,
पेट ही कै बसि बनवासी खात पान है ॥
पेट ही कै बसि रिषि मुनि तपधारी सब,
पेट ही कै बसि सिद्ध साधक सुजान है ।
सुन्दर कहत नही काहू कौ गुमाँन रहै,
पेट ही कै बसि प्रभु सकल जिहान है ॥१२॥
॥ इति अधीरज उराहने को अंग सम्पूर्ण ॥
(१२) जिहान-ससार ।