सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ तृष्णा को अंग ॥ [ ५५
तूं हि भ्रमाइ प्रदेस पठावत,
बूडत जाइ समुद्र जिहाजा ।
तूं हि भ्रमाइ पहार चढावत,
बादि'वृथा मरि जाइ अकाजा ॥
तै सब लोक नचाइ भली बिधि,
भांड किये सब रंक रु राजा ।
सुन्दर तोहि दुखाइ कहूं अब,
हे तृषणा ! तोहि नैकु न लाजा ॥१३॥
॥ इति तृष्णा को अंग सम्पूर्ण ॥