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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 284 में से

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पृष्ठ 76

॥ विश्वास को अंग ॥ [ ६७'
तूं तौ भयौ बावरौ उतावरौ फिरत अति,
प्रभु कौ बेसास गहि काहे न रहतु है ।
तेरौ तौ रिजक है सु आइ है सहज माहि,
यौ हि चिंता करि करि देह कौ दहतु है ॥
जिनि यह नख सिख साजिकै सवार्यौ तोहि,
अपने किये की सोइ लाज कौ बहुतु है ।
काहे कौ अज्ञानी कछु सोच मन माहि करै,
भूखौ तू कदै न रहै सुन्दर कहतु है ॥१३॥
जगत मैं आइ तैं बिसार्यौ है जगतपति,
जगत कियौ है सोई जगत भरतु है ।
तेरै चिंता निश दिन और ई परी है आइ,
उद्यम अनेक भांति भांति के करतु है ॥
इत उत जाइकै कमाइ करि ल्याऊ कछु,
नैकु न अज्ञानी नर धीरज धरतु है ।
सुन्दर कहत एक प्रभु के विश्वास बिन,
वादि कै वृथा ही शठ पचिकै मरतु है ॥१४॥
॥ इति विश्वास को अंग सम्पूर्ण ॥