शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
७८ शालिहोत्रम् ।
के मूत्रमें सानले फिर इसे मिट्टी के बर्तन में पकाकर दर्द के
स्थान पर लेप करै और घोडेको धूप में रक्खे, इसी प्रकार तीन
दिन तक करै तो आराम हो ।
दूसरी विधि-बकायम; नीम और मुण्डी की ताजी पत्ती मं-
गवाके कोल्हूकी मिट्टी तथा थोडी सज्जी लेकर सबको मिला-
कर पीसले और पकाकर छोप करे और घोडेको धूपमें टह-
लाबै जब तक कि दवा सूख न जाय, इसी प्रकार तीन दिन
तक करै ।
तीसरी विधि-अफीम और गेरू दोनों को बराबर लेकर
पीसले और कडवे तेलमें मिलाकर खूब घोटले. फिर इस दवा
को सुम्मसे जांघतक लगावै. प्रातःकाल और संध्या दोनों समय
तीन दिन तक इस दवाको लगावै तो दर्द बिल्कुल बन्द होजाता
है परन्तु इस बातका ध्यान रक्खै कि जिस जगह गेरू लगजाता
है । उस जगह फिर कोई दवा असर नहीं करती इस लिये इस
दवाको उस समय लगावै जब कि और सब दवा कर चुके
होवै ।
[
तृतीय अध्याय: अश्व-रोग चिकित्सा, आहार-विधान एवं उपसंहार
शालिहोत्रम् । ७७
दूसरा उपाय-एक तोलाभर मिश्री को कूटकर नित्य उस हड्डी
पर बांधे तो आराम हो ।
तीसरी दवा-बकरी का गुर्दा मंगाकर उसे आग में मुलमुजा
ले और थोडा सा नमक मिलाकर उस हड्डी पर बांध दे ।
चौथी दवा-बकरी के गुर्दे में थूहर की डाली मिलाकर आग
पर भून ले और उस पर साबुन लगाकर सात दिन तक बांधे,
फिर उस जगह को तेल से चिकनी करके उस जगह के चमडे
को काट दे।, और उसमें सेंहुड का दूध भर देवे तथा धतूरे के
पते औटा कर उस पर बांध दे और पट्टी को उसी पानी से तर
रक्खे इसी प्रकार सात दिनतक रहने दे, पट्टीको अपनी जगह
से न हटने दे; घोडे को उसके मुँह या पांवसे पट्टी न खोलने दे
जो घाव से मवाद बह कर आवे तो उसे पोंछ दे, लेकिन पट्टी
को न हटावे । सात दिन पीछे पट्टीको खोले तो हड्डी बिल्कुल
नष्ट होजायगी ।
पांचवी दवा-अण्डी की मिंगी और काले तिल दोनों को
बराबर लेकर कूट ले और टिकिया बना कर गरम करके बांधे
और तीन दिन बाद पट्टी खोले ।
बजर हड्डीका वर्णन-यह हड्डी जंघा या घुटनोंकी गांठपर उत्पन्न
होती है, इसमें दर्द होता है ।
इसकी दवा-सज्जी, काली मिरच, पीपल सोंठ, हीराकसीस,
सांभर नमक, कडवी तूंबी और सेंधा नमक सबको समान भाग
लेकर कूटकर छान ले, फिर आक के दूधमें सान के उसी प्रकार
बांधे जैसे कि बौर हड्डी के वयान में लिखा गया है।
७८ शालिहोत्र ।
जानुंआ रोगका निदान-जो घुटनेपर कोई हड्डी उभरे (ऊँची)
हो जाती है उसको जानुंआ कहते हैं, इसी हड्डी का मुंह बन्द
होता है, और कंगूरेदार होती है ।
इसका इलाज-इस स्थान पर पछने लगवावे अथवा नील,
हरताल, नीलाथोथा, शिंगरफ, चमेली का तेल, वच्छनाग इन
सबको बराबर लेकर कुरण्ड के पत्थर पर पीसले और उसकी
मालिश करे तथा आग से सेके, जब तक आराम न हो इसी
प्रकार करे, यह क्रिया सवेरे और सन्ध्या दोनों समय करनी
चाहिये । इस रोग में उस स्थान पर दाग देना भी बहुत
लाभदायक है ।
अथवा-उस स्थान के बालों को उस्तरा से साफ करके वहां
पर थूहर की कांटेदार डाली को काट साफ कर आग में भुन-
