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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 356 में से

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पृष्ठ 87

पञ्चमोऽध्यायः ] कलादिकाख्यानम् 51
प्रधान, प्रकृति, शक्ति, नित्या एवं अविकृति ये उस प्रकृति
के नाम हैं, जो शिव (ईश्वर) के आश्रित होकर रहती है।
वक्तव्य-प्रकृति के उक्त नाम सार्थक हैं। यथा-प्रधान
सब तत्त्वों में प्रधान है अथवा इसी से वे धारण किये जाते हैं।
प्रकृति-यह स्वभाव-सिद्ध है। शक्ति-इसी से ईश्वर जगद्योनि
होने में समर्थ होता है। नित्या-ईश्वर के समान यह नित्य
अर्थात् शाश्वत है। अविकृति-वह किसी की विकृति अर्थात्
विकार या कार्य नहीं है, अर्थात् उसको किसी ने उत्पन्न नहीं
किया। 'अकारणम्'। देखें-सु० शा० अ० 1।
प्रकृति-विकृति
महानहङ्कृतिः पञ्च तन्मात्राणि पृथक् पृथक्।
प्रकृतिर्विकृतिश्चैव सप्तैतानि बुधा जगुः ॥112॥
विद्वानों का कथन है, कि महान् (बुद्धितत्त्व) अहंकार
और पृथक्-पृथक् पाँच तन्मात्रा ये सात प्रकृति (कारण) भी
हैं। और विकृति (कार्य) भी।
वक्तव्य-उक्त सातों तत्त्व प्रधान से उत्पन्न हुये हैं, इसलिये
उन्हें विकृति अर्थात् कार्य कहा जाता है और इनसे पञ्चमहाभूत
उत्पन्न हुये हैं। इसलिये उन्हें प्रकृति अर्थात् कारण भी कहा
जाता है।
सोलह-विकार
दशेन्द्रियाणि चित्तं च महाभूतानि पञ्च च।
विकाराः षोडश ज्ञेयाः सर्वं व्याप्य जगत्स्थिताः ।। 113 ।।
दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच महाभूत ये सोलह
'विकार' कहे जाते हैं और ये सम्पूर्ण संसार में व्याप्त होकर
रहते हैं।
वक्तव्य-ये सोलह तत्त्व 'विकार' या कार्य ही कहे
जाते हैं, क्योंकि ये उक्त तन्मात्राओं से उत्पन्न होते हैं।
प्रश्न-इनको केवल विकार ही क्यों कहते हैं? प्रकृति भी क्यों
नहीं कहते? कारण यह है कि इनसे कोई नवीन तत्त्व उत्पन्न
नहीं होता। अतः इन्हें केवल विकार ही कहते हैं प्रकृति नहीं।
जीवात्मा का निवास-स्थान
एवं चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः सिद्धे वपुर्गृहे।
जीवात्मा नियतो नित्यो वसति स्वान्तदूतवान् ।।114 ।।
उक्त चौबीस तत्त्वों द्वारा बने हुये शरीर रूपी घर में
अविनाशी जीवात्मा मन को अपना दूत बनाकर कर्म-बन्धन
से बँधा हुआ निवास करता है।
जीवात्मा का स्वरूप
स देही कथ्यते पापपुण्यदुःखसुखादिभिः ।
व्याप्तो बद्धश्च मनसा कृत्रिमैः कर्मबन्धनैः ।। 115 ।।
पाप, पुण्य, सुख और दुःख द्वन्द्वों से युक्त तथा मन द्वारा
किये गये कर्मों के बन्धनों से बँधा हुआ वह जीवात्मा देही
(देह वाला) या शरीर (शरीर वाला) कहा जाता है।
वक्तव्य-वासनाओं से रहित जीवात्मा मन के फेर में
पड़कर अनेक प्रकार के सुख दुःखों में पड़ जाता है। जैसे एक
भला आदमी अपने नौकर या मित्र के फेर में पड़कर अनेक
झंझटों में फँस जाता है, ठीक वही दशा शुद्ध सच्चिदानन्द
पूर्ण ब्रह्म जीवात्मा की भी होती है।
जीवात्मा के प्रतिबन्धक
कामक्रोधौ लोभमोहावहङ्कारश्च पञ्चमः ।
दशेन्द्रियाणि बुद्धिश्च तस्य बन्धाय देहिनः ।। 116 ।।
काम, क्रोध, लोभ, मोह और पाँचवाँ अहङ्कार, दस इन्द्रियाँ
तथा बुद्धि-ये सभी उस जीवात्मा को बन्धन में डालने वाले हैं।
वक्तव्य-बुद्धि इच्छामयी है और इच्छाएँ ही सबको
फँसाती हैं। काम (सुखभोग की वासना), क्रोध (गुस्सा),
लोभ (धनादि के सञ्चय की अभिलाषा), मोह (मिथ्याज्ञान)
और अहङ्कार (अभिमान)-ये सब मानसिक दोष हैं। इनके
आवेश से सद्-असद् विवेक का नाश या ह्रास हो जाता है
और अनेक प्रकार के संकट उठाने पड़ते हैं।
मोह का लक्षण
( अश्रेयः श्रेयसोर्मध्ये भ्रमणं संशयो भवेत् ।
मिथ्याज्ञानं तु तं प्राहुरहिते हितदर्शनम् ।। 117 ।।)
शुभ एवं अशुभ में जो भ्रान्ति एवं सन्देह होता है और जो
अहित (दुःखदायी) में हित (सुखदायी) दिखलायी पड़ता
है, उसे मिथ्याज्ञान या 'मोह' कहते हैं।
अहङ्कार का लक्षण
(अहमित्यभिमानेन यः क्रियासु प्रवर्त्तते ।
कार्यकारणयुक्तस्तु तदहङ्कारलक्षणम् ।। 118 ।।)
कार्य एवं कारण से युक्त जो पुरुष 'अहम्' (मैं भी कुछ
हूँ) इस प्रकार के अभिमान के साथ कार्यों में प्रवृत्त होता है,
उसका नाम 'अहंकार' है।
काम का लक्षण
( स्त्रीषु जातो मनुष्याणां स्त्रीणां च पुरुषेषु वा।
परस्परकृतः स्नेहः काम इत्यभिधीयते ।। 119 ।।)