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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 356 में से

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पृष्ठ 86

50 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे

दस इन्द्रियाँ
तस्मात् सत्त्वरजोयुक्तादिन्द्रियाणि दशाभवन्।
मनश्च जातं तान्याहुः श्रोत्रत्वङ्नयनं तथा।। 103 ।।
जिह्वाघ्राणवचोहस्तपादौपस्थगुदानि च।
पञ्च बुद्धीन्द्रियाण्याहुः प्राक्तनानीतराणि च।। 104।।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव कथ्यन्ते सूक्ष्मबुद्धिभिः।
सत्त्वगुण और रजोगुण से युक्त अहंकार द्वारा दस 'इंद्रियाँ'
और 'मन' उत्पन्न हुआ। वे दस इन्द्रियाँ ये हैं-1. श्रोत्र, 2.
त्वचा, 3. नयन, 4. जिह्वा (रसना), 5. घ्राण, 6. वाक्, 7.
हस्त, 8. पाद, 9. उपस्थ (लिंग) तथा 10. गुद। इनमें पहली
पाँच तो बुद्धि इन्द्रियाँ या ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और दूसरी पाँच
कर्मेन्द्रियाँ कही जाती हैं।
वक्तव्य-बुद्धितत्त्व की इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं
को प्राप्त करने के लिए अहंभाव तो उत्पन्न हो गया, किन्तु
उनकी प्राप्ति के साधनों का अभाव था, वह भी दस इन्द्रियाँ
और मन की उत्पत्ति हो जाने से पूर्ण हो गया। ये 11 पदार्थ
सत्त्व और रजोगुण से युक्त होते हैं, क्योंकि 'कारणानुरूपं
कार्यम्' (सु० शा० अ० 1) जिससे ऐश्वर्य की सामर्थ्य प्राप्त
की जाये, उसे 'इन्द्रिय' कहते हैं। मन मनन और संकल्प
आदि का साधन है, इसके संयोग से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच
प्रकार के ज्ञानों की साधन हैं और पाँच कर्मेन्द्रियाँ पाँच प्रकार
के कर्मों के साधन हैं। यहाँ तक के बतलाये हुये सभी तत्त्वों
का समन्वित नाम सूक्ष्मशरीर है।
पञ्च तन्मात्राएँ
तमः सत्त्वगुणोत्कृष्टादहङ्कारादथाभवत् ।। 105 ।।
तन्मात्रपञ्चकं तस्य नामान्युक्तानि सूरिभिः।
शब्दतन्मात्रकं स्पर्शतन्मात्रं रूपमात्रकम् ।। 106 ।।
रसतन्मात्रकं गन्धतन्मात्रं चेति तद्विदुः।
तन्मात्रपञ्चकात्तस्मात् सञ्जातं भूतपञ्चकम् ।। 107 ।।
व्योमानिलानलजलक्षोणीरूपं च तन्मतम्।
तमोगुण तथा सत्त्वगुण से युक्त अहंकार तत्त्व से पाँच
'तन्मात्राएँ' उत्पन्न हुईं। उनके नाम विद्वानों ने ये बतलाये
हैं-1. शब्दतन्मात्र, 2. स्पर्शतन्मात्र, 3. रूपतन्मात्र, 4. रसतन्मात्र
और 5. गन्धतन्मात्र। इन पाँच तन्मात्राओं से पाँच 'महाभूत'
उत्पन्न हुये और वे ये हैं-1. आकाश, 2. वायु, 3. अग्नि, 4.
जल और 5. पृथिवी।
वक्तव्य-भोग के साधनों के रहने पर भी भोक्ता (भोगने
वाला) भोगायतन (भोगस्थान) के अभाव में भोग नहीं कर
सकता। अतः भोगायतन (भोगायतनं शरीरम्) अर्थात् स्थूल
शरीर भी उत्पन्न हो गया। आकाश आदि पाँच महाभूतों से
शरीर की उत्पत्ति होती है, जिसमें पुरुष (पुरि शेते इति पुरुषः)
शयन करता या व्याप्त रहता है। देखें-'पञ्चमहाभूत-
शरीरिसमवायः पुरुषः'। (सु० सू० अ० 1)। जिस प्रकार
सम्पूर्ण विश्व में ईश्वर व्याप्त है। महाभूत का सूक्ष्म रूप ही
'तन्मात्र' है। इसी को नैयायिक लोग 'परमाणु' कहते हैं।
तन्मात्राओं के स्थूल रूप
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसगन्धावनुक्रमात् ।। 108 ।।
तन्मात्राणां विशेषाः स्युः स्थूलभावमुपागताः।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँचों ही शब्दतन्मात्र
आदि पाँच तन्मात्राओं के क्रमशः स्थूलरूप को प्राप्त हुये
विशेष हैं।
वक्तव्य-पञ्चमहाभूतों के परमाणु शब्द आदि विशेषों
द्वारा जाने जाते हैं। 'विशेष्यन्ते श्रोत्रादिभिः इन्द्रियैः ज्ञायन्ते
इति विशेषाः'। अर्थात् शब्दादि शब्दतन्मात्रादि के सूचक या
बोधक हैं।
इन्द्रियों के विषय
बुद्धीन्द्रियाणां पञ्चैव शब्दाद्या विषया मताः ।। 109 ।।
कर्मेन्द्रियाणां विषया भाषादानविहारिताः।
आनन्दोत्सर्गकौ चैव कथितास्तत्त्वदर्शिभिः ।। 110 ।।
साङ्ख्यशास्त्र के विद्वानों का कथन है कि उक्त शब्द
आदि विशेष श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों के विषय या ज्ञेय भाव हैं।
कर्मेन्द्रियों के विषय (कर्म) ये हैं, यथा-1. भाषण (बोलना),
2. आदान (ग्रहण करना), 3. विहरण (विचरना या चलना),
4. आनन्द (रतिसुख की प्राप्ति करना) एवं 5. उत्सर्ग
(त्यागना)।
वक्तव्य-आचार्य शार्ङ्गधर ने सुश्रुत का अनुसरण करते
हुये उपस्थेन्द्रिय (लिंग और योनि) का विषय आनन्द माना
है-'आनन्द्यते अनेन इति आनन्दः'। किन्तु महर्षि चरक ने
इसका विषय विसर्ग (शुक्र मोक्षण) ही माना है। आनन्द तो
अनुभव है, कर्म नहीं। उक्त कर्म में स्त्री और पुरुष के रजस्
तथा शुक्र का विसर्ग अर्थात् त्याग होता है।
प्रकृति-परिचय
प्रधानं प्रकृतिः शक्तिर्नित्या चाविकृतिस्तथा।
एतानि तस्या नामानि शिवमाश्रित्य या स्थिता ।। 111 ।।