भुनाकर दोनों समय बांधे इसी प्रकार तीन दिन तक करे परन्तु
उस स्थान को खुला न रहने दे ।
अन्य दवा-जमालगोटा की मिंगी आधपाव लेकर उन्हें नींबू
के रस में घोट २ कर चालीस बार सुखाले, फिर उसको नींबू
के रस में खरल करके तदन्तर उस स्थान के बाल साफ कर पछ-
ने लगावे तथा उस दवा में पांच चार बूँद नींबू के रस को डाल
कर धूपमें रखदे और जब उसमें कुछ गर्मी आजाय तब उस
स्थान पर लेप करे और ऊपर से एरण्ड के पचास पत्ते बांध दे
पट्टी को दृढ बांधे जिससे कि वह तीन दिन तक न खुले । जब
तीन दिन होजांय तो उस पट्टीको खोल डाले और पीली मिट्टी
को घोलकर उस जगह लेप करे, किन्तु जब तक घोडेके आराम
न हो तब तक उसे अस्तबल से न खोले; जो घोडे को सूजन
शालिहोत्र । ७५
अधिक हो तो इस दवा को लगाया करे, कभी घबडावे नहीं
और घावपर पानी न पडने दे. यह दवा वेल हड्डी; दकावल;
मोतेडा और पुस्तड़े हड्डी में भी लाभदायक है।
हड्डे का इलाज-नीलाथोथा, उरद का चून, अण्डी के बीजों
की मिंगी और सेंधा नमक प्रत्येक चार चार तोले लेकर सब
दवाओं को कूट पीसकर उरदके घाटेमें सानकर टिकिया बनाले
और उसे एक ओर से लोहे के तवे पर सेंक कर दूसरी ओर
से हड्डे पर रखकर बांध दे और तीन दिन पट्टी को खुलने न
दे फिर तीसरे दिन पट्टीको खोलकर उसी तरह टिकिया बना
कर बांधदे, और सूजन बाकी रहे तो फिर इसी प्रकार टिकिया
बनाकर बांधे तथा जो घाव फूटने लगे तो घीसे धोकर उसका
लेपकरे। अरमनके फूल और डालीको आगमें जलाकर राख करले
फिर उस राखको पानीमें डालकर सात गोली अनुमान माफिक
बनाले और नीबूके रसमें भिगोकर, गोली प्रातःकाल खिलावे ।
सेंक- अंजीर के बीजों का गूदा, भिलाये, काले तिल, कूट,
मोम, ऊँट की हड्डी इन सबको पीसकर सिंदूर और सेंधा नमक
मिला कर दो पोटली बनाले और कडवे तेलको आगपर चढा
कर गरम करे फिर उसमें दोनों पोटलियों को डालकर एक २
पोटली से सुहाता २ दोनों समय सेंक करे ।
मोतेडे की चिकित्सा ।
पहिली दवा-अमरवेल चार पैसेभर लेकर कूटले और गुड़
में मिलाकर दाना खाने के पीछे खिलावे, कुछ दिन तक यही
उपाय करे। तो यह दवा लाभदायक होगी ।
दूसरी दवा-हींग भुनी हुई तीन पाव, और हल्दी डेढ सेर,
८० शालिहोत्रम् ।
णशखार सेंधा नमक और काला नमक, प्रत्येक आध आध पाव
इन सबको चक्की में खूब महीन पीस कर इक्कीस खुराक बनावे
आधपाव गुड़ में एक खुराक मिलाकर नित्य खिलावे ।
तीसरी दवा-करंजकी गूदा, कुटकी, पीपलामूल, काली मिरच
कायफल, पीपल, काली जीरी घोडावच और भुना हुआ सुहा-
गा सबको आध २ सेर लेकर कूट ले और उसमें से पाव भर
नित्य पानी पीने से पहिले खिलावे ।
मोवेडे और एड्डे पर सेक-कूट चार तोले अफीम आठ तोले
दोनों को धतूरे के अर्क में मिलाकर लेप करे और कण्डों से
सेके, इसी प्रकार इक्कीस दिन तक करे तो निश्चय है कि सब
मवाद सुम की राह से बाहर निकल जायगा ।
दूसरा सेक-थूहर की कांटेदार डाली पांच अंगुल लेकर उस-
के कांटे और सब्जी को साफ करदे और उसे भीतर पोली
करदे उसमें सुहागा और अजवायन कूटकर भर दे और कपड-
मिट्टी कर आग में डाले जब पकजाय तब निकाल कर कूटकर
मोंठके आटे में मिलाकर दोनों समय खिलावे और सेक भी
