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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 356 में से

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पृष्ठ 84

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[शीर्षक / Header]
48 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

पीत्वा चाम्बरपीयूषं पुनरायाति वेगतः ।। 90 ।।
प्रीणयन् देहमखिलं जीवयञ्जठरानलम् ।
नाभि (पक्वाशय तथा आमाशय के बीच) में रहने वाली
प्राणवायु हृदय के भीतरी भाग को स्पर्श करती हुई कण्ठ या
श्वास मार्ग से बाहर विष्णुपद (आकाश) के अमृत का पान
करने के लिए निकलती है और आकाश के अमृत (प्राणवायु)
को पीकर शीघ्र ही फिर शरीर में प्रविष्ट हो जाती है। इस
प्रकार जीवन भर सम्पूर्ण शरीर को तृप्त तथा प्रसन्न कर
जठराग्नि को प्रदीप्त करती रहती है।
वक्तव्य—प्राणवायु नाभि से चलकर हृदय, फुप्फुस और
कण्ठ से होता हुआ श्वास के रूप में बाहर निकलता है और
आकाश में सदैव व्याप्त रहने वाले अमृत को पीकर फिर
प्रश्वास के रूप में शरीर में चला जाता है। यह क्रिया जीवनभर
निरन्तर होती रहती है। इस श्वास-प्रश्वास क्रिया से प्राणी
प्रसन्न रहता है और अग्नि दीप्त होती है, क्योंकि 'एषः ह वा
अग्नेर्योनिः यः प्राणः' (जाबालोपनिषद्) अर्थात् यह प्राण ही
अग्नि या जठराग्नि की योनि (कारण) है।

जीवन-मरण परिभाषा
शरीरप्राणयोरेवं संयोगादायुरुच्यते ।। 91 ।।
कालेन तद्वियोगाच्च पञ्चत्वं कथ्यते बुधैः ।
उपर्युक्त प्रकार से शरीर तथा प्राणवायु के संयोग को
आयुः या जीवन कहा जाता है। काल या समय से उन (शरीर
और प्राण) का वियोग होने से विद्वान् लोग उसे 'पञ्चत्व'
('मृत्यु') कहते हैं।
वक्तव्य—तात्पर्य यह है कि जितने समय तक शरीर
और प्राण का संयोग या मेल रहता है, उतने समय का नाम
'आयु' है। जब शरीर से सदा के लिए प्राणवायु निकल जाता
है, तो 'मृत्यु' हो जाती है।

रोग-निवृत्ति का महत्त्व
न जन्तुः कश्चिदमरः पृथिव्यां जायते क्वचित् ।। 92 ।।
अतो मृत्युरवार्यः स्यात् किन्तु रोगान्निवारयेत् ।
इस संसार में कहीं भी कोई प्राणी अमर (न मरने वाला)
नहीं उत्पन्न होता। मृत्यु तो अवश्यंभावी है। इसलिये रोगों का
निवारण अवश्य करना चाहिये।
वक्तव्य—'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः' (गीता)। रोगों की
चिकित्सा करके अकाल मृत्यु रोकी जाती है, क्योंकि रोगों के
कारण प्राणी अकाल में ही मर जाते हैं (सं० वि० अ० 3 तथा


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

च० शा० अ० 6)। तात्पर्य यह है कि सौ वर्ष के भीतर यदि
कोई मरता है, तो अकाल में मरता है, क्योंकि 'शतायुर्वे
पुरुषः, इति श्रुतिः'।

चिकित्सा का महत्त्व
याप्यत्वं याति साध्यस्तु याप्यो गच्छत्यसाध्यताम् ।। 93 ।।
जीवितं हन्त्यसाध्यस्तु नरस्याऽप्रतिकारिणः ।
जो मनुष्य उचित समय पर अपने रोग की चिकित्सा
नहीं करवाता है, उसका साध्य (चिकित्सा से दूर हो जाने
योग्य) रोग याप्य (जो रोग चिकित्सा करते समय दवा रहता
है) हो जाता है और याप्य रोग असाध्य हो जाता है तथा
असाध्य रोग जीवन को नष्ट कर देता है।
वक्तव्य—जहाँ तक हो सके शीघ्र ही रोग की चिकित्सा
करा लेनी चाहिये।

रोगनिवारण-निर्देश
धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं यतः ।। 94 ।।
अतो रुग्ण्यस्तनुं रक्षेन्नरः कर्मविपाकवित् ।
क्योंकि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन (प्राप्ति
का उपाय) शरीर ही है। इसलिये कर्म के परिणाम को जानने
वाला मनुष्य रोगों से अपने शरीर की रक्षा करे।
वक्तव्य—जब तक मनुष्य स्वस्थ या नीरोग है, तभी तक
वह उक्त चारों पदार्थों की प्राप्ति कर सकता है। अन्यथा
कर्मण्य भी अकर्मण्य होकर पड़ा रहता है और कष्ट भोगता
रहता है। इसलिये प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह
सर्वतोभावेन शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग बनाये रखें।

समदोष का महत्त्व
धातवस्तन्मला दोषा नाशयन्त्यसमास्तनुम् ।। 95 ।।
समाः सुखाय विज्ञेया बलायोपचयाय च ।
रस, रक्त आदि धातुओं उनके मल और वात आदि दोष
जब विषम (विकृत) हो जाते हैं, तो शरीर को रुग्ण या नष्ट
कर देते हैं। जब वे सम (प्रकृतिस्थ या अविकृत) रहते हैं, तो
सुख, बल और पुष्टि के कारण होते हैं।
वक्तव्य—'दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्'। (सु० सू० अ०
15) अर्थात् दोष (वातादि), धातु (रसादि), एवं मल ये
शरीर के कारण हैं। जब ये सभी प्रकृतिस्थ रहते हैं, तो शरीर
सुखी रहता है, अन्यथा रोगी हो जाता है अथवा मृत्यु हो जाती
है।