सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 60

॥ तृष्णा को अग ॥ [ ५१
भूख लिये दसहू दिस दौरत,
ताहि तैं तूं कबहू न अघै है ।
भूख भण्डार भरै नहि कैसै हु,
जो, धन मेरु कुबेर लौ पै है ॥
तू अब आगै ही हाथ पसारत,
ताहि तै हाथ कछू नहिं ऐहै ।
सुन्दर क्यों नहिं तोष करै नर,
खाइ हि खाइ केतौइक खैहै ॥५॥
भूख नचावत रक हि राज हि,
भूख नचाइकै विश्व विगोई ।
भूख नचावत इन्द्र सुरासुर,
और अनेक जहा लग जोई ॥
भूख नचावत है अध ऊरध,
तीनहू लोक गनै कहा कोई ।
सुन्दर जाइ तहा दुख ही दुख,
ज्ञान बिना न कहू सुख होई ॥६॥
(६) विगोई-विगाड देती है। अध-नीचे के लोक।
ऊरध-ऊपर के लोक ।