करे । दवा अनुमान से खिलावे ।
पुश्तक और चकावल का इलाज ।
पुश्तक और चकावल रोगों में ऊँटकी हड्डी को गरम करके
उससे सेक करे परन्तु इससे सेक करनेसे उस जगह बाल नहीं
आते हैं सो विचार करे ।
दूसरी दवा-जहां पुश्तक और चकावल हो उस जगह के
बालोंको मुडवा कर पछने लगावे और जब रुधिर बहुत निकल
जाय तब आक की ताजी जड लेकर छीलले और उसे मनुष्यके
शालिहोत्रम् । ८१
मूत्र में पीसकर आगपर पकाकर उस जगह लेप करे और ऊपर
से पट्टी बांध दे, जो पांव फूल जाय तो भुनी हुई फिटकरी
और मक्खन दोनों मिलाकर लेप करे और उसके पांव में एक
शीशे का कड़ा डालदे ।
बैजा और काना का इलाज ।
यह दोनों एक ही रोग हैं इसमें चूना और मक्खन मिला-
कर मालिश करे और कण्डे की आग में सेके, फिर अरण्ड के
पत्ते रखकर बांध दे ।
दूसरी दवा-साबुन, भिलावा, नीलाथोथा, आंवा हल्दी और
एलसार इन सबको बराबर लेकर पीसले और पानीमें घोटकर
लेप करे ।
तीसरी दवा-हल्दी, मिरच और नीम के पत्ते एक एक पैसा
भर लेकर पावभर तिल के तेलमें चढ़ाकर जलाले, फिर उनको
उसी तेल में घोटकर थोड़ा मोम मिलाके मरहम बनाले । यह
मरहम घाव और नासूर के वास्ते भी फायेदमन्द है ।
रसौली की चिकित्सा-जब तक रस बन्द नहीं होता है, तब
तक रसौली नहीं होती, यह पांव में या बगल में होती है, एक
गांठ सी सूजन के साथ पड जाती है ।
पहिली दवा-काली जीरी, मुसव्वर, कुचला और निर्विसी
चारों को बराबर लेकर मनुष्य के पेशाबमें पीसकर गरम करके
लेप करे और ऊपर से अरण्ड के पत्ते बांधे तो तीन दिन में
गांठ बैठ जायगी।
दूसरी दवा-जब रसौली पकजाय तब उसको नश्तर से चीर
कर मवाद निकाल दे और जवाखार, सज्जी और खिजूर का
८९ शालिहोत्र ।
फल बीज निकाला हुआ, इन तीनों को बराबर लेकर उनका
लेप करे और अजवायन तथा लहसन चार २ दाम, सेंधानमक
और पीपल तीन तीन दाम सबको कूटकर चूर्ण बनाकर चार
पैसेभर गुलकन्द में मिलाकर सात दिन तक प्रातःकाल खिलावे
जब तीन दिन होजायँ तब लेपकी दवाइयों को नीबू के रस में
पीस कर लेप करे ।
तीसरी दवा-सूजन के मुख को छुरी (नश्तर से) चीरकर
उसमें यह दवा भरेः-नीलाथोथा, साबुन, नौसादर और शिंगरफ
चारों को बराबर लेकर खूब महीन पीसले और तिलके तेल
में पकाकर एक बर्तन में रखले और नित्यप्रति घाव के मुख में
भरदे जब तक अच्छा न हो तबतक यही उपाय करे ।
गिल्टी गांठ और बतौरी की औषधि ।
पहिलो दवा-नौसादर आधी छटांक, सिरका आध पाव और
स्प्रिटि, कपूर आधी छटांक मिलाकर कपडे में तर कर बांधे ।
दूसरी दवा-गुलाई यकस्ट्राक, दो ड्राम, सिरका डेढ छटांक
और स्प्रिट आधपाव तीनों को मिलाकर लगावे ।
तीसरी दवा-नौसादर पैसाभर, मिउरीइटिक ऐसिड दो ड्राम
और जल पावभर मिलाकर लगावे ।
चौथी दवा-नौसादर आधपाव और मिरका १८ छटांक मि-
लाकर लगावे । यह चार नुसखे बड़े २ अँग्रेज अश्वचिकित्सकों
के लिखे हुए हैं ।
फीलपा का इलाज-इसमें पांव हाथी के पांव की तरह फूल
जाता है और चकतियां बांधकर जगह जगह घाव होजाते हैं ।
शालिहोत्र । ८१
जिनसे पीला पानी झरता है इससे दाग देने से बहुत फायदा
