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सर्वकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 356 में से

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पृष्ठ 90

54 शाङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
--- [स्तम्भ १ / Column 1] ---
जठराग्नि के कार्य
ग्रहण्यां पच्यते कोष्ठवह्निना जायते कटुः ।। 7 ।।
रसो भवति सम्यक्त्वादपक्वादासम्भवः ।
उक्त ग्रहणी में आहार जठराग्नि से पचता है, तदनन्तर उसका स्वाद कटु या चरपरा हो जाता है। भली-भाँति पाक होने से रस आहार में से पृथक् हो जाता है, अन्यथा आम (कच्चा) रह जाता है।
**वक्तव्य—**जठराग्नि अर्थात् पाचक पित्त स्वयं कटु है, अतः उसके प्रभाव से आहार भी कटु हो जाता है। रस आहार में पृथक् हो गया तो वह रसवाहिनियों द्वारा शरीर-पोषणार्थ हृदय की ओर चला जाता है, अन्यथा आम के रूप में गुदमार्ग से निकल जाता है।
रस-परिपाक
वह्नेर्बलेन माधुर्यं स्निग्धतां याति तद्रसः ।। 8 ।।
पुष्णाति धातूनखिलान् सम्यक् पक्वोऽमृतोपमः ।
आहार का वह रस जठराग्नि की शक्ति से भली-भाँति परिपक्व होकर मधुरता और स्निग्धता को प्राप्त हो जाता है और शरीर की सब धातुओं को पुष्ट करता है, अतएव वह अमृत के समान होता है।
**वक्तव्य—**इस आहार रस में सब धातुओं के पोषकतत्त्व रहते हैं और यही जीवन की रक्षा भी करता है।
अपक्वरस से हानि
मन्दवह्निविदग्धश्च कटुश्चाम्लो भवेद् रसः ।। 9 ।।
विषभावं व्रजेद् वापि कुर्याद् वा रोगसङ्करम् ।
वह रस जठराग्नि की मन्दता के कारण यदि भली-भाँति परिपक्व नहीं होता तो कडुवा एवं खट्टा हो जाता है और विषभाव को प्राप्त हो जाता है, अथवा अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देता है।
**वक्तव्य—**मन्दाग्नि के कारण रस का सम्यक् परिपाक न होने से 'दण्डालसक' नामक रोग हो जाता है। इसके लक्षण विष के लक्षणों के समान होते हैं। यह आशुकारी या शीघ्रमारक होता है। यदि सौभाग्य से उक्त रोग न हुआ तो विसूची, अलसक एवं आमवातादि रोग हो जाते हैं। देखें- च० वि० अ० 2 तथा वाग्भट सू० अ० 8 ।
रस, मल, मूत्र तथा वली परिचय
आहारस्य रसः सारः सारहीनो मलद्रवः ।। 10 ।।
शिराभिस्तज्जलं नीतं बस्ती मूत्रत्वमाप्नुयात् ।
--- [स्तम्भ २ / Column 2] ---
तत् किट्टं च मलं ज्ञेयं तिष्ठेत् पक्वाशये च तत् ।। 11 ।।
वलित्रितयमार्गेण यात्यपानेन नोदितम् ।
प्रवाहिणी सर्जनी च ग्राहिकेति वलित्रयम् ।। 12 ।।
आहार का सारभाग 'रस' बन जाता है और साररहित भाग 'मलद्रव' (पतला मल) होता है। और उस 'मलद्रव' का जलभाग सिराओं द्वार वस्ति (मूत्राशय) में पहुँचाया हुआ 'मूत्र' बन जाता है। उस मलद्रव का किट्ट भाग अर्थात् गाढ़ा हिस्सा मल (पुरीष) बन जाता है। वह मलाशय में अवस्थित रहता है। वह समय-समय पर अपानवायु द्वारा प्रेरित किया हुआ तीन वलियों से निर्मित मार्ग (गुद) में से होकर बाहर निकल जाता है। इन वलियों के ये नाम हैं- 1. प्रवाहिणी (मल को प्रवाहित करने वाली), 2. सर्जनी (मल को त्यागने वाली) और 3. ग्राहिका या ग्राहिणी (निकलते हुये मल को यथावश्यक रोकने वाली)।
रक्तनिर्माण-प्रक्रिया
रसस्तु हृदयं याति समानमरुतेरितः ।
रञ्जितः पाचितो यः स पित्तेनायाति रक्तताम् ।। 13 ।।
वह रस समान वायु द्वारा प्रेरित होकर हृदय में चला जाता है और जो रंजक पित्त द्वारा रंजित तथा पाचित होता है, वही 'रक्त' बन जाता है।
वक्तव्य— 'रस गतौ' धातु से 'रस' शब्द का निर्माण होता है। इसका अर्थ है कि वह सदा चलता रहता है- 'रसति अहरहः गच्छति इत्यतो रसः'। इस रस का स्थान हृदय है और यह वहाँ से चलकर प्रतिदिन सम्पूर्ण शरीर का तर्पण, पोषण एवं सञ्चालन करता है और यह पोषक रस यकृत एवं प्लीहा में जाकर राग को प्राप्त कर रक्त बन जाता है। देखें- सु० सू० अ० 14 ।
रक्त का महत्त्व
रक्तं सर्वशरीरस्थं जीवस्याधारमुत्तमम् ।
स्निग्धं गुरु चलं स्वादु विदग्धं पित्तवद् भवेत् ।। 14 ।।
वह रक्त (रंगा हुआ रस) सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है और वह जीवात्मा का सर्वश्रेष्ठ आधार है। वह स्नेहयुक्त है, जल की अपेक्षा गुरु है, सदा चलता रहता है और स्वादु (कुछ नमकीन स्वाद वाला) है। जब कभी वह विकृत हो जाता है, तो पित्त के समान अर्थात् खट्टा हो जाता है।
**वक्तव्य—**जो रस रक्तरूप में शरीर के सम्पूर्ण अवयवों, दोषों, धातुओं एवं मलों में अनुसरण करता रहता है, वह