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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 284 में से

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पृष्ठ 62

॥ तृष्णा को अंग ॥ [ ५३
पांव पताल परै गये नीकसि,
सीस गयौ असमान अघेरौ ।
हाथ दसो दिसि कौं पसरै पुनि,
पेट भरै न समुद्र सुमेरौ ॥
तीनहु लोक लिये मुख भीतरि,
आंखिहु कान बधे चहु फेरौ ।
सुन्दर देह धर्यो अति दीरघ,
हे तृष्णा ! कहुं छेह न तेरौ ॥६॥
बादि वृथा भटकै निस बासर,
दूरि कियौ कबहूं नहि घोषा ।
तूं हथियारीन पापिनि कोठनि,
साच कहू मति मानहि रोषा ॥
तोहि मिल्यौ तबतें भयौ बधन,
तूं मरि है तबही होइ मोषा ।
सुन्दर और कहा कहिये तोहि,
हे तृष्णा ! अब तौ करि तोषा ॥१०॥
(९) अघेरो-आगे । सुमेरौ-सुमेरु पर्वत । (१०) हति-
यारिन-हत्यारी । मोषा-मोक्ष, मुक्ति, छुटकारा ।