होता है । तथा सिंगरफ़ की गोली प्रातःकाल खिलावे और
मरहम कर लगावे ।
सुम के रोगों का इलाज-जो घोडे की नाल गिर गई हो तो
उसे अपने थान से न खोले और जो नालबन्दी में देर होजाय
और सुम घिसते छिनते बदसूरत हो जाय तो नीचेके मरहम
लगाने से अच्छा होता है ।
मरहम नं०१-मोम, अलसी का तेल, शूकर का तेल, बकरे
की चर्बी तारपीन का तेल और शहद सब चीजों को बराबर
ले और पहिली चार चीजों को पिघला कर आग पर से उतार
ले और फिर तारपीनका तेल तथा शहद मिलादे जबतक ठण्डा
न हो और कभी २ यह मरहम कज्जल मिलाकर काला कर
लेते हैं ।
मरहम नं०२-चर्बी दो सेर, मोम आध पाव और पत्थर के
कोयले का तेल पावभर इन तीनों चीजोंको धीमी (मन्द मन्द)
आग पर पिघलाकर और चलाकर मरहम बनाले, अगर खता
या घाव में भरना हो तो थोडा सा पीव और मिलादे ।
ये दोनों नुसखे अंग्रेजी शालिहोत्रों के हैं ।
सुम फट गया हो उसका इलाज ।
अक्सर पत्थर और बालु के ऊपर चलने से सुम फट जाता है
तब उस हालतमें यह दवा करे:-मोम आधपाव, धूप एक छटांक
तारपीन का तेल आधी छटांक और चर्बी डेढ पैसाभर इन सब
चीजों का मरहम बनाकर सुमके घाव में भरदे और घोडे को
८४ शालिहोत्रम् ।
घास पर टहलावे अथवा अलसी का तेल दो भाग और पत्थर
के कोयलों का तेल एक भाग मिलाकर सुम पर लगाये ।
अन्य दवा-फिटकरी, नीलाथोता, हीराकसीस और इनकी
तिहाई सोनामाखी सबको पीसकर घाव में भरे । पहिले नीबू
के रस में चूना मिलाकर यह दवा मिलादे और नीबू के रससे
घाव को तरकर यह मरहम लगाकर ऊपर से कपडा बांध दे,
इसी प्रकार सात दिन तक करे ।
खुर्दगाद का इलाज-यह बीमारी ऐड़ीके पास होती है इसमें
सूजन और दर्द भी होता है ।
दवा-ऐड़ी पर तेल लगाकर सेंके और अरण्ड के पत्ता तीन
दिन तक बांधे तो यह तकलीफ दूर हो ।
मेख, कङ्कड या कांटा चुभ जाने के कारण घोडा लङ्गड़ाता
हो तो उसको यह दवा करे:-पुरानी ईंट को आगमें लाल कर-
के निकाल ले और उसपर कई तहकी कपडे की गद्दी बिछादे
फिर घोडेका पांव उस गद्दीपर रखकर थोडा २ पानी छिड़कता
जाय जिससे घोडे को बहुत गर्मी न मालूम हो इस वफारे का
नाम सल्लवाद हैं ।
सुम का जमा हुआ खून निकालने का इलाज ।
कड़ी जगह पर दौड़ने से घोडे के सुम में खून जमा
हो जाता है, जिससे वह लङ्गडाता है और अपने थान
पर बहुत बेचैन रहता है, कभी पांव को उठा लेता है
कभी कांपने लगता है ।
सुमसे घी मलकर लीद लेप दे और ऊपरसे कपडा बांध दे,
शालिहोत्र ।
इसी प्रकार तीन दिन तक दोनों समय करे और संगवाद का
बफारा दे ।
सुमसे रस जारी करने का उपाय-अजवायन और गुड वरावर
ले और इसका चौथाई सुहागाले, सबको कूटकर उसकी पत-
लियोंमें भर दे और एक टाटकी थैला बनाकर उसमें सुमको
रख दे इसी प्रकार तीन दिन तक बन्द रहने दे और जब गलि-
लियों का खोखलापन साफ होजाय तब खारी नमक और कच्चा
सुहागा छः छः दाम कूटकर भर देवे ।
दूसरी दवा-कुटकी, भुनाहुआ सुहागा और फिटकरी तीनों
कूट कर पुराने गुडमें मिलाकर चालीस गोली बनावे और पानी
के पीने से दोघडी पहिले एक गोली देवे पानी पीने के वक्त
कायजा रक्खे जिससे पानी कठिनतासे पीवे और पानी पिलाने
के बाद कायजा घोल डाले ।
रस उतरना-बहुधा घोडे तथा और पशुओंका भी पैर फूल
जाता है और रस बहने लगता है बहुधा घोडोंके पैरके ऊपरसे
और सुमके पुतलीसे रस बहा करता है, उस दशामें नित्य दोनों
समय नीम के पानी से पैरको धोवे और सडी हुई पुतली को
चाकू या सुमसे तराशके काटकर फेंक देवे और नीचे लिखा
मरहम लगावै ।
मोम और चर्बी दोनेको समान भाग लेकर रेंडीका तेल दूनाले
इन सबको चुराकर पैसा भर तूतिया और अधेलाभर कपूर
मिलाकर काममें लावै ।
दूसरी-तारपीनका तेल आधसेर, गन्धकका चूर्ण तीन पाव
७२ शालिहोत्र ।
शीरा एक पाव, शहद पाव भर और सत्तू आवश्यकतानुसार
मिलाकर छटांक भरकी गोली बनाले और दिनमें दो बार
घोडे को खिलावै ।
चौथी दवा-तारपीनका तेल आधपाव, साबुन आधपाव, जीरा
पानभर; अद्दरख आधा छटांक और सत्तू जितना आवश्यक हो
मिलाकर सब की तीन गोली बनावै और दिन भरमें तीन बार
घोडे को खिलावै ।
वोगमा और कैसरजादका इलाज ।
जो किसी घोडेको चांदनी मार जाय तो दोनों आंख
बैठ जाती हैं, सिरसे पांवतक तशनुज होजाता है तथा तमाम
शरीर तखते की तरह हो जाता है, इस बीमारी में
घोडा दाना घास छोड देता है क्योंकि उसको मुँह हिलाने
में भी कष्ट होता है यह भी एक प्रकार का वात रोग
है. इसमें जब तक मुँह रहता हैं तब तक इलाज हो सकता है ।
पहिली दवा-एक जवान मुर्गेके दोनों पंख और पांव काट
कर शेषको उवाल कर खरलमें डालकर कूटले, फिर उसमें
पाव भर काली मिरच महीन पीसकर मिलादे और सेर भर
उत्तम शराब में एक सेर महेला के साथ खिलावै और गरम
पानी पिलावै ।
दूसरी दवा-एक छपकली के हाथ, पांव और पूंछ काटकर
शेषको खरल में कूटकर आटे में मिलाकर खिलावै और दोनों
कान पुरानी रुई से बन्द करदे ।
तीसरी दवा-शिगरफको पीसकर उसकी पूंछकी नोंक चीरकर
शालिहोत्र । ५७
उसमें भरदे और एक तोला पारा दोनों कानों में डाल कर
पुरानी रुईसे बन्द करदे और चार पांच फेर बन्दूक की कान
पर करे।
दोगमाका इलाज-इसमें घोडेको सिरसे पैर तक पसीना
जारी हो जाता है. यह वडा कठिन रोग है, इसके लिये यह
दवा करे।
उपलेकी राख जब तक पसीना न सूखै तब तक शरीर से मलै
और दोनों कानों के सिरों पर दो गुल देवै।
दूसरी दवा-मिरच आधपाव; हरताल टका भर और अकर-
करहा छटांक भर सबको पीसकर ४० दिन तक सेर भर शराब
में मिलाकर पिलावै।
दीवानगोका इलाज-जो घोडा अपने हाथ पैर और सीना
आदिको अपने आप काटै तो जानों कि पागल होगया है।
दवा-अंगोज सीर अर्थात् लहसन, सोंफकी जड, अजवायन
सेंधानमक. ढाकके बीज. सेंहुडके बीज सब नौ २ दिरमले और
गुलकन्द सेरभर सबको कूट छानकर
८८ शालिहोत्रम् ।
बनावै और प्रतिदिन एक गोली प्रातःकाल खिलावे रातिव
खाने को न दे गर्म पानी पिलावै जो दस्त आने में देरी हो तो
तहिलास खिलावै और जो बहुत दस्त आवै तो ठण्डे पानी से
सोंठ की गोली बांधकर खिलावै और ऊपर से एक नीबू
खिलादे ।
ज्वरों का वर्णन- ज्वर में शरीर गरम होजाता है, घोडा सुस्त
रहता है , न कुछ खाता है और न कुछ पीता है, मूत्र कारंग
बदल जाता है । ज्वर में सब से पहिले जुलाव दे ।
पहिली दवा- टारटार एमटिक आधा ड्राम, कपूर आधा
ड्राम और शोरा दो ड्राम उदमें थोडी सी अलसी की खली
और शीरा मिलाकर गोली बनाले और दिन में दो बार
खिलावै ।
दूसरी दवा-कपूर और सुर्मा प्रत्येक अधेलाभर और शोरा
तीन पैसाभर इनमें शीरा और मैदा या आटा मिलाकर गोली
बनाले । प्रति दिन एक या दो गोली खिलावै ।
तीसरी दवौ-सुर्मा आधा पैसा भर, सीरा डेढ पैसा भर और
काला नमक एक पैसा भरले इनमें थोडा शहद मिलाकर
गोली बनाले और प्रतिदिन दो बार घोडे को खिलावै । यह
इनफूंएंजा नामक ( शीत ) ज्वर पर बहुत लाभदायक है ।
सन्निपातज ज्वर-यह ज्वर घोडेको अचानक उत्पन्न होजाता है
और यदि हसका उपाय शीघ्रही न किया जाय तो घोडा मर
जाता है । इस ज्वर में घोडे की नाडी तेज चलती है, नाक के
भीतर सुखीसी दिखलाई देती है सामने की टांगे तनी हुई सी
शालिहोत्रम् । ८९
रहती है, श्वास अधिक वेग से चलने लगता है और शरीर
गरम होजाता है ।
पहिली दवा-सुर्मा घेचाभर और डिजिटेलिस, शोरा और
काला नमक प्रत्येक एक पैमा भर इन सबको थोडे शहद में
मिलाकर एक गोली बनाले और ऐसी एक २ गोली प्रत्येक
आठ घण्टे के पश्चात् घोडे को खिलावे तो आराम हो ।
दूसरी दवा-शोरा दो पेसेभर और टार्टयमेटिक आधा पेसा
भर दोनों को मैदा और शीरा में मिलाकर गोली बनावे और
दिन में दो वार खिलावे ।
तांसरी दवा-इयलप्यम ४५ रत्ती, टार्टयमेटिक ४० रत्ती,
डिजिटेलिस १० रत्ती, और मुलहटी चार पेमाभर इन सबको
शहद में मिलाकर एक गोली बनाले और ऐसी एक २ गोली
प्रत्येक छः घण्टे पश्चात रोगी को खिलावे ।
चौथी दवा-कार्बोनेट आफ यमोनियां डेड ड्राम अफीम एक
ड्राम और सोंफ आधा आउंस इन सबको थोड़ा शीरामें मिला-
कर गोली बनाकर दिन में दो वार खिलावे । यह दवा उस
समय देनी चाहिये जब कि बीमारी बहुत बढ़ जाय और फें-
फड़ा सड़ने लगे ।
कफज ज्वर का इलाज-इस ज्वर में शरीर गरम होजाता है,
मुंह से कफ निकलता है ।
पहिली दवा-डिजिटेलिस आधा ड्राम, कपूर एक ड्राम; सुर्मा
एक ड्राम, अलसी की खली एक दाम और शोरा तीन दाम
इन सबको मिलाकर एक गोली बनावे और ऐसी १ दो गोली
दिन में दो बार घोड़ा को खिलावे ।
६० शालिहोत्रम् ।
दूसरी दवा-जङ्गली प्याज छदाम भर, हिंगडा पैसाभर और
अफीम छदामभर इन सबको मिलाकर एक गोली बनावे और
प्रतिदिन रात को एक गोली खिलावे ।
तीसरी दवा-गन्धक दो पैसाभर, हींग आधी छटांक, मुलहटी
का चूर्ण आधी छटांक, और तारपिन का तेल आधी छटांक,
इन सबको मिलाकर चार गोली बनावे और प्रतिदिन रात को
एक गोली खिलावे ।
चौथी दवा-मुलहटी का चूर्ण दो पैसाभर, जौ का चून आधी
छटांक और कोलतार छदाम भर इनमें थोड़ा शहद मिलाकर
एक गोली बनावे और ऐसी ऐसी एक गोली प्रतिदिन रात के
समय दे ।
कंवल रोग का वर्णन-उस रोग में घोडे के नेत्र पीले पड
जाते हैं, मूत्रका रङ्ग पीला तथा गाढा हो जाता है, दाना खाने
से घोडे को अरुचि होजाती है दस्त साफ नहीं होता है और
कभी २ बन्द हो जाता है ।
जो दस्त साफ न होता हो तब यह दवा करे:-
पहिली दवा-कैलोम्यल एक ड्राम, सुर्मा दुकराभर और मुस-
ब्वर धेलाभर सबको शीरा में मिलाकर एक गोली बनावे ।
चार २ पांच पांच घण्टे के पीछे ऐसी ऐसी एक एक गोली
जबतक दस्त न हो तबतक दे ।
दूसरी दवा-मुसब्बर धेलाभर और कोलोम्यल एक ड्राम इनको
शीरा में मिलाकर एक गोली बनाले और ऐसी ऐसी दो गोली
दिनभर में दो बार खिलावे ।
शालिहोत्रम् । ९१
प्रमेह रोग-इसमें धातु गिरती है इसके लिये यह दवा दे (१)
कतिला देवे । (२) कृत्या, केलाकी जड और कतिला प्रातः-
काल देवे (३) सफेद जीरा अथवा मुली की जड का चूर्ण
बनाकर दे ।
गांठ फूट जाना-बहुधा घोड़ों का गांठ फूल आता है और
पीछे फूट भी जाता है और बहा करता है, इस दशा में घोडे
को बांध रखना चाहिये ।
पहिली दवा-फिटकरी और चीनी के बर्तन का टुकड़ा दो
नों को पीसकर पानी में सानले, न बहुत गाढा हो न बहुत
पतला फिर इसका लेप करे ऊपर से पत्ती रखकर पट्टी बांध
दे (बहुधा इस लेप में काजल भी मिला लेते हैं।)
कृमि रोग-बहुधा घोड़े के पेटमें कीडे पडजाते हैं, जो दस्त
में भी निकला करते हैं, इससे भूख बन्द होजाती है ।
इसकी दवा-नमक दो पैसाभर, जुन्तआना पैसाभर, लोहेका
जङ्ग पैसाभर सभैन धेला भर और शीरा थोडा सा ले इन सब
चीजों को मिलाकर गोली बनावे, सात दिन तक सबेरे के
समय एक गोली दे और इसके पीछे जुलाब दे ।
दूसरी दवा-काली जीरी और नीम की पत्ती खिलाना भी
बहुत उत्तम है।
कुत्ता का काटना-जिस घोडे को कुत्ता काट खाय उसको
मनुष्य की खोपडी का चूर्ण छदामभर, मकोय डेढ रत्ती और
कुछ गुड इनकी गोली बनाकर सबेरे और सन्ध्या के समय
एक एक गोली खिलावे, इसी प्रकार छः सप्ताह तक दे तो
घोडा पागल न होगा ।
९० शालिहोत्रम् ।
मोचका इलाज-जिस घोडे का पांव मोच आने से फूल गया
है । उसके पांव को नौसादर आधी छटांक, और शोरा एक
छटांक आधसेर पानी में मिलाकर उसमें कपडा तरकर उससे
बांध दे और हर समय कपडा को तर रक्खे, जो सूजन और
दर्द अधिक हो तो उस स्थान पर जोंक लगादे, और यदि
आवश्यकता हो तो उस स्थान की फस्द भी खोल सकते हैं।
आंव और दस्तों का इलाज-जो घोडेके दस्त में आंव और
खून आता हो तो उसके लिये यह दवा देनी चाहिये ।
पहिली दवा-मेंहदी की पत्ती आधी छटांक, सूखी बेलगिरी
एक छटांक, कतीरा आधी छटांक और सफेद जीरा आधी
छटांक इन सबको कूट कर मिलाले और आधा सवेरे तथा
आधा सन्ध्या को खिलावे ।
दूसरी दवा-अफीम दुकरा भर; छटी मिट्टी का चूर्ण आधी
छटांक, बबुल का गोंद आधी छटांक और पोदीना की पत्ती
आधी छटांक इन सबको कूटकर एक या दो दफे खिलावे ।
[
शालिहोत्रम् । ६१
दूसरा लेप-पिंच ढाई पाव, पत्थर के कोयलेका तेल तीन छ-
टांक और मोम आधी छटांक तथा थोडा तेलिन मक्खीका चूर्ण
पहिली तीन दवाओं को पिघलाकर फिर तेलिन मक्खी का
चूर्ण मिलाकर लेप बनाले ।
तीसरा लेप-पिंच दो सेर, तारपीन का तेल तीन छटांक और
अलसी का तेल आध पाव इन तीनों को आग पर पिघला
कर लेप बनाले ।
जहरवाद ।
पहिली दवा-मिरच, कसौंदी, अदरख और पान बराबर लेकर
सबको कूटले और छटांक २ भर दिनमें दो बार खिलावे ।
दूसरी दवा-चन्दाल, सोंठ, मिरच, पीपल, कुटकी, वायबिडंग,
चिरायता, सफेद जीरा, नीबकी छाल, काकडासिंगी, काली जीरी
लहसन, गेरू, सोया के बीज सबको तोला २ भर लेकर कूटकर
बुकनी बनाले और आधसेर सत्तू के साथ खिलावे ।
घोडेको जुलाव देनेकी औषध-जो घोडेको साल भरमें एक
बार जुलाव दिया जाय तो कभी बीमारी पैदा नहीं हो सकती
जब जुलाव देना हो तब पहिले दिन घोडे को दाने के बदले
में चोकर पानीमें सानकर खिलावै और दूसरे दिन कुछ न दे,
संध्या समय चोकर दे और तीसरे दिन मामूली दाना दे तीन
दिन सवारी न ले ॥
पहिला जुलाब-मुसव्वर तीन तोले सौंफ दो माशे और वि-
लायती साबुन छःमाशे इनको कूटकर गुलकन्द में मिला गोली
बांधकर खिलावै और टहलावै और जो चाहे कि पेशाब भी
९४ . शालिहोत्रम् ।
खुलकर हो तो कलमी शोरा छः माशे और बबूलका गोंद ६
माशे और मिलाले ।
दूसरा नुखसा-एलुआ, हल्दी और काला निमक तीनों को
पांच तोले लेकर बारीक पीसकर दो गोलियां बांधे । एक गोली
शामको देवै और जो दस्त होने में देर हो तो दूसरी गोली
और दे देवै । जो ज्यादा दस्त हों तो तुलसीकी पत्तीकी गोली
बनाकर देवै या नींवूकी पत्तीमें चार तोले मिरच मिलाकर
खिलावै ।
तोसरा नुसखा-काला नमक एक पाव, सनाय के पत्ता आध
पाव सोंठका चूर्ण आधी छटांक इन द्रव्यों को एक सेर चावल
के गरम मांद के साथ खिलावै ।
चौथा नुसखा-अण्डीका तेल एक पाव और नमक एक पाव
इनको आध सेर अलसी के मांठमें मिलाकर पिआदे ।
जुलाबके दस्तों को बन्द करना ।
जो जुलाबसे घोडेको दस्त बहुत आयै और बन्द करने की
आवश्यकता हो तो सोंफ, सफेद जीरा, और कालीमिरच चार २
तोले लेकर कच्ची पकीकर पीसकर गोलियां बना लेवे और एक
गोली दे, फिर थोडी देर बाद दूसरी गोली दे और जो इस
दवा से दस्त बन्द न हो तो भुनी हुई हींग एक तोले; घी चार
तोले और साठी चावल आठ तोले इन सबको पीसकर गोली
बनाकर खिलावे ।
अतिसारका इलाज-जिस घोडेका पेट चलता हो उसको
यह दवा दे:-
शालिहोत्रम् । ६५
(१) भंगकी लुगदी खिलावे (२) सोंठ और सौंफ प्रत्येक
एक दाम दोनोंको आधी आधी भूनले और आधी कच्ची
रक्खे, माई एक दाम घीमें मिली हुई, मोचरस एक दाम
बेलगिरी दो दाम, बंग चार दाम धावे के फूल एक
दामः लोध एक दाम, मीठे इन्द्रजौ एक दाम और मोंठ
एक दाम सबको कूट पीसकर एक सेर खट्टे दहीमें मिलाकर
खिलावे ।
चारों फसलोंकी बीमारियों का इलाज ।
वसंत ऋतु (फस्ल बहार) में घोडेको कफके जोर से बीमारी
होती है इसमें चिकनाई और मिठाई से परहेज रक्खे जिससे
कफ न बढने पावै, सूखी घास और कूएका पानी पीने को
देवे; सबेरे और संध्याको सैर करानी चाहिये तथा यह चीज
खिलावेः-शहद, कुटकी, बांसेकी पत्ती, नीम, सेंधा नमक,
पीपल, शराब आतशी और सेत्रकी पत्ती आदि खिलावै ।
गर्मीके दिनोंका इलाज-इन दिनोंमें घोडेको बहुत गर्मी और
पित्तका जोर होता है, इस लिये जिससे गर्मी बढै वह चीज न
देनी चाहिये, पोइया या सरपट दौडावे, दिनमें दो तीन वार
पानी पिलावै दाना कम कर देवें, बदन को धोता रहै, थान
ठण्डा रक्खेः पानी, मट्ठा, हरी घास, खिलावे और ठण्डी
दवा देवै । गर्मी के दिनों में घोडे को तीन प्रकार की बीमारियां
होती है ।
पहिला-जब घोडेका बदन गरम हो, रंग कांपता हो दोनों
कूखतनी रहें, बुतानेका रंग पीला रहें धीरे २ बदन सूखता
जाय, सुस्त रहै और भूखसे खाना न खावै तौ यह ताव